concern in world and country devastation caused by floods and landslides increasing spending huge amount of money to control – राजनीति: बाढ़, भूस्खलन और हमारी नीतियां

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भारत डोगरा

दुनिया और देश दोनों के स्तर पर यह चिंता बढ़ रही है कि बाढ़ और भू-स्खलन से बचाव पर अपार धनराशि खर्च करने के बाद भी इन दोनों आपदाओं से होने वाली तबाही बढ़ रही है। बाढ़ नियंत्रण उपायों में आखिर ऐसी क्या कमी है, जिसके कारण यह संकटपूर्ण स्थिति उत्पन्न हुई है, इस सवाल का जवाब खोजना जरूरी है, ताकि हम बेहतर, अधिक सफलता की संभावना वाली नीतियों की ओर बढ़ सकें। यह चिंतन इस कारण और भी आवश्यक हो गया है, क्योंकि हम जलवायु बदलाव के दौर में पहुंच चुके हैं और इस दौर में कम समय में अधिक वर्षा केंद्रित होने की संभावना व्यक्त की गई है। दूसरे शब्दों में, हमें बाढ़ के संकट का अधिक सामना करने के लिए पहले से भी और तैयार रहने की जरूरत है।

बाढ़ के खतरे की संभावना वाले किसी भी क्षेत्र के लोगों को सबसे पहला बचाव का उपाय प्राय: यही नजर आता है कि उनके क्षेत्र को नदी से बचाने के लिए एक दीवार या तटबंध बना दिया जाए। इसका आसपास के अन्य इलाकों पर क्या असर होगा, या दस-बीस वर्ष बाद उनके अपने गांव या बस्ती पर क्या असर होगा, प्राय: इस बारे में अधिक विचार उस समय नहीं किया जाता है। इसी तरह एक अधिक व्यापक क्षेत्र को बाढ़ से बचाने का सवाल आता है, तो प्राय: यह कहा जाता है कि नदी के ऊपर के क्षेत्र में बांध बना कर वहां अतिरिक्त पानी रोक दिया जाए। पर इस प्रक्रिया में जो अनेक पेचीदगियां व समस्याएं हैं, उन पर उस समय अधिक सोचा नहीं जाता। बाद में इन निर्माण कार्यों से अनेक समस्याएं उत्पन्न होती हैं तो एक बार फिर किसी कामचलाऊ उपाय के बारे में सोचा जाता है। यदि इस तरह से कार्य करने के स्थान पर एक अधिक समग्र व दीर्घकालीन, समुदाय-आधारित सोच से काम किया जाए, तो बाढ़ नियंत्रण में सफलता की संभावना बढ़ सकती है।

बाढ़ नियंत्रण उपाय के रूप में तटबंधों की अपनी कुछ सीमाएं हैं। दूसरे निर्माण कार्य और रख-रखाव में लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण हमने इनसे जुड़ी समस्याओं को और भी बहुत बढ़ा दिया है। तटबंध द्वारा नदियों को बांधने की एक सीमा तो यह है कि जहां कुछ बस्तियों को बाढ़ से सुरक्षा मिलती है, वहां कुछ अन्य बस्तियों के लिए बाढ़ का संकट बढ़ने की संभावना भी पैदा हो जाती है। अधिक गाद लाने वाली नदियों को तटबंध से बांधने में एक समस्या यह भी है कि नदियों के उठते स्तर के साथ तटबंध को भी निरंतर ऊंचा करना पड़ता है। जो बस्तियां तटबंध और नदी के बीच फंस कर रह जाती हैं, उनकी दुर्गति के बारे में जितना कहा जाए कम है। ऐसे लोगों के पुनर्वास के संतोषजनक प्रयास बहुत कम हुए हैं।

इतना ही नहीं, तटबंधों द्वारा जिन बस्तियों को सुरक्षा देने का वायदा किया जाता है, उनमें भी बाढ़ की समस्या बढ़ सकती है। यदि वर्षा जल के नदी में मिलने का मार्ग अवरुद्ध कर दिया जाए और तटबंध में इस पानी के नदी तक पंहुचने की पर्याप्त व्यवस्था न हो, तो दलदली और बाढ़ की एक नई समस्या उत्पन्न हो सकती है। यदि नियंत्रित निकासी के लिए जो कार्य करना था, उसकी जगह छोड़ दी गई है और सरकारी ढर्रे के चलते उस काम को पूरा नहीं किया गया, तो भी यहां से बाढ़ का पानी बहुत वेग से आ सकता है। तटबंध द्वारा ‘सुरक्षित’ की गई आबादी के लिए सबसे कठिन स्थिति तो तब उत्पन्न होती है, जब निर्माण कार्य या रख-रखाव उचित न होने के कारण तटबंध टूट जाते हैं और अचानक बहुत-सा पानी उनकी बस्तियों में प्रवेश कर जाता है। इस तरह जो बाढ़ आती है, वह नदियों के धीरे-धीरे उठते जल-स्तर से कहीं अधिक विनाशकारी होती है।

बांध निर्माण से कितनी बाढ़ सुरक्षा हो रही है, इस बारे में भी कुछ सवाल उठाए जाने जरूरी हैं। बांध प्राय: सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के लिए बनाए जाते हैं, पर साथ ही उनसे बाढ़ नियंत्रण का महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त होगा, यह भी कहा जाता है। यह लाभ तभी प्राप्त हो सकता है जब अधिक वर्षा के समय बांध के जलाशय में पर्याप्त जल रोका जा सके और बाद में उसे धीरे-धीरे नियंत्रित ढंग से छोड़ा जा सके। लेकिन पहाड़ों में जो वन-विनाश और भू-कटाव हुआ है, उससे जलाशयों में भारी मात्रा में मिट्टी-गाद भर गई है और जल रोकने की क्षमता कम हो गई है। इसी कारण तेज वर्षा के दिनों में पानी भी बहुत अधिक होता है, क्योंकि वर्षा के बहते जल का वेग कम करने वाले पेड़ कट चुके हैं। बांध के संचालन में सिंचाई और पनबिजली के लिए जलाशय को अधिक भरने का दबाव होता है।

दूसरी ओर वर्षा के दिनों में बाढ़ से बचाव के लिए जरूरी होता है कि जलाशय को कुछ खाली रखा जाए। दूसरे शब्दों में बांध के जलाशय का उपयोग यदि बाढ़ बचाव के लिए करना है, तो पनबिजली के उपयोग को कुछ कम करना होगा। जब ऐसा नहीं होता है तो जलाशय में बाढ़ के पानी को रोकने की क्षमता नहीं रहती है। ऐसी स्थिति में बहुत सा पानी वेग से एक साथ छोड़ना पड़ता है जो भयंकर विनाश उत्पन्न कर सकता है। और भी कई कारणों से बाढ़ से होने वाली क्षति बढ़ी है। जैसे, जल निकासी के रास्तों को अवरुद्ध करते हुए नई बस्तियां बसाना (विशेषकर शहरी क्षेत्रों में व शहरीकृत हो रहे क्षेत्रों में), सड़कों, नहरों और रेल मार्गों के निर्माण के समय निकासी की पर्याप्त व्यवस्था न करना, संसाधनों के अभाव या दुरुपयोग के कारण वर्षा से पहले नालों की सफाई जैसे जरूरी कार्य न करना आदि।

भू-स्खलन की भी यही स्थिति है कि इससे बचाव पर हो रहे खर्च के बावजूद यह आपदा बढ़ रही है। विज्ञान पत्रिका ‘ज्योलोजी’ ने हाल में उपलब्ध जानकारी व आंकड़ों के आधार पर दावा किया है कि विश्व में भू-स्खलन के कारण होने वाली मौतों की संख्या वास्तव में पहले के अनुमानों की अपेक्षा दस गुना अधिक हो चुकी है। अधिक भूस्खलन वाले क्षेत्रों में भारत के अनेक पर्वतीय क्षेत्र भी बताए गए हैं। इस ओर विशेष ध्यान देना जरूरी है कि पर्वतीय क्षेत्रों में किन मानवीय कारणों व गलतियों से भू-स्खलन की घटनाएं और इनसे होने वाली क्षति बढ़ी है।

एक बड़ी वजह तो यह है कि विभिन्न निर्माण कार्यों (विशेषकर बांध निर्माण) और खनन के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में विस्फोटकों का अंधाधुंध उपयोग किया गया है। इस कारण भू-स्खलन का खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा वन-विनाश भी भू-स्खलन के खतरे को बढ़ाने का बड़ा कारण बना है। भू-स्खलन अपने आप में तो बड़ी आपदा है ही, साथ में यह बाढ़ को और उग्र करता है। यदि हिमालय में किसी नदी का बहाव भू-स्खलन के मलबे के कारण रुक जाता है, तो इससे कृत्रिम अस्थायी झील बनने लगती है और जब पानी का वेग अधिक होने से जब यह झील फूटती है, तो बहुत प्रलयकारी बाढ़ आ सकती है।

यदि स्थानीय समुदायों की भागीदारी से बाढ़ व भू-स्खलन के विभिन्न पक्षों की सही समझ बनाई जाए और इन आपदाओं को कम करने के लिए बहुपक्षीय उपाय किए जाएं, जिनमें अल्पकालीन के साथ दीर्घकालीन जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए, तो बाढ़ व भू-स्खलन नियंत्रण से कहीं बेहतर सफलता प्राप्त हो सकती है। इसके लिए एक समग्र दृष्टिकोण बहुत जरूरी है। सरकारी स्तर पर भी विभागीय कार्यों के बंटवारे से ऊपर उठ कर समग्र सोच अपनानी होगी।

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