Mars mission competing in countries to search for life on Mars and to make its presence there – राजनीति: मंगल पर जीवन की तलाश

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अभिषेक कुमार सिंह

हमारे सौरमंडल के चौथे ग्रह मंगल को लेकर दुनिया में इन दिनों एक सनसनी-सी पैदा हुई है। जुलाई के दूसरे पखवाड़े में अमेरिका और चीन के अलावा संयुक्त अरब अमीरात ने भी मंगल की ओर यान रवाना करके अंतरिक्ष की दौड़ में अपने को दर्ज करवा लिया है। हालांकि इन तीनों मंगल अभियानों के करीब-करीब एक साथ पृथ्वी से रवाना किए जाने का कारण खगोलीय है। सूर्य की परिक्रमा करते वक्त मंगल और पृथ्वी की बीच की दूरी कभी साढ़े नौ करोड़ किलोमीटर हो जाती है, तो कभी यह घट कर साढ़े पांच करोड़ किलोमीटर रह जाती है। हाल में जब ये दोनों ग्रह करीब थे, तो अंतरिक्ष विज्ञानियों को मंगल यानों के प्रक्षेपण का अनुकूल समय मिल गया और कोरोना काल में भी उन्होंने अपने मिशन मंगल रवाना करने में देरी नहीं की। पर सवाल है कि आखिर दुनिया में मंगल को लेकर इतनी दिलचस्पी क्यों जगी है कि एक साथ कई देश इस ग्रह पर अपना यान पहुंचाने की होड़ में हैं।

एक आम चर्चा यह है कि दुनिया में कोरोना विषाणु के खतरे मद्देनजर वैज्ञानिक इस प्रयास में हैं कि किसी तरह पृथ्वी से बाहर इंसानी बस्तियां बसाने का कोई जुगाड़ हो सके, ताकि भविष्य में धरती पर मानव प्रजाति के भविष्य को लेकर कोई संकट या महाविनाश जैसी स्थितियां पैदा होती हैं तो कुछ इंसानों को मंगल के सुरक्षित माहौल में भेज दिया जाए और पृथ्वी पर हालात सुधरने के बाद वे यहां वापस आकर जीवन का सिलसिला नए सिरे से शुरू कर सकें। हालांकि इस तरह की कल्पना पहले से की जाती रही है।

स्टीफन हॉकिंग जैसे विज्ञानियों ने पृथ्वी से बाहर जीवन पनपाने की योजनाओं को आगे बढ़ाने की बात कह कर ऐसी कल्पनाओं को जन्म दिया। लेकिन मंगल को लेकर अभी तक हमारी जो समझ बनी है, उसमें वहां मानव रिहाइश का कोई प्रबंध हो पाना दूर की कौड़ी लगता है। मौजूदा यानों की जो गति है, उनसे यदि किसी इंसान को वहां भेजा जाएगा, तो एक तरफ के रास्ते में ही मोटे तौर पर सात महीने लग जाएंगे। खाने-पीने, आॅक्सीजन और सुदूर अंतरिक्ष यात्रा के सारे जोखिम उठाने के बाद अगर किसी तरह से कोई इंसान मंगल तक पहुंच भी गया, तो वहां उसके जीवित बचे रहने की कोई संभावना बनेगी, इसे लेकर वैज्ञानिक जरा भी आश्वस्त नहीं हैं।

सबसे महत्त्वपूर्ण तो यह है कि अरब देशों में अंतरिक्ष को लेकर जिज्ञासा जगी है और संयुक्त अरब अमीरात का मंगल अभियान (होप ऑर्बिटर) उसकी बड़ी मिसाल है। इस अभियान का वैज्ञानिक महत्त्व कितना है और इससे संयुक्त अरब अमीरात क्या कुछ हासिल करता है- इसका खुलासा तो उसके यान के मंगल पर पहुंचने के बाद होगा, लेकिन फिलहाल इसका भावनात्मक महत्त्व काफी ज्यादा है। अरब जगत और पश्चिम एशिया ही नहीं, किसी भी मुसलिम देश की तरफ से मंगल पर भेजा गया यह पहला मिशन है।

ब्रिटिश दासता से आजादी की पचासवीं वर्षगांठ मना रहे संयुक्त अरब अमीरात के लिए यह जश्न का भी एक अवसर कहा जाएगा, क्योंकि इसे वह अपनी एक उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करना चाहेगा। लेकिन इससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि तेल संपदा के ढेर पर बैठे अरब मुल्कों को भी अब यह लगने लगा है कि दुनिया में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए विज्ञान की दुनिया में भी कुछ ऐसी उपलब्धियां हासिल की जाएं और ऐसे क्षेत्रों में कदम बढ़ाए जाएं, जिनसे अरब देश प्रगतिशील राष्ट्रों की पांत में शामिल हो सकें। अरब देशों में यह समझ बनने लगी है कि एक दिन जब तेल जैसे संसाधन चुकने लगेंगे और दुनिया हरित व स्वच्छ ऊर्जा के स्रोतों पर निर्भर हो जाएगी, तो तेल की संपदा पर टिके समृद्धि के उनके महलों को ठहते वक्त नहीं लगेगा।

संयुक्त अरब अमीरात के मंगल अभियान की तुलना में चीन और अमेरिका के मंगल अभियान ज्यादा ठोस इरादों के साथ रवाना किए गए हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी- नासा के तो दो लैंड रोवर- स्प्रिरिट और अपॉरच्युनिटी पहले से ही मंगल की सतह पर मौजूद हैं। लेकिन नासा ने अब जो नया यान पर्सिवरंस रवाना किया है, उसके पीछे बड़ी योजना है। इस मिशन के यान में नासा ने पौने दो किलोग्राम वजनी एक हेलिकॉप्टर भी भेजा है। यदि यह यान सफलतापूर्वक मंगल तक पहुंच गया और हेलिकॉप्टर ने मंगल पर कामयाबी के साथ उड़ान भर ली, तो यह मानव इतिहास में पहला अवसर होगा जब मंगल पर इंसान का बनाया हेलिकॉप्टर उड़ान भर रहा होगा।

नासा ने अभी तक अपने रोवर्स- स्प्रिरिट और अपॉरच्युनिटी से जितनी जानकारी बटोरी हैं, उनका संबंध एक सीमित जमीनी दायरे से था। लेकिन यह हेलिकॉप्टर अगर वहां उड़ान भरता है, तो मंगल के असीमित इलाके की छानबीन इससे हो सकेगी। यही नहीं, नासा ने रोवर पर्सिवरंस को 2026 में अगले मार्स मिशन के साथ लौटाने की योजना भी बनाई है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चला, तो कह सकते हैं कि मंगल पर इंसान के जाने और उसकी सुरक्षित वापसी की संभावनाओं को इस मिशन के जरिए टटोल लिया जाएगा। इसी तरह चीन के मंगल अभियान (तिआनवेन-1) में भारतीय मंगलयान की तरह एक आॅर्बिटर, एक लैंडर और एक रोवर शामिल है जो मंगल की सतह, उसके नीचे और ऊपर यानी वातावरण के बारे में और जानकारी जुटाएंगे। क्या पता अंतरिक्ष में जीवन के लिए जरूरी पानी और जीवनदायी गैसों की मौजूदगी का कोई नया सूत्र इनसे मिले।

ज्यादातर मंगल अभियानों का मुख्य उद्देश्य मंगल पर जीवन की स्थितियों की खोजबीन करना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वैज्ञानिक साबित करना चाहते हैं कि मंगल अब तक के अनुमानों के विपरीत है और यह एक सूखा और बंजर ग्रह नहीं है। यही नहीं, इसकी सतह पर पानी है जो वहां बहने की स्थिति में है। इसका एक बड़ा दावा साल 2015 में नासा के ग्रह विज्ञानी जिम ग्रीन ने भी किया था। नासा के अंतरिक्ष यान ‘मार्स रीकॉनिसेंस आॅर्बिटर’ से लिए गए चित्रों व प्रेक्षणों के आधार पर उन्होंने कहा था कि मंगल की एक सतह पर ऊपर से नीचे की ओर बहती हुई धाराओं के प्रमाण उक्त यान से मिले थे, जो करीब पांच मीटर चौड़ी और सौ मीटर तक लंबी हैं।

ये जलधाराएं कम तापमान या फिर सर्दियों में गायब हो जाती हैं और तापमान बढ़ने पर यानी गर्मियों में एक बार फिर प्रकट हो जाती हैं। मंगल पर पानी मिलने के बारे में एक विस्तृत शोधपत्र ‘नेचुरल जियोसाइंस’ नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया था, जिसे नेपाली मूल के वैज्ञानिक लुजेंद्र ओझा और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने लिखा था। इसके बारे में एरिजोना विश्वविद्यालय के खगोल वैज्ञानिक अल्फ्रेड मैकइवेन ने कहा कि यह खोज साबित करती है कि मंगल ग्रह के वातावरण में पानी की अहम भूमिका है।

मंगल को इसके ध्रुवों पर जमी बर्फ और गड्ढों में कैद रहस्यों के कारण हमेशा जीवन की संभावना वाला ग्रह माना जाता रहा है। शून्य से एक सौ तीस डिग्री नीचे औसत तापमान वाले मंगल के ध्रुवों पर जमी बर्फ, पानी के बहाव के प्रमाण, गर्मी और लावा का प्रवाह जैसे संकेतों को हमेशा जीवन की निशानी समझा गया। पर सवाल यह है कि क्या इन सबूतों के आधार पर वहां कोई जीवन वास्तव में संभव है? बैक्टीरिया के रूप में मंगल पर जीवन अगर रहा भी है, तब भी सवाल यह है कि क्या ऐसा जीवन हमारे किसी काम का है? इस गुत्थी को सुलझाने की जितनी कोशिश होती है, रहस्य उतना ही गहराता दिखता है।

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