Stone will not run in the historic Gotmar fair this time, a decision to celebrate in a symbolic way | एतिहासिक गोटमार मेला में इस बार नहीं चलेंगे पत्थर , सांकेतिक रूप से मनाने का लिया निर्णय ,19 अगस्त को है आयोजन

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 डिजिटल डेस्के छिन्दवाड़ा/पांढुर्ना। पांढुर्ना में होने वाले खूनी खेल गोटमार में इस साल पत्थर नही चलेंगे और कोई भी लहुलूहान व घायल नही होगा। पोला पर्व के दूसरे दिन पांढुर्ना में होने वाला विश्व प्रख्यात गोटमार मेला इस साल केवल सांकेतिक मात्र रहेगा। मेले पर होने वाले मां चंडिका के पूजन की परंपरा निभाकर और झंडारूपी पलाश का पेड़ मां चंडिका के मंदिर में अर्पित कर मेले का समापन कर दिया जाएगा।
कोरोना संक्रमण के चलते प्रशासन ने इस साल गोटमार मेले के आयोजन स्थगित रखने का निर्णय लिया है। जिस पर मेला आयोजन समिति और शांति समितियों ने भी अपनी हामी भर दी। इन्हीं सभी की सहमति के बाद प्रशासन ने गोटमार मेले को इस बार सांकेतिक रूप में मनाने का ही आदेश जारी कर दिया है। गोटमार मेला सांकेतिक रूप से मनाए जाने के चलते सदियों से चली आ रही मेला आयोजन की परंपरा पर विराम रहेगा और मेले में पत्थर नही बरसेंगे। आगामी 18 अगस्त को पोला पर्व के दूसरे दिन 19 अगस्त को पांढुर्ना में गोटमार मेला होना है।
प्रशासन के प्रयास रहे बेअसर, कोरोना से रूकेगी पत्थरबाजी:
गोटमार की परंपरा सदियों से चली आ रही है। एक-दूसरे पर पत्थर बरसाकर लहुलूहान करने की परंपरा को रोकने प्रशासन ने तमाम प्रयास किए, पर सारे प्रयास असफल रहे। इस साल कोरोना संक्रमण के चलते गोटमार मेला स्थगित किए जाने से पत्थरबाजी पर विराम लगेगा। गोटमार मेले में पत्थरबाजी को रोकने के लिए एक साल पत्थरों की बरसात रोकने रबर बॉल से खेल का प्रयास हुआ, पर चंद मिनटों में ही रबर बॉल सिफर हो गए और खिलाडिय़ों ने पत्थरों से ही खेल खेला। बीते सालों से हर बार गोटमार रोकने प्रयास हुए, मानवाधिकार आयोग ने आपत्ति लीं और पत्थरबाजी को रोकने प्रशासन भी मुस्तैद रहा, पर गोटमार निभाने की परंपरा नही रूक सकी।
खूनी खेल में होती है पत्थरबाजी, खिलाड़ी होते है लहुलूहान:
जाम नदी पर पांढुर्ना और सावरगांव के संगम पर सदियों से गोटमार मेला मनाने की परंपरा निभाई जा रही है। गोटमार मेले में होने वाली पत्थरबाजी के चलते कई लोग लहुलूहान होते है और शरीर से खून की धाराएं भी बहती है, जिससे गोटमार मेले को खूनी खेल भी कहा जाता है। हर साल गोटमार मेले की आराध्य मां चंडिका के मंदिर में हजारों भक्त पहुंचते है और पूजन व दर्शन के साथ मां के चरणों में माथा टेकते है, खिलाड़ी भी मां चंडिका के दर्शन के बाद ही गोटमार में पत्थरबाजी करने उतरते रहे है।
मेले से जुड़ी है किवदंतियां, परंपरा के रूप में मनता है मेला:
गोटमार मेले के आयोजन के पीछे किवदंतियां व कहानियां जुड़ी है और इसे परंपरा के रूप में हर साल मनाया जाता है। नदी के बीच झंडेरूपी पलाश के पेड़ को गाड़कर मेले की परंपरा निभाई जाती है और पत्थरबाजी का खेल खेला जाता है। बड़े-बुजुर्ग बताते है कि मेले के आयोजन के पीछे दो किवदंतियां प्रचलित है। जिसमें एक किवदंती पांढुर्ना के युवक और सावरगांव की युवती के बीच प्रेमसंबंध की है। वहीं दूसरी किवदंती में जाम नदी के किनारे पांढुर्ना-सावरगांव वाले क्षेत्र में भोंसला राजा की सैन्य टुकडिय़ां के सैन्य अभ्यास की। दोनों किवंदतियों को गोटमार मेला आयोजन से जोड़ा जाता है और हर साल परंपरा निभाई जाती है।
खूनी खेल में कईयों ने गंवाई जान, कई हो चुके है घायल: गोटमार मेला सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार मनाया जाता है, पर हर साल मेले के दौरान अपनों को खोने वाले परिवारों का गम भी उभर जाता है। मेले के आते ही क्षेत्र के कई परिवारों के सालों पुराने जख्म हरे हो जाते है। क्योंकि इन परिवारों ने गोटमार खेल में ही अपनों को खोया है। गोटमार के दौरान अब तक किसी का पति, तो किसी का बेटा, किसी का पिता और भाई अपनी जान गवां चुके है। वहीं कई खिलाडिय़ों को शरीर पर मिले जख्म गोटमार के दिन हरे हो जाते है। कोरोना के चलते गोटमार मेला सांकेतिक रूप से मनाने से इस साल पत्थरबाजी नही होगी, जिससे किसी के घायल होने की स्थिति नही रहेगी।

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