Serious crisis on environment and tourism two shipwrecks of Japanese ship on Mauritius coastline Blue Bay Marine and mixing in crude oil water – राजनीति: तेल रिसाव और बिगड़ता पर्यावरण

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मॉरीशस के समुद्री तट ब्लू बे मरीन पर खड़े जापानी जहाज के दो टुकड़े हो जाने से उसमें भरा कच्चा तेल जल सतह पर फैल चुका है। हिंद महासागर में फंसे इस जहाज की टंकियों में करीब चार हजार टन तेल भरा था। स्थानीय लोगों और पर्यावरण व पर्यटन प्रेमियों ने तेल रिसाव को रोकने की कोशिशें भी की, लेकिन तेज हवाओं और खराब मौसम के चलते कामयाबी नहीं मिली। जहाज के निचले हिस्से में आई दरारें चौड़ी होती चली गईं, नतीजतन जहाज दो टुकड़ों में विभाजित हो गया। समुद्र में फैले इस कच्चे तेल से आसपास के द्वीपों में मौजूद कछुओं और दुर्लभ समुद्री पौधों को खतरा उत्पन्न हो गया है।

इन्हें सुरक्षित निकालने के प्रयास जारी हैं। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ ने पर्यावरणीय आपातकाल की घोषणा करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद मांगते हुए कहा है, ‘तेल रिसाव से देश की तेरह लाख आबादी के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। यह देश वैसे भी आजीविका के लिए पर्यटन पर निर्भर है और यहां के समुद्री द्वीप और उन पर पाए जाने वाले जीव-जंतु पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण के केंद्र बिंदु हैं। कोरोना संकट के कारण पहले से ही पर्यटक नहीं आ रहे हैं। अब इस तेल के रिसाव ने इस संकट को ओर बढ़ा दिया है।’ मॉरीशस की मदद के लिए फ्रांस और भारत ने उपकरण व अन्य सामग्री भेजे हैं।

कच्चा खाद्य तेल, पेट्रोलियम पदार्थ, कोयला और प्राकृतिक गैसों के लगातार बढ़ते उपयोग से पैदा हो रहा प्रदूषण पर्यावरण के लिए बढ़ा खतरा साबित हो रहा है। यही नहीं, वायु में घुल जाने वाले इस प्रदूषण से सांस, फेफड़ों के कैंसर, हृदय व त्वचा रोग संबंधी बीमारियों में इजाफा हो रहा है। खाद्य तेल व पेट्रोलियम पदार्थों का समुद्री जल में रिसाव होने से जल प्रदूषण बढ़ता है। ये पदार्थ एक साथ मिट्टी, पानी, हवा को दूषित करते हुए मानव जीवन के लिए वरदान की बजाय, अभिशाप साबित हो रहे हैं। मॉरीशस ही नहीं, दुनिया के समुद्री तटों पर तैलीय पदार्थों और औद्योगिक कचरे से भयावह पर्यावरणीय संकट पैदा हो रहे हैं। तेल के रिसाव और तेल टैंकों के टूटने से समुद्र का पारिस्थितिकी-तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

आए दिन समुद्री तल पर तीन हजार मीट्रिक टन से भी ज्यादा तेल फैलने और आग लगने के समाचार आते रहते हैं। यदि राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट पर गौर करें, तो केरल के तटीय क्षेत्रों में तेल से उत्पन्न प्रदूषण के कारण झींगा और चिंगट मछलियों का उत्पादन पच्चीस फीसद कम हो गया है। कुछ साल पहले डेनमार्क के बाल्टिक बंदरगाह पर एक हजार नौ सौ टन तेल के फैलाव के कारण प्रदूषण संबंधी एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी।

इक्वाडोर के गौलापेगोस द्वीप समूह के पास समुद्र के पानी में लगभग साढ़े छह लाख लीटर डीजल और भारी तेल के रिसाव से मिट्टी और समुद्री जीवों के लिए बड़ा खतरा खड़ा हो गया था। टैंक से लगभग दो हजार मीट्रिक टन एकोनाइटिल एसीएन रसायन फैल जाने से क्षेत्रवासियों का जीवन संकट में पड़ गया था। इस घटना के ठीक पहले कांडला बंदरगाह पर ही समुद्र में फैले लगभग तीन लाख लीटर तेल से जामनगर के पास कच्छ की खाड़ी के उथले पानी में स्थित समुद्री राष्ट्रीय उद्यान में दुर्लभ जीव-जंतुओं की कई प्रजातियां मारी गईं थीं।

जापान की राजधानी टोक्यो के पश्चिमी तट पर तीन सौ सत्रह किलोमीटर की पट्टी पर तेल के फैलाव से जापान के तटवर्ती शहरों में हाहाकार मच गया था। इसी तरह रूस में बेलाय नदी के किनारे बिछी तेल पाइप लाइन से एक सौ पचास मीट्रिक टन तेल के रिसाव ने यूराल पर्वत पर बसे ग्रामवासियों के समक्ष पेयजल का संकट खड़ा कर दिया था। सैनजुआन जहाज के कोरल चट्टानों से टकरा जाने के कारण अटलांटिक तट पर करीब तीस लाख लीटर तेल का रिसाव होने से समुद्री जीव प्रभावित हुए थे। मुंबई हाई से लगभग एक हजार छह सौ मीट्रिक तेल का रिसाव हुआ था।

इसी तरह बंगाल की खाड़ी में क्षतिग्रस्त टैंकर से तेल के फैलने से निकोबार द्वीप समूह में तबाही मच गई थी, जिससे यहां रहने वाली जनजातियों और समुद्री जीवों को भारी हानि हुई। लाइबेरिया के एक टैंकर से पचासी हजार मीट्रिक टन रिसे तेल ने स्कॉटलैंड में पक्षी-समूहों को भारी हानि पहुंचाई थी। सबसे भयंकर तेल का फैलाव अलास्का में हुआ था। यह रिसाव प्रिंस विलियम साउंड टेंकर से हुआ था। इस तेल के फैलाव का असर छह महीने से ज्यादा समय तक रहा।

अमेरिका और इराक के युद्ध में सद्दाम हुसैन ने समुद्र में भारी मात्रा में तेल छोड़ दिया था। यह तेल इसलिए छोड़ा गया था, जिससे यह अमेरिका के हाथ न लग जाए। अमेरिका द्वारा इराकी तेल टेंकरों पर की गई बमबारी से भी लाखों टन तेल समुद्री सतह पर फैला था। एक अनुमान के मुताबिक इस कच्चे तेल की मात्रा दस लाख बैरल थी। इस तेल के बहाव ने फारस की खाड़ी में घुस कर जीव जगत के लिए भारी हानि पहुंचाई थी। इस प्रदूषण का असर मिट्टी, पानी और हवा तीनों पर रहा था।

एक अनुमान के मुताबिक दो सौ खरब रुपए की पर्यावरणीय क्षति अकेले पेट्रोलियम पदार्थों के इस्तेमाल के कारण उठानी पड़ रही है। इस वजह से 42.6 प्रतिशत कोयले से और 37.4 प्रतिशत प्राकृतिक गैसों के प्रयोग से पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। तेल रिसाव से जो मिट्टी का क्षरण होता, वह हानि करीब दो सौ अरब रुपए के लगभग है, जो कुल कृषि उत्पाद का पच्चीस फीसद तक है। ईंधन उपयोग में विश्व में भारत का पांचवा स्थान है और 1981 से 2002 के बीच इसमें सालाना छह फीसद और 2003 से 2016 तक बारह फीसद की वृद्धि हो रही है। पेट्रोलियम पदार्थों से होने वाली पर्यावरणीय हानि इन्हें आयात करने में खर्च होने वाली करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा के अलावा है। गौरतलब है कि भारत अपनी कुल पेट्रोलियम जरूरतों की आपूर्ति का सत्तर फीसद तेल आयात करके करता है।
दुनिया में करीब चौंसठ करोड़ वाहन मार्गों पर गतिशील हैं। इनमें इस्तेमाल हो रहे डीजल-पेट्रोल प्रदूषण का मुख्य कारण है। प्रदूषण रोकने के तमाम उपायों के बावजूद एक सौ पचास लाख टन कार्बन मोनोआक्साइड, दस लाख टन नाइट्रोजन आक्साइड और पंद्रह लाख टन हाइड्रोकार्बन हर साल कार्बन डाइआक्साइड पैदा करती है, जो ओजोन-परत के लिए खतरा बन रही है। विकसित देश वायुमंडल प्रदूषण के लिए सत्तर प्रतिशत दोषी हैं, जबकि विकासशील देश 30 प्रतिशत।

विश्व बैंक ने जल प्रदूषण के कारण समुद्र तटीय क्षेत्रों में रहने वालों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की कीमत एक सौ दस रुपय प्रति व्यक्ति आंकी है। इस दूषित जल से मछलियां कैंसर से पीड़ित हो जाती हैं। अनजाने में मांसाहारी लोग इन्हीं रोगग्रस्त जीवों को आहार बना लेते हैं। इस कारण मांसाहारियों में त्वचा संबंधी रोग व अन्य लाइलाज बीमारियों घर कर जाती हैं। बहरहाल समुद्र में फैलते तैलीय पदार्थ वायुमंडल और मानव जीवन को संकट में डालने वाले साबित हो रहे हैं।

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