non-conventional sources of energy being adopt environmentally friendly – राजनीतिः पर्यावरण संकट और अक्षय ऊर्जा

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योगेश कुमार गोयल

आाधुनिक जीवनशैली का अविभाज्य अंग बन चुकी ऊर्जा का सीधा संबंध पर्यावरण से है। ऊर्जा से ही विकास के द्वार खुलते हैं। इसलिए ऊर्जा पर ही अब हमारा समस्त जीवन निर्भर है। ऊर्जा के बिना आधुनिक सभ्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन चिंताजनक स्थिति यह है कि दुनियाभर में अब जिस कदर ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, उसे देखते हुए विशेषज्ञ आशंका जता रहे हैं कि अगर ऊर्जा के पारंपरिक स्रोत खत्म हो गए या मांग के मुकाबले ऊर्जा की उपलब्धता बेहद कम रह गई, तो क्या होगा? तब आधुनिक सभ्यता का विकास कैसे होगा? इसी चिंता को समझते हुए पिछले कुछ समय से ऊर्जा के ऐसे गैर परंपरागत स्रोतों को अपनाने की ओर तेजी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं, जो पर्यावरण हितैषी होने के साथ-साथ ऊर्जा के टिकाऊ और नष्ट न होने वाले स्रोत भी हों। दरअसल, अब तक कोयला, गैस, पेट्रोलियम जैसे ऊर्जा के जिन परंपरागत साधनों का उपयोग किया जा रहा है, वे पर्यावरण के लिए तो बहुत खतरनाक साबित हो ही रहे हैं, धरती पर उनकी उपलब्धता भी सीमित होती जा रही है।

जलवायु संकट, मौसम का साल दर साल बिगड़ता मिजाज, घटते वन जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं की जड़ में काफी हद तक ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों का बड़ा योगदान है। यही कारण है कि अब दुनियाभर में कई देश अक्षय ऊर्जा के ऐसे विभिन्न स्रोतों और तकनीक को विकसित करने और अपनाने के लिए प्रयासरत हैं, जिनसे न केवल पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त हो सके, बल्कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन न्यूनतम हो और पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी मदद मिले। अक्षय ऊर्जा का अर्थ है, ऊर्जा के ऐसे स्रोत, जिनका कभी क्षय नहीं होता अथवा उनका नवीकरण होता रहता है। दरअसल, प्रकृति ने ही हमें ऊर्जा के कई ऐसे स्रोत प्रदान किए हैं, जिनका उपयोग कर विभिन्न देश अपनी-अपनी ऊर्जा जरूरतों को काफी हद तक पूरा कर सकते हैं। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल-विद्युत ऊर्जा, ज्वार-भाटा से प्राप्त ऊर्जा, बायोमास, जैव ईंधन इत्यादि अक्षय ऊर्जा के ऐसे ही प्रकृति प्रदत्त महत्त्वपूर्ण साधन हैं। अक्षय ऊर्जा के विकास को लेकर जागरूकता अभियान चलाने के उद्देश्य से वर्ष 2004 में केंद्र सरकार ने अक्षय ऊर्जा दिवस की शुरुआत की थी।

प्रदूषणकारी और सीमित मात्रा में उपलब्ध पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के बजाय अब अक्षय ऊर्जा से ही ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में सौर ऊर्जा परियोजनाएं भी स्थापित की जा रही हैं। पिछले महीने मध्य प्रदेश के रीवा में भी सात सौ पचास मेगावाट क्षमता की चार हजार करोड़ की लागत से बनी अत्याधुनिक मेगा सौर ऊर्जा परियोजना का उद्घाटन किया गया था। इस ऊर्जा संयंत्र की शुरुआत के साथ ही भारत दुनिया के सौर ऊर्जा उत्पादक शीर्ष पांच देशों में सम्मिलित हो गया। रीवा सौर ऊर्जा परियोजना के बारे में बताया गया है कि इससे उत्पादित होने वाली बिजली के कारण वातावरण में प्रतिवर्ष 15.7 लाख टन कार्बन डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन कम होगा। इस सौर ऊर्जा संयंत्र से उत्पादित बिजली का छिहत्तर फीसद हिस्सा मध्य प्रदेश की पावर मैनेजमेंट कंपनी (पीएमसी) और चौबीस फीसद हिस्सा दिल्ली मेट्रो को मिल रहा है। कर्नाटक के पावगाड़ा में 2050 मेगावाट के सौर पार्क सहित देश में कुछ और सौर पार्क और सौर संयंत्र भी सौर ऊर्जा के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

आज के प्रदूषित माहौल में कोयले और जल से प्राप्त होने वाली बिजली पर निर्भर रहने के बजाय देश को ऐसे ही सौर संयंत्रों और सौर पार्कों की अत्यधिक आवश्यकता भी है। दरअसल सौर ऊर्जा न केवल भरोसेमंद है, बल्कि शुद्ध और सुरक्षित भी है। सौर ऊर्जा को इसलिए भरोसेमंद, शुद्ध और सुरक्षित माना जाता है क्योंकि सूर्य अनंतकाल तक ऊर्जा का स्रोत बना रहेगा। जल और कोयले से बनी बिजली न तो देश को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक हो सकती है, न ही पर्यावरण संरक्षण में। इसके लिए जरूरी है विकिरण और प्रदूषण के खतरों से रहित स्वच्छ और किफायती ऊर्जा का उत्पादन, जिसमें भारत अब इस दिशा में बढ़ रहा है।

दुनियाभर में बिजली उत्पादन के लिए ताप बिजली घरों में कोयला, गैस इत्यादि को जला कर पानी गर्म करके उत्पन्न की जाने वाली भाप से ऊष्मीय ऊर्जा का इस्तेमाल कर प्रमुख टरबाइन चलाए जाते हैं। भाप बनाने के लिए पानी को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिसके लिए कोयला, सौर ताप, एटमी गर्मी, कचरा और जैव र्इंधन उपयोग किया जाता है। कई देशों में अभी भी बिजली पैदा करने के लिए भाप से चलने वाले टरबाइनों का ही उपयोग किया जाता है। लेकिन मुश्किल यह है कि ताप बिजली घरों में भाप पैदा करने के लिए कोयला, कचरा और अन्य प्रकार का र्इंधन जलाने से पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचती है, साथ ही कोयला या अपशिष्ट जलाने के बाद बचने वाले अवशेषों के निबटारे का बड़ा संकट बना रहता है। इन्हीं पर्यावरणीय खतरों को देखते हुए अब बिजली पैदा करने के लिए सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा के अन्य स्रोतों को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। दुनियाभर में वायु प्रदूषण अब एक बड़े स्वास्थ्य संकट के रूप में उभरा है। इसका बड़ा कारण ताप बिजली घरों से उत्सर्जित होने वाली गैसें और राख है। इसीलिए आज स्वच्छ वातावरण के लिए कोयला आधारित ताप बिजली घरों के बजाय स्वच्छ और हरित ऊर्जा (क्लीन और ग्रीन एनर्जी) की पूरी दुनिया को जरूरत है।

पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से पश्चिमी देशों ने भी अब चरणबद्ध तरीके से कोयले से चलने वाले बिजलीघरों को बंद कर अक्षय ऊर्जा से बिजली बनाने की दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया है। आईसलैंड तो दुनिया का एकमात्र ऐसा देश बन चुका है, जहां अक्षय ऊर्जा से ही सौ फीसद बिजली पैदा की जा रही है। स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, कोस्टारिका, निकारागुआ, उरुग्वे जैसे देश भी अक्षय ऊर्जा से ही सौ फीसद बिजली उत्पादन के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं। भारत ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं, लेकिन यह चुनौतियों भरा अभियान है।

भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादन की कई छोटी-छोटी इकाइयां हैं, लेकिन इन सभी इकाइयों को एक ग्रिड में लाना बहुत कठिन कार्य है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में अपार मात्रा में जैवीय पदार्थ, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस और लघु पनबिजली उत्पादक स्रोत तो हैं, लेकिन इनसे ऊर्जा उत्पादन करने वाले उपकरणों का निर्माण देश में बहुत ही कम होता है। ऐसे अधिकांश उपकरण आयात किए जाते हैं, जिससे बिजली उत्पादन की लागत काफी बढ़ जाती है। इसलिए देश को अक्षय ऊर्जा उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए बेहद जरूरी है कि देश के भीतर ही इन उपकरणों के वृहद् स्तर पर निर्माण की व्यवस्था हो।

पिछले कुछ वर्षों में भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन की क्षमता कई गुना बढ़ चुकी है। पवन ऊर्जा के उपयोग से ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की पहल 1986 में शुरू हुई थी। उसके बाद से पवन ऊर्जा उत्पादन की क्षमता काफी बढ़ी है। चीन, अमेरिका और जर्मनी के बाद भारत अब पवन ऊर्जा उत्पादन के मामले में चौथे स्थान पर है। फिलहाल देश में करीब सैंतीस हजार मेगावाट पवन ऊर्जा उत्पन्न हो रही है। जिस प्रकार देश में अक्षय ऊर्जा की ओर तेजी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं, उससे लगता है कि अगले कुछ दशकों में देश की कोयला, गैस इत्यादि प्रदूषण पैदा करने वाले स्रोतों से ऊर्जा पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी।

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