shivsena had demanded first maharashtra that 80 percent jobs must be given to son of soil

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हाइलाइट्स:

  • शिवसेना ने सामना सम्पादकीय में एमपी के मामाजी की सरकार पर कसा तंज
  • शिवराज सिंह चौहान सरकार पर लगाया दोहरी राजनिति का आरोप
  • स्थानीय युवाओं को ही नौकरी देने पर उठाये सवाल
  • एमपी सरकार के इस कदम पर केंद्र को लिया आड़े हाथ
  • सामना में लिखा शिवसेना की पहले से यह भूमिका है लेकिन सबको इस पर आपत्ति थी

मुंबई
शिवसेना के मुखपत्र सामना (shivsena mouth piece samna) में मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार (shivraj singh chauhan government) पर तंज कसा गया है। सामना में शिवराज सरकार द्वारा हाल ही में लिए गए सरकारी नौकरियों में सिर्फ प्रदेश के युवाओं को प्राथमिकता देने वाली बात पर शिवसेना ने सामना में लिखा है कि रोजगार में भूमिपुत्रों को ही प्राथमिकता मिलने का आंदोलन शिवसेना ने शुरू किया।

50 साल पहले शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने जिन विचारों की चिंगारी सुलगाई उससे देश में हलचल मच गई। प्रांतवादी, जातिवादी और राष्ट्रीय एकता के हत्यारे जैसे कई आरोप शिवसेना प्रमुख पर लगाए गए। लेकिन शिवसेना भूमिपुत्रों को लेकर अपनी बात पर अटल रही। अंततः मराठियों को उसका फल मिला ही।

शिवराज भी शिवसेना की राह पर
प्रदेश के मामा जी की सरकार भी अब इस दिशा में आगे बढ़ रही है। अब मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने भी अपने राज्य में भूमिपुत्रों को ही प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। यह प्राथमिकता सरकारी नौकरियों में तो रहेगी ही, निजी क्षेत्रों में भी दिखेगी। मध्य प्रदेश की सभी नौकरियां वहां के भूमिपुत्रों के लिए होंगी, ये नीति शिवराज सिंह चौहान सरकार शत-प्रतिशत लागू करनेवाली है।

मतलब जिस प्रकार महाराष्ट्र में 80 प्रतिशत नौकरियां भूमिपुत्रों को और 20 प्रतिशत अन्य लोगों वाली नीति है, उस प्रकार का विभाजन शिवराज सरकार करने को तैयार नहीं है।

एमपी की राजनीति में भी लागू होगा यह नियम?
शिवसेना ने यह सवाल पूछा है की क्या यह फैसला सिर्फ नौकरियों तक ही सीमित रहेगा या राजनीति में भी लागू होगा? ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस राज से भाजपा में आए और भाजपा के सारे पुराने भूमिपुत्रों को धता बताकर सिंधिया और उनके सहयोगियों को रोजगार (राजनीतिक) उपलब्ध कराया गया। इसलिए भूमिपुत्रों को प्राथमिकता का कानून मध्य प्रदेश में राजनीतिज्ञों पर लागू नहीं है, ऐसा दिख रहा है। मतलब ये सिर्फ सरकारी नौकरियों तक ही सीमित है।

शिवसेना पर उंगली उठाने वाले अब चुप क्यों?
मध्य प्रदेश में स्थानीय लोगों को नौकरियां देने का कानून आया तो दिल्ली सहित देश के राष्ट्रीय एकता वालों के मन में अब तक कोई हलचल क्यों नहीं मची? महाराष्ट्र में जब-जब स्थानीय लोगों को रोजगार देने में प्राथमिकता की बात सामने आई, तब-तब एकता के सर्वदलीय ठेकेदार संसद से लेकर राज्य की विधानसभा तक महाराष्ट्र के नाम से शोर मचाते रहे।

इसी प्रकार का कानून आंध्र प्रदेश में पिछले वर्ष आया, जिसके अंतर्गत निजी नौकरियों में स्थानीय लोगों को 75 प्रतिशत का आरक्षण दिया गया और उस समय भी किसी को राष्ट्रीय एकता की चिंता नहीं हुई। हर राज्य अपने लोगों का खयाल रखता है लेकिन अगर महाराष्ट्र वैसा खयाल रखे तो देशभर के लोगों में हलचल मच जाती है।

देश के लोगों को रोजगार देने वाला राज्य है महाराष्ट्र
मुंबई सहित महाराष्ट्र पूरे देश का पेट पालता है। रोजगार और पेट भरने के बारे में मुंबई की अवस्था ‘आओ जाओ घर तुम्हारा और खर्चा पानी हमारा’ जैसी हो गई है। अकेला मुंबई शहर देश की तिजोरी में 25 प्रतिशत हिस्सा भरता है। तब देश की गाड़ी आगे बढ़ती है। लेकिन जब कोई संकट आता है और महाराष्ट्र केंद्र से सहायता मांगता है तो मेहरबानी करते हुए थाली में टुकड़े फेंके जाते हैं।

कोरोना काल में मुंबई-महाराष्ट्र के लाखों पर-प्रांतीय मजदूरों को दो समय भोजन की व्यवस्था की गई। उन्हें उनके राज्यों में भेजने का बंदोबस्त किया गया। लेकिन जैसे ओडिशा के नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी ने कृतज्ञता के दो शब्द व्यक्त किए, वैसे अन्य राज्यों ने किए क्या?

सबकी जिम्मेदारी सिर्फ महाराष्ट्र ही संभालेगा?
सामना में बिहार के सीएम से भी सवाल पूछा है कि नीतीश कुमार ने यह किसके भरोसे बोल दिया कि यह मजदूर वर्ग अब दोबारा महाराष्ट्र में नहीं लौटेगा? और उन्हें आवश्यकता होगी तो हमसे अनुमति लेनी पड़ेगी। आज उत्तर प्रदेश और बिहार में रोजी-रोटी की व्यवस्था नहीं है इसलिए उन राज्यों से रोज हजारों मजदूर मुंबई की ओर भागकर आ रहे हैं।

मध्य प्रदेश ने तो अपने दरवाजे ही बंद करके रखे इसलिए रोजगार के लिए लाखों लोग फिर से मुंबई की दिशा में कूच कर रहे हैं। कुछ लोग अपने हाथ भले ही उठा लें लेकिन राष्ट्रीय एकता की जिम्मेदारी महाराष्ट्र को ही संभालनी होगी।

कोरोना ने बढ़ाई बेरोजगारी
कोरोना के कारण देशभर में बेरोजगारी का विस्फोट हो गया है। 14 करोड़ लोगों ने अपना रोजगार गंवा दिया है। मुंबई-पुणे जैसे शहरों के निर्माण व्यवसाय, होटल, पर्यटन, यातायात उद्योग ठप हो चुके हैं। ऐसे समय में स्थानीय लोगों के समक्ष रोजगार का संकट आन पड़ा है। सिनेमा और नाटक उद्योग बंद है। मंदिर बंद होने के कारण पुजारी, कीर्तन-भजन करके गुजारा करनेवाले, मंदिरों के बाहर हार-फूल, नारियल व प्रसाद बेचकर अपना घर चलानेवाले भी मुश्किल में हैं।

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