स्मृति शेष-राहत इंदौरी : वो शेर को जुबान से ही नहीं बल्कि जिस्म से भी आवाज देते थे – वसीम बरेलवी | indore – News in Hindi

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वसीम बरेलवी ने राहत इंदौरी के निधन पर उनकी यादें साझा करते हुए श्रद्धांजलि दी

वसीम बरेलवी कहते हैं- वो शेर को सिर्फ अपनी जुबान से ही नहीं बल्कि अपने जिस्म से भी आवाज देते थे, उसमें रंग भरते थे. उनके हाव-भाव की दुनिया कायल थी. बहुत कम ऐसे शायर होते हैं जिन्हें समाज के हर तबके में पसंद किया जाता हो, राहत साहब हर हलके में मकबूल थे.

लखनऊ/इंदौर. राहत साब के नाम से मशहूर शायर राहत इंदौरी (Rahat Indori) अब हमारे बीच नहीं हैं. कोरोना वायरस (Coronavirus) से संक्रमित होने के बाद उन्हें इंदौर के अरबिंदो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था जहां आज उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके जाने से समाज के हर तबके में मायूसी है. चाहे नौजवान हों या फिर उम्रदराज सभी गमज़दा हैं. ऐसे मौके पर उनके साथी और मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने news 18 से ख़ास बातचीत में राहत इंदौरी साहब को श्रद्धांजलि देते हुए उनके ऐसे पहलुओं को छुआ जिससे पता चलता है कि आखिर राहत इंदौरी इतने मशहूर और हर दिल अजीज क्यों थे.

अल्फ़ाज़ और अंदाज़ से बदल दी मुशायरे की फ़िज़ा
वसीम बरेलवी ने फोन पर बातचीत के दौरान अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि राहत उनके छोटे भाई जैसे थे. वो पहले शायर थे जिन्होंने कुछ ऐसा किया जो पहले कभी नहीं हुआ था. वसीम बरेलवी ने बताया कि राहत के शायरी की दुनिया में कदम रखने से पहले मुशायरों में इसे पढ़ने का अंदाज बिल्कुल अलग था. जमाना चाहे जिगर साहब का रहा हो या फिर शमीम जयपुरी साहब का, इन सभी के समय में गजल पढ़ने का अंदाज बिल्कुल अलग था. राहत इंदौरी ने मुशायरों में शेर पढ़ने के एक नये अंदाज को जन्म दिया. उनके इस अंदाज को न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में सराहा गया. वो बात करते हुए उनकी यादों में खो जाते हैं और कहते हैं कि और तो और राहत ने शेर पढ़ने का पूरा चलन ही बदल दिया. वसीम बरेलवी ने बताया कि राहत इंदौरी से पहले शेर तरन्नुम में पढ़ा जाता था. यानी लय में गज़ल की तरह. राहत साहब के इस दुनिया में दाखिल होने से पहले ऐसा माना जाता था कि इस दुनिया में मशहूर होने के लिए ये बेहद जरूरी है लेकिन राहत इंदौरी पूरी दुनिया के ऐसे पहले शायर थे जिन्होंने तरन्नुम की तर्ज पर शेर पढ़ने के सिलसिले को बदल डाला.

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हर कोई था राहत साब का मुरीद
वसीम बरेलवी बताते हैं वो लय में नहीं पढ़ते थे. वो तहत में पढ़ते थे, यानी बगैर लय के बातचीत जैसा. यानी शेर के भाव के हिसाब से उसे पेश करना. इतना ही नहीं राहत इंदौरी की एक और खासियत थी जो उन्हें सबसे अलग करती थी वह थी बॉडी लैंग्वेज. शेर पढ़ने के दौरान राहत साहब जैसी बॉडी लैंग्वेज यानी हाव-भाव किसी दूसरे में नहीं देखा जा सकता. वो शेर को सिर्फ अपनी जुबान से ही नहीं बल्कि अपने जिस्म से भी आवाज देते थे. उसमें रंग भरते थे, उनके हाव-भाव की दुनिया कायल थी. तरन्नुम की जो कमी हुई उसे राहत साहब अपने अंदाज से पूरा कर दिया करते थे. उनके इस अंदाज को बहुत सराहा गया. वसीम बरेलवी ने एक और खासियत याद करते हुए कहा कि बहुत कम ऐसे शायर होते हैं जिन्हें समाज के हर तबके में पसंद किया जाता हो. राहत साहब हर हलके में मकबूल थे. वो ऐसे शायर थे जिन्हें नौजवान नस्ल जितना पसंद करती थी उतना ही उम्रदराज ऑडियंस भी. ऐसा इसलिए क्योंकि सम-सामयिक घटनाओं पर उनके शेर कहने का कोई तोड़ नहीं था. शेरो-शायरी के जितने भी रस होते हैं वे सभी के सभी राहत साहब की रचना में दिखायी देते हैं. ऐसी मकबूलियत बहुत कम लोगों के हिस्से में आती है. आखिर में वसीम बरेलवी ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि ऊपर वाला उनके परिवार को हिम्मत दे.



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