भोजपुरी स्पेशल- गायक बन गइले नायक, भोजपुरी सिनेमा अपना समाजे से कटि गइल | mumbai – News in Hindi

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मृद्ध साहित्य के विरासत, बहुरंगा संस्कृति के परंपरा आ आपन सरोकार के दम प अपार विस्तार पावेवाला भासा भोजपुरी के सिनेमा आपन जमीन, आज के समाज, संस्कृति आ साहित्य से केतना दूर बा, भा ई कहीं कि कइसे एकदम दोसरका राह के राही बा, एकरा के जाने खातिर तनिका सा, संछेप में ही सही, इतिहास प नजर डालल जरूरी बा. बात के सुरुआत ओह घरी से, जवना समय में भोजपुरी में सिनेमा बनावे के बात चलल सुरू होखल रहे. ओह घरी के बातचीत में कई गो ओरछोर निकलत रहे सिनेमा खातिर बाकि कुल छोर एने से ओने बिखरल रहत रहे, सभकर मिलान ना हो पावत रहे. जब भोजपुरी में सिनेमा बनावे के सोचल जात रहे, ओकरा पहिलहीं इ बात साबित हो चुकल रहे कि भोजपुरी एगो अइसन भासा हियअ, जेकरा के हिंदी समाज आसानी से समझेला भी आ खाली समझेला ना बलुक ओकरा से अपना के जोड़ के आनंदित भी हो सकेला.

पहिले भी बनल रहल ‘नदिया के पार’

देस के आजादी मिलला के एके साल बाद 1948 में एगो फिलिम बनल रहे-नदिया के पार. दिलीप कुमार हीरो रहनी. ओह सिनेमा में देवरिया के रहनिहार मोती बीए गीतकार रहनी. उहां के नदिया के पार खातिर भोजपुरी में गीत लिखनी. हिंदी सिनेमा में पहिलका हाली आईल ओह भोजपुरी गीतन के देस में लोकप्रियता मिलल रहे. बाकि बात उहवां से आगे बढ़ ना पावत रहे. सिनेमा में भोजपुरी के नया मुकाम मिल ना पावत रहे. अनेक लोग अपना तरीका से प्रयास में लागल रहे, एक-दोसरा से संपर्क करत रहे कि कवनो तरीका से भोजपुरी में सिनेमा बने सुरू त होखे. ओकरा में एगो नाम रहे नजीर हुसैन के. नजीर अपना समय के खूब लोकप्रिय चरित्र अभिनेता रहनी.

‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’उहां के एगो ओह समय के भोजपुरिया समाज प एगो कहानी लिखनी आ निर्माता लोग से मिले सुरू कइनी कि हम आपन भासा भोजपुरी में सिनेमा बनावल चाहत बानी. बिमल रॉय के पास भी कहानी ले के पहुंचनी. सभका के उनकर कहानी पसंद आवत रहे, सिनेमा बनावे खातिर कई गो निर्माता लोग तइयार भी भइल बाकि सभकर इ सर्त रहत रहे कि फिलिम भोजपुरी में ना, बलुक हिंदी में बनो. नजीर हुसैन एकरा खातिर तइयार ना रहले. नजीर धैय रखले, लगातार लागल रहले, आपन भासा से लगाव राखेवाला देस के पहिलका राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसादजी के पहल प ओह समय के बड़ कारोबारी बिसनाथ साहाबादीजी तइयार भइनी, आ भोजपुरी के पहिलका फिलिम बनल- हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो. ओकरा बाद के कहानी सभके मालूम बा. एक के बाद एक, एक से एक सिनेमा आवे के सिलसिला सुरू भइल. लागी नाहीं छुटे रामा, बलम परदेसिया, धरती मइया, गंगा किनारे मोरा गांव… अइसन ढेर फिलिम. सभ खूब लोकप्रिय भइल.

इतिहास के एह छोट बात के सुरू में चरचा एह से भइल, काहे कि एकरा से ई साफ हो रहल बा कि नजीर हुसैन केतना संकल्पित रहनी आपन भासा में सिनेमा बनावे खातिर कि उ आपन समय में हिंदी के अभिनेता रहनी, उनकर लिखल कहानी प हिंदी में सिनेमा बनावे खातिर निर्माता लोग तइयार भी रहे बाकि उ भोजपुरी में ही बनववनी.

लुटअ, गोली देवरा के टाइम

अब तनी आज के भोजपुरी सिनेमा प बात करल जाव. जादे पहिले ना जाइल जाव, बस पिछिलका दु दसक के भोजपुरी फिलिम के नांव ही देखल जाव. लहरिया लुटअ ए राजा, मार देब गोली-केहू नाही बोली, देवरा सतावेला… अइसनके नाम मिली, ना त मर्द, हीरो, जख्मी, हिंदुस्तानी, नगीना… जइसन नांव. मोटा-मोटी, एही दु कटेगरी के जादे से जादे नांव मिली, चाहे कुंठित नांव, हिंसक नांव चाहे हिंदी सिनेमा के सीधे-सीधे नांव.

अब सिनेमा के देखीं. हिंसा-सेक्स में डुबावल एह सिनेमा के पात्र चूकि भोजपुरी बोली त ओकरा खातिर गांव के सीन देखा के भरल जवानी में हीरो के धोती पहिरल देखावल जाई.

अनपढ़, गंवार, एकदम अनाड़ी ओकर गुन के रूप में देखावल जाई. इहो हो सकेला कि जवन गांव भार घर देखावल जाई, ओह में नल ना दिखो बलुक चापाकल दिखो, तालाब में नहात लोग दिखो, खटिया-ढेकी दिखो. सबकुछ एकदम 30-40 साल पहिले के आ ओही में बीच में अचानके आइटम डांस सुरू हो जाई.पब-बार संस्कृति दिखे लागी चाहे एकदम अचानक बाईजी के जमाना के नाच.जसहीं अइसन दृस्य दिखे त समझ जाईं कि इहे फिलिम के मूल ह.

गावत गावत हीरो बने के दौर

अब जे लोग भोजपुरी समाज के, गांव-गिरांव के बनाव-बिगड़ाव देख रहल बा, उ कपारे हाथ ध के सोची कि भाई सूचना-तकनीक के जुग में त हमार गांव, सहर लेखा बन रहल बा बाकि ई कवन गांव के मामला बा. कवन गांव में जवान लोग अबहियो भरल जवानी में धोती-कुरता पहिर के घूम रहल बा. कवन गांव में गांवे के लईकी से लईका प्रेम क रहल बा, खुल्लम खुल्ला एलान क रहल बा, गांवे के लइकी से बियाह क रहल बा. ई कुल फिलिम के बात नइखे होखत.

कुछ फिलिम मिली, जे एह कुल के असर से दूर दिखी बाकि अधिकतर भोपजुरी फिलिम के फार्मुला इहे मिली. अब दोसरका चीज देखीं. जे हीरो आई, ओकरा के लोग पहिले से जान रहल बा कि ई गायक ह. गावत-गावत हीरो बन गईल बा जबरदस्ती. मनोज तिवारी, दिनेस लाल जादव निरहुआ, पवन सिंह, खेसारी लाल जादव, कल्लू जईसन गायक लो हीरो बनल दिखी. भोजपुरी सिनेमा हीरो के अकाल से गुजरत दिखी चाहे कहीं अकाल में राखल गईल महसूस होखी. गायक लो त हीरो बनते रहे, अब ओकर उलटा भी हो रहल बा, भोजपुरी फिलिम के हिरोईन लो गायिका बने भी सुरू हो गईल बा. आटो ट्यून के दम प. एकर सबसे नमूना उदाहरण बाड़ी अक्षरा सिंह, जे पहिले हिरोइन रहली बाकि अब गायिका के रूप में स्टेज सो भी करे सुरू कईले बाड़ी.

मोटा-मोटी रूप में ई भोजपुरी सिनेमा के अभी के हाल बा. एकरे के नयका दौर कहल जाला. नवका हीरो लोग, जे गायक से नायक बनल बा, इहे दौर के सूत्रधार, कर्णधार, सुपरस्टार बने खातिर, ओकर कुल श्रेय अपना खाता में लेबे खातिर आपसे रगरा भी करत रहेला.

पूरबिहा के मीठ धुन कहां गइल

जवन भोजपुरी सिनेमा खातिर चित्रगुप्त, एसएन त्रिपाठी जइसन संगीतकार लोग संगीत देत रहे. मन्ना डे, महेंद्र कपूर, लता मंगेसकर, आसा भोसले, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, किसोर कुमार, मुकेस जइसन गायक लो गाना गावत रहे, ओह भोजपुरी सिनेमा के नयका दौर इहे बा कि कुल गायक लो अपना के नायक बनावे खातिर ओकरा के अपना दायरा में समेट के रख देलस. बाकि कब्बो जे गलती से मनोज तिवारी, रवि किसन,पवन सिंह, निरहुआ,खेसारी, कल्लू से कबो सवाल पूछ देब कि रउआ सभ एह नयका दौर के सूत्रधार-सुपरस्टार हईं जा त नया दौर में ई भोजपुरी सिनेमा थोक के भाव बनि के भी सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर तक काहे सिमट गईल. उहो में गिनल-चुनल-फिक्स सिनेमाघर तक. काहे ना कवनो सिनेमा अब ले मल्टीप्लेक्स ले पहुंचल? एकर जवाब उ लोग दिही कि भोजपुरी के हीन समझल जाला, भाव ना देबल जाला, भेदभाव होला इहे से. उ लोग के अइसन कहनाम के सच से कवनो वास्ता ना होला.

सच्चाई ई बा कि आज भोजपुरी साहित्य-संस्कृति आपन नया जमीन तलास के नया विस्तार पा रहल बिया. नया-नया प्रयोग से नया विस्तार हो रहल बा. बाजार भी भोजपुरी प नजर रखले बिया, सहयोग क रहल बिया. हां, बाकि भोजपुरी सिनेमा के अपनावे खातिर ना नया लोग तइयार बा, ना बाजार.

समय- समाज से रिस्ता 

एकरा पाछे कई गो वजह बा. जेकरा में एगो प्रमुख वजह ई कि भोजपुरी सिनेमा अपना समय के समाज, साहित्य,संस्कृति से दूर—दूर तक वास्ता नइखे रखले. सांस्कृतिक धरातल प देखीं त भोजपुरी के फैले में गीत—गायन के बड़हन भूमिका रहल बा. खास कई के पारंपरिक लोकगीतन के. बाकि अगर हाल के सिनेमा के देखीं त भोजपुरी के ई पारंपरिक लोकगीतन के दुनिया आपन पहचान भा खूबसूरती के साथ ना दिखी. भोजपुरी के पहचान ओकर संस्कृति से बा. छठ एगो बड़ परब ह पुरबिया समाज के. छठ प कवनो सिनेमा बढ़ियां आज ले ना बनल. भोजपुरी के पहचान ओकर नायकन से बा. वीरता के कथा, प्रेम के कथा, सरोकार के कथा भोजपुरिया जनमानस में पीढ़ी से बा बाकि ओइसन कहानी भोजपुरी सिनेमा के बिसय नइखे. भोजपुरी समाज के ई खासियत रहल बा कि उ आधुनिक नजरिया के होला. उ कहीं भी जाला त देस—काल के अनुसार अपना के ढाल लेबेला. एही वजह से भोजपुरी भासी लोग देस के कोना—कोना में फैलल चाहे दुनिया के दोसर देसन में मजदूरी करे भी गइल त दोसरा से मेल—जोल बढ़ा के भी आपन सांस्कृतिक पहचान कायम कइलस. बाकि ई भोजपुरी सिनेमा के बिसय नइखे.

भोजपुरी में अबो कालजयी साहित्य बा 

अब जवना सिनेमा संसार के ना आपन इतिहास से मतलब होखे, ना आज के समय से, उ सिनेमा जगत साहित्य—संस्कृति से केतना मेल बढ़ा पाई? जवना सिनेमा संसार के लोग पांडेय कपिल के लिखल भोजपुरी के कालजयी उपन्यास फुलसुंघी के नांव तक ले ना जाने चाहे जान के भी अजनबी बनल रहेला, ओह सिनेमा संसार से समकालीन साहित्य जगत काहे रिस्ता बनाई? जे फुलसुंघिये के ना जनलस चाहे ओकरा प कोसिस ना कईलस, उ सिनेमा जगत मृत्युंजय कुमार सिंह के लिखल टटका उपन्यास गंगा रतन बिदेसी भा सरोज सिंह के लिखल कहानी तेतरी के पढ़ के काहे खातिर ओकरा में सिनेमा के संभावना जोहे के प्रयास करी?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)



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