Atal Bihari Vajpayee’s death anniversary, his memory, the significance of his views in MP worker conference – राजनीति और अटल जी का संदेश

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प्रभात झा

भारत रत्न और तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी की कल पुण्यतिथि है। नीति, सिद्धांत, विचार और व्यवहार के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए सदैव जमीन से जुड़े रहने वाले अटल जी से जिसका भी संबंध बना, वह राजनीति में कभी छोटे मन से काम नहीं करेगा। यह सामर्थ्य अटल जी में ही था कि विपक्ष में रहते हुए वे हर दल के राजनेताओं और कार्यकतार्ओं के मन में विशिष्ट स्थान बना लेते थे।

विपक्ष में रहते हुए भी वे सदैव सत्ता पक्ष के नेताओं से भी अधिक लोकप्रिय रहे। अपने अखंड प्रवास, वक्तव्य कला और राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ सड़कों से लेकर संसद में सिंह गर्जना कर जवाहरलाल नेहरू और उनके समकक्ष नेताओं के मन मे भी अपना विशिष्ट स्थान बनाने वाले अटल जी सर्वदलीय मान्यता के एकदलीय नेता थे।

सन् 1996 की बात है। मध्यप्रदेश में भाजपा सांसदों, विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों का प्रशिक्षण वर्ग लगा था। बतौर प्रतिपक्ष के नेता के रूप में वे भोपाल स्थित भाजपा के प्रांतीय कार्यालय दीनदयाल परिसर के हॉल में आए। प्रशिक्षण वर्ग में उनका उदबोधन हुआ। अटल जी ने कहा- मैं जानता हूं कि इस प्रशिक्षण वर्ग में पार्टी के प्रमुख नेता उपस्थित हैं। हम यह दावा करते हैं कि हमारी पार्टी कार्यकर्ताओं की पार्टी है। जो नेता है, वह भी कार्यकर्ता है। विशेष जिम्मेदारी दिए जाने के कारण वह नेता के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन उनका आधार है उनका कार्यकर्ता होना। जो आज विधायक है, वह कल शायद विधायक नहीं रहे। सांसद भी सदैव नहीं रहेंगे। कुछ लोगों को पार्टी बदल देती है, कुछ को लोग बदल देते हैं, लेकिन कार्यकर्ता का पद ऐसा है जो बदला नहीं जा सकता। कार्यकर्ता होने का हमारा अधिकार छीना नहीं जा सकता। कारण यह है कि हमारा यह अर्जित किया हुआ अधिकार है, निष्ठा और परिश्रम से हम उसे प्राप्त कर सकते हैं, वह ऊपर से दिया गया सम्मान नहीं है कि उसे वापस लिया जा सके।

अटल जी कहा करते थे कि हमारा लोकतंत्र में विश्वास है। जीवन के सभी क्षेत्रों में हम लोकतांत्रिक पद्धति के समर्थक हैं। अपने राजनीतिक दल को भी हम लोकतंत्रात्मक तरीके से चलाते हैं। समाज के सभी वर्गों से और देश के सभी क्षेत्रों से पार्टी में अधिकाधिक लोग शामिल हों, यह हमारा प्रयास होता है। किसी व्यक्ति या इकाई द्वारा अधिक से अधिक सदस्य बनाए जाते हैं, इस प्रतियोगिता में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रतियोगिता पार्टी के अनुशासन और मर्यादा के अंतर्गत होनी चाहिए। पार्टी के विस्तार के लिए नए सदस्य बनाना एक बात है और पार्टी पर कब्जा करने के लिए सदस्यता और बात।

जब पार्टी का विस्तार करने के बजाय पार्टी पर अधिकार जमाने की विकृत मानसिकता पैदा होती है, तब जाली सदस्य भी बनाए जाते हैं। इससे पार्टी का स्वास्थ्य बिगड़ता है और दलों में प्रचलित इस बुराई को हमें अपने यहां बढ़ने से रोकना होगा। वर्षों से पार्टी में काम करने वाले लोग ऐसी बुराइयों के प्रति उदासीन नहीं हो सकते।

जन-समर्थन बढ़ाने के साथ पार्टी को पद-लोलुपता से भी बचाना होगा। गुटबंदी का पार्टी में कोई स्थान नहीं हो सकता। इस ऐतिहासिक प्रशिक्षण वर्ग में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सर संघ चालक सुदर्शन जी के साथ ही राष्ट्रीय संगठन महामंत्री कुशाभाऊ ठाकरे भी मौजूद थे। भाजपा के अब तब हो रहे विस्तार में मूल प्राण कार्यकर्ता ही है।

इस प्रशिक्षण वर्ग में अटल जी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी पिछले कुछ वर्षों में अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल हुई है। इसके पीछे एक चिंतन है, एक विचारधारा है। हम एक आदर्श राज्य की स्थापना चाहते हैं। इसलिए प्रारंभ में धर्म राज्य की बात कही, बाद में अयोध्या आंदोलन के प्रकाश में हमने राम राज्य की स्थापना को अपने लक्ष्य के रूप में लोगों के सामने रखा। धर्म राज्य और राम राज्य में कोई अंतर नहीं है। दोनों में लक्षण समान हैं, किंतु कभी-कभी समय में परिवर्तन के साथ कोई शब्दावली अधिक आकृष्ट हो जाती है।

अटल जी का कहना था कि जब जनसंघ की स्थापना हुई तो विश्व साम्यवाद और पूंजीवाद में बंटा हुआ था। भारतीय चिंतन ने दोनों को अस्वीकार किया था। हम राज्य शक्ति और आर्थिक शक्ति का एकत्रीकरण नहीं चाहते, न कुछ व्यक्तियों के हाथों में और न राज्य के ही हाथों में, हम विकेंद्रित व्यवस्था के हामी हैं। साम्यवाद शोषण से मुक्ति और राज्य के तिरोहित होने की बात करता है, लेकिन व्यवहार में वह केंद्रीकरण का पक्षधर बन कर खड़ा है।

पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों की विफलता सुनिश्चित जान कर ही दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद का प्रतिपादन किया, जिसमें पूंजीवाद की तरह न तो समस्याओं को टुकड़ों में देखा जाता है और न व्यक्ति की स्वतंत्रता व उसके पुरुषार्थ पर पानी फेर कर एक अधिनायकवादी व्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है। अटल जी का कहना था कि पश्चिमी सभ्यता एक नए संकट में फंस रही है।

नए आर्थिक सुधारों के बाद हम भी उसी गलत दिशा में जा रहे हैं। बाजारी अर्थ-व्यवस्था के मूल में कोई गहरा जीवन-दर्शन नहीं हो सकता। केवल धन कमाना ही जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। जीवन के लिए अर्थ जरूरी है, किंतु अर्थ के संबंध में और भी बातें आवश्यक हैं। अगर हम शरीर की रचना देखें, तो उसमें पेट के ऊपर मस्तिष्क और फिर सब का संचालन करने वाली आत्मा का स्थान दिखाई देता है। मनुष्य मात्र मुनाफा कमाने का साधन नहीं बन सकता। आहार, निद्रा और भय मनुष्य और पशु में समान हैं। बुद्धि और भावना मनुष्य और पशु को अलग करती है। पेट के साथ मनुष्य के मस्तिष्क को भी भोजन चाहिए। बौद्धिक दृष्टि से उसका विकसित होना जरूरी है। उसके मन में करुणा, संवेदना और संतोष होना चाहिए।

अटल जी की मान्यता रही कि भारतीय जनता पार्टी एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में उभरी है। हमारी बढ़ती हुई शक्ति और प्रभाव से आतंकित होकर भिन्न-भिन्न विचारों वाले हमारे इर्द-गिर्द जमघट बना रहे हैं। पहले कांग्रेस के विरुद्ध गैर कांग्रेसी हवा चलती थी, अब भाजपा के विरुद्ध एकत्रीकरण हो रहा है। लेकिन यह टिकेगा नहीं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि यदि हमारी प्रगति में रुकावट आएगी, तो हमारी अपनी ही कमियों और खामियों के कारण आएगी, न कि विरोधियों के कारण।

आज भारतीय जनता पार्टी और देश का भविष्य एक-दूसरे से संबद्ध हो गए हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर हम पिछड़ जाएं, हार मान जाएं, छोटे-छोटे विवादों में फंस जाएं, तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी क्षमा नहीं करेगी। देश की स्थिति पर और संगठन की आवश्यकता पर हम कार्यकर्ता के नाते विचार करें और कार्यकर्ता के नाते ही व्यवहार करें। हम चाहे जितनी बड़ी सत्ता हासिल कर लें या हम कितनी ही ऊंचाई पर क्यों न पहुंच जाएं, पर हमें और हमारे संगठन को इतनी ऊंचाई पर जिन कार्यकर्ताओं और जनता ने पहुंचाया, उन्हें हमें अपनी आंखों से कभी ओझल नहीं करना चाहिए।

हमारी सफलता सुनिश्चित है और आवश्यकता है चिंतन के अनुरूप सही व्यवहार करने की। प्रशिक्षण वर्ग में दिया गया अटल जी का यह उदबोधन हमारे लिए आज भी प्रेरणादायक है। उनकी पुण्यतिथि पर उनके दिए विचारों पर यदि हम सदैव चिंतन करते रहे और सदैव चलते रहे, तो न हम भटकेंगे और न ही देश को भटकने देंगे।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

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