jansatta raajneeti column the weakening roots of democracy – राजनीतिः जनतंत्र की कमजोर होती जड़ें

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ज्योति सिडाना

आजादी के बाद हर नागरिक की आंख के आंसू पोंछना, लोगों के दर्द पर मरहम लगाना, समानता की स्थापना, निर्भीकता आदि पर बल दिया तथा गरीबी और अशिक्षा को खत्म करने के संकल्प के साथ लोकतांत्रिक भारत के जन्म का सपना देखा गया था। 26 जनवरी, 1950 उत्तर औपनिवेशिक भारत के इतिहास का मील का पत्थर है। इस दिन भारत के नागरिकों ने स्वयं को कुछ सार्वभौमिक मूल्यों के प्रति समर्पित किया था और चुनी हुई सरकारों को यह दायित्व दिया था कि वे विकास कार्यक्रमों का संचालन इस प्रकार करें कि संविधान हमारी जीवन पद्धति को निर्धारित करने लगे और हम भारत के नागरिक एक शोषण मुक्त वातावरण में सांस ले सकें। जनतंत्र का समाजशास्त्र इस शोषण मुक्त वातावरण से निर्मित होता है और इसी पर खत्म भी हो जाता है। हम भारत के नागरिक इस शोषण मुक्त वातावरण और संबंधित विकास कार्यक्रमों का सपना पिछले इकहत्तर वर्षों से अपनी चेतना में बनाए बैठे हैं।

भारतीय समाज की संरचना शक्तिशाली और शक्तिहीन समूहों में विभाजित है। जो शक्तिशाली हैं, वे स्वयं के परिवेश में इतने जनतांत्रिक हैं कि जनतंत्र और स्वेच्छाचारिता की विभाजन रेखा को लांघने में उन्हें कोई परहेज नहीं होता। भारत के लोगों की दूसरी श्रेणी पूरी तरह शक्तिहीन है, जिसे केवल चुनाव के समय आश्वासन देकर जगाया जाता है। उसे हर पांच साल में जनतंत्र का सपना देखने को कहा जाता है और सपना दिखाने वाले लोग उस वर्ग को न केवल उत्पीड़ित करते, बल्कि धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग आदि के आधार पर लड़वा कर ‘हम’ और ‘वे’ में ऐसा बांटते हैं कि जनतंत्र शून्य की स्थिति में पहुंच जाता है। लोकतांत्रिक प्रणाली का भविष्य इसी विभाजन से जुड़ा है। शक्तिहीन समूहों का हाशिये पर धकेला जाना लोकतंत्र, खासकर सामाजिक लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसा लगने लगा है कि वैश्वीकरण के बाद जनतंत्र में से ‘जनछ को ‘कॉरपोरेट लॉबी’ द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। यह ‘जन’ अब इतना हाशिये पर है कि इसकी कोई भी व्यथा राज्य सरकारों को सुनाई नहीं देती। राज्य कुछ लोगों को इतना ‘स्मार्ट’ बनाना चाहता है कि बाकी सब इतने पीछे छूट जाएं कि उनके रहने न रहने से कोई फर्क न पड़े, तो क्या जनतंत्र एक तंत्र में बदलने के रास्ते पर चला पड़ा है? और अगर ऐसा है तो फिर आने वाले समय में स्वाधीनता संघर्ष के मूल्य और संविधान के आदर्श न केवल विलुप्त हो जाएंगे, बल्कि उनके स्थान पर जो कुछ पनपेगा वह इतना दमनकारी होगा कि हाशिये पर खड़े लोग अपने-आप को ‘हम भारत के लोगछ कहने में डरने लगेंगे।

इसे विसंगति ही कहा जाएगा कि उच्च वर्ग और मध्यवर्ग का एक बड़ा हिस्सा हाशिये पर धकेले जाने की इस प्रवृत्ति के लिए शक्तिहीन तबके को ही उत्तरदायी मानता है। शिक्षातंत्र और नौकरशाही, नेतृत्व तथा जनमत के अवयव इस विचार के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। संपन्न और शक्तिशाली तबका उत्सवधर्मी होता जाता है। धार्मिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक आयोजनों पर करोड़ों-अरबों रुपए यह कह कर व्यय किए जाते हैं कि ये आमजन के हित में किए जा रहे हैं। संपन्न और शक्तिशाली समूह को सहयोग देने वाले सह-समूह (धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक, राजनीतिक, संकीर्णतावादी) इस विचार का संगठित समर्थन करते हैं। मीडिया और कारपोरेट जगत इसका पक्षधर बनता है, ताकि शक्तिहीन/ वंचित समूहों के संघर्ष और असंतोष को बिखेरा जा सके।

विकास और कल्याण के लिए जो भी नीतियां बनती हैं, वे विश्लेषित नहीं की जातीं। उन्हें बिना विश्लेषण किए लागू करने का प्रयास किया जाता है। नतीजतन, वंचित या शक्तिहीन तबके के एक बहुत छोटे से हिस्से तक नीतियों के कुछ लाभ पहुंच पाते हैं। कहा जा सकता है कि ‘हाशिये में हाशिया’ उभर कर एक नई असमानता दर्शाता है। यानी हाशिये में लाभ प्राप्त कर चुका वह छोटा-सा समूह अपने ही वंचित शेष समूह की उपेक्षा में संलग्न हो जाता है। संरचना की यह असमान जटिलता लोकतंत्र के भविष्य पर सवालिया निशान लगाती है, जिससे न्यायसंगत भारत का स्वप्न चूर-चूर होने लगता है। इस आधारभूत अंतर्विरोध पर ध्यान देने की जरूरत है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि नवउदारवादी नीतियों ने सामाजिक आंदोलनों की धार कमजोर कर दी है। खासकर श्रमिक आंदोलन कमजोर हुए हैं। अब पहले की तरह श्रमिक और छात्र आंदोलन नहीं दिखाई देते। शायद राजनीति के बदलते चरित्र के कारण उभार ले रहे पुनरुत्थानवाद ने आंदोलनों को और कमजोर किया है। अवसरवाद और खरीद-फरोख्त की राजनीति सवाल उठाती है कि जो जनप्रतिनिधि किसी विचारधारा, विकास के आश्वासन और राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा और प्रतिबद्धता जता कर चुने गए थे, वे अपने व्यक्तिगत स्वार्थों, आकांक्षाओं और धन/शक्ति की चकाचौंध में मतदाताओं के साथ विश्वासघात कैसे कर सकते हैं? लोकतांत्रिक राजनीति में मतदाताओं को धोखा देने का अधिकार किसी जनप्रतिनिधि को किसने दिया? कार्यपालिका भी इस अवसर का लाभ उठा कर जनता की उपेक्षा करने लगती है। अनेक बार न्यायपालिका के निर्णय जनता को न्याय की अवधारणा के विषय में सोचने को मजबूर कर देते हैं।

आए दिन छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार, किशोर या युवा पीढ़ी द्वारा परीक्षा या प्रतियोगिता में विफल होने पर आत्महत्या करना, अस्पतालों में मरीजों को उचित उपचार न मिलना, महंगी और लंबी पढ़ाई प्रक्रिया से गुजरने के बाद भी नौकरी की गारंटी न होना या नौकरी मिल भी जाए तो उसकी स्थिरता की गारंटी न होना, कॉर्पोरेट जगत में काम के घंटों का निर्धारित न होना, आवश्यकता से अधिक कार्यभार होना और समय पर काम पूरा न कर पाने की स्थिति में अवसाद में आ जाना, कर्मचारियों की छंटनी कर देना आदि ऐसी घटनाएं हैं, जो लोकतंत्र की अवधारणा को सवालों के घेरे में लाती हैं। हाल ही में कोविड-19 के दौर में अनेक निजी कंपनियों और विश्वविद्यालयों ने अपने कर्मचारियों की भारी संख्या में छंटनी कर दी या फिर उनके वेतन में भारी कटौती कर दी, सवाल करने पर उन्हें नौकरी छोड़ कर जाने की सलाह दी जाती है। एक कल्याणकारी राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने नागरिकों को प्रत्येक प्रकार की सुरक्षा की गारंटी उपलब्ध कराएगा और संविधान में वर्णित मूल्यों की गंभीरता से पालना करेगा और करवाएगा, क्योंकि केवल तभी सच्चा लोकतंत्र मूर्त रूप ले सकता है। ऐसा न होने पर अधिनायकवाद लोकतंत्र का स्थान ग्रहण कर लेता है।

यह कोई पहली बार नहीं है। ऐसा अनेक बार देखा गया है कि बाढ़, सूखा, भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदाओं में सरकारें उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने में असमर्थ रहती हैं। नेता, प्रशासनिक अधिकारी तथा कॉरपोरेट जगत का गठजोड़ प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं यानी चुनौतियों को ‘अवसर’ में बदल कर जन-विश्वास को लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका के प्रति संदेहास्पद बना देता है। अरस्तू ने लिखा था कि ‘लोकतंत्र में गरीबों के पास अमीरों की तुलना में अधिक शक्ति होगी, क्योंकि वे संख्या में अधिक होंगे और बहुमत की इच्छा सर्वोपरि होगी।’ क्या उनका यह कथन कभी मूर्त रूप ले पाएगा? महात्मा गांधी भी मानते थे कि सच्चा लोकतंत्र तभी मूर्त रूप ले सकता है, जब इसमें कमजोर से कमजोर आदमी के पास भी उतने ही अवसर हों, जितने सबसे ताकतवर के पास। वर्तमान स्थिति में यह कैसे संभव बनाया जा सकता है, इस पर चिंतन करने की जरूरत है। इसलिए लोकतंत्र को जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन बनाने के लिए आवश्यकता है कि इसमें प्रत्येक नागरिक की संभावनाओं और समाज और जीवन के प्रत्येक विमर्श में उनके सहभागी होने की क्षमताओं को सम्मिलित किया जाए।

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