Due to Corona crisis, purchasing power decreased, unemployment increased, demand for relief package, people plagued by inflation – राजनीति: घटती क्रय शक्ति का संकट

0
48
.

जयंतीलाल भंडारी

इस साल कोरोना महामारी से उत्पन्न संकटों का एक दुष्प्रभाव यह पड़ा कि इससे देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। लाखों लोगों का रोजगार चला गया, काम-धंधे चौपट हो गए और आम आदमी की आमदनी घट गई। इतना ही नही, ज्यादातर लोगों की जमा-पूंजी भी अब खत्म होती जा रही है।

ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए एक और ऐसा नया राहत पैकेज लाया जाए, जिससे आम आदमी को राहत मिल सके और उसकी क्रय शक्ति बढ़ाई जा सके। आम आदमी की खरीद क्षमता बढ़ा कर ही नई मांग पैदा की जा सकती है और अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाया जा सकता है। देश में किए जा रहे विभिन्न आर्थिक सर्वेक्षणों में यह बात निकल कर आ रही है कि आम आदमी की आय घट गई है और इसे बढ़ाया जाना आवश्यक है।

हाल में भारतीय रिजर्व बैंक के कंज्यूमर कान्फिडेंस सर्वे के मुताबिक कोविड-19 के कारण जिस तरह दुनिया में लोगों की आमदनी घटी है, उसी तरह भारत में भी लोगों की आमदनी काफी कम हो गई है। पिछले महीने किए गए इस सर्वे में शामिल 62.8 फीसद लोगों का मानना है कि कोरोना संकट के कारण उनकी आय घटी है।

जबकि 44.3 फीसद लोगों का मानना है कि पूर्णबंदी में चरणबद्ध तरीके से दी जा रही छूट से अर्थव्यवस्था पटरी पर आ सकती है, लेकिन इसमें वक्त लगेगा। इसी तरह एक अन्य सर्वे में यह सामने आया कि पूर्णबंदी के दौरान करीब इकहत्तर फीसद ग्रामीण परिवारों की मासिक आय में पहले की तुलना में कमी आई है। हालांकि सर्वेक्षण में शामिल करीब चौहत्तर फीसद लोगों ने कहा कि विशेष राहत देकर आमदनी बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए।

इस वक्त बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो अपनी बचत के सहारे से गुजारा करने को मजबूर हैं। इसके लिए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के सदस्यों को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने हाल में बताया कि ईपीएफओ को उमंग मोबाइल ऐप से धनराशि निकालने के लिए अप्रैल से जुलाई, 2020 के बीच ग्यारह लाख आवेदन मिले हैं, जो दिसंबर 2019 से मार्च 2020 के बीच मिले तीन लाख सनतानवे हजार आवेदनों के मुकाबले तीन गुना से ज्यादा हैं।

ईपीएफओ ने अप्रैल से मई, 2020 के बीच छत्तीस लाख दावों का निपटान किया। इन दोनों महीनों में 11,540 करोड़ रुपए के दावे ईपीएफ खाताधारकों को दिए गए। इसमें से कोविड-19 अग्रिम सुविधा के तहत 4580 करोड़ रुपए दिए गए।

कोविड-19 से जंग में घरेलू बचत के कारण ही देश में करोड़ों लोग आर्थिक आघात को काफी हद तक झेल गए हैं, लेकिन अब उनके लिए घरेलू बचत का सहारा भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक इस साल जून तक देश के शहरों में रहने वाले करीब 13.9 करोड़ लोगों की बचत समाप्त होने को है।

ऐसे में अब छोटी-छोटी घरेलू बचत के सहारे जी रहे लोग सरकार से विशेष राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं। चूंकि देश में अधिकांश लोगों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है, अतएव वे अपनी सामाजिक सुरक्षा के लिए काफी हद तक घरेलू बचत पर ही निर्भर हैं। हम सामाजिक सुरक्षा के मामले में दुनिया में कितने पीछे है, इसका अंदाजा वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) के ग्लोबल सोशल मोबिलिटी इंडेक्स-2020 में भारत की रैकिंग से लगा सकते हैं। इस सूचकांक में भारत बयासी देशों की सूची में छिहत्तर वें क्रम पर है।

जहां देश में सकल घरेलू बचत अर्थव्यवस्था के लिए लाभप्रद है, वहीं यह भारत में आम आदमी के जीवन की आर्थिक रेखा है। भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक देश में वर्ष 2019-20 में कुल सकल घरेलू बचत 5.6 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गई। सकल घरेलू बचत में घरेलू क्षेत्र, निजी क्षेत्र और सरकारी इन तीनों क्षेत्रों की बचत को शामिल किया जाता है। सामान्यतया आम आदमी की बचत घरेलू क्षेत्र में गिनी जाती है।

यह बचत बैंकों में सावधि जमा (एफडी), जीवन बीमा, शेयर, डिबेंचर, म्युयअल फंड, कॉपरेटिव बैंक में जमा, छोटी बचत योजनाओं और नगद के रूप में संचित रहती है। गौरतलब है कि देश में वर्ष 2012 के बाद सकल घरेलू बचत दर और निवेश दर दोनों में गिरावट आई है। घरेलू बचत योजनाओं में ब्याज दर की कमाई का आकर्षण घटने से सकल घरेलू बचत दर लगातार घटती गई है। लेकिन अभी भी दुनिया के कई विकासशील देशों की तुलना में भारत की सकल घरेलू बचत दर अधिक है।

यदि हम देश की सकल घरेलू बचत दर के आंकड़ों को देखें, तो पाते हैं कि वर्ष 2009 के दौरान जो सकल घरेलू बचत दर 36.02 फीसद थी, वह वित्त वर्ष 2018 के दौरान 32.39 फीसद और 2019 में 30.14 फीसद रह गई। फिर भी छोटी बचत योजनाएं अपनी विशेषताओं के कारण बड़ी संख्या में गरीब वर्ग और नौकरीपेशा लोगों से लेकर मध्यम वर्गीय परिवारों की सामाजिक सुरक्षा का आधार बनी हुई हैं।

इस वक्त लोग तीन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। एक, छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर का घटना, दो- उद्योग-कारोबार ठप होने के कारण नौकरी संबंधी चिंता और तीन, आगामी करीब एक वर्ष तक आर्थिक मुश्किलों की आशंका। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में छोटी बचत करने वाले लोगों के सामने बड़ी चिंता बचत योजनाओं पर ब्याज दर घटने को लेकर है।

इस साल अप्रैल से जुलाई के दौरान जहां छोटी बचत करने वालों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ीं, वहीं बैंकों में बचत खातों पर, सावधि जमा और विभिन्न छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरें घटती गईं हैं। पेंशन भोगियों और बुजुर्गों की आमद का सबसे बड़ा जरिया ही ब्याज से होने वाली आय है। ऐसे में लोगों के समक्ष संकट खड़ा होना स्वाभाविक है।
उल्लेखनीय है कि इस साल जनवरी से मार्च तक छोटी बचत योजनाओं पर जो ब्याज दरें दी जा रही थीं, वे अप्रैल में घटा दी गईं। ऐसे में एक ओर जहां छोटी बचत करने वाले अधिकांश निवेशकों की आमदनी ब्याज दर में कमी से घटी है, वहीं बड़ी संख्या में नौकरीपेशा और उद्योग-कारोबार से जुड़े हुए लोगों के सामने संकट खड़ा हो गया है। हालांकि सरकारी एवं अर्द्ध सरकारी नौकरियों में काम करने वाले लोगों के सामने छंटनी एवं कम वेतन की चिंता नहीं आई, लेकिन निजी क्षेत्र के उद्योग-कारोबार से जुड़े लोगों की आर्थिक जिंदगियाँ देखते ही देखते चिंताजनक हालात में बदल गईं।

देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों (एमएसएमई) में कार्यरत करोड़ों लोगों के समक्ष आजीविका का संकट खड़ा हो गया। पूर्णबंदी में ठप इकाइयों ने बड़ी संख्या में अपने कर्मचारियों की छंटनी की और कर्मचारियों के वेतन में कटौती भी की। आर्थिक संकट के साथ लोगों को महंगाई बढ़ने की चिंता भी सता रही है। रिजर्व बैंक पहले ही कह चुका है कि अगले एक वर्ष तक सामान्य आर्थिक स्थिति, रोजगार के परिदृश्य और आमदनी को लेकर उपभोक्ताओं की धारणा निराशाजनक है।

ऐसे में देशभर में उपभोक्ता अपनी घटती हुई घरेलू बचत को ध्यान में रखते हुए खर्चों में तेजी से कटौती कर रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि बाजार में मांग पैदा करने के लिए आम आदमी की आय बढ़ाने और महंगाई नियंत्रित करने के उपाय किए जाएं। साथ ही रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे, तभी अर्थव्यवस्था में गतिशीलता आ सकेगी।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो



सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई




Source link

Authors

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here