सामना सम्पादकीय में पूछा  पी. चिदंबरम एक प्रख्यात वकील हैं। लेकिन वह नेता कब हुए?

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हाइलाइट्स:

  • सामना सम्पादकीय में चिट्ठी लिखने वाले कांग्रेसी नेताओं पर कसा तंज
  • सामना में लिखा गया की ये सभी लोकनेता नहीं बल्कि पत्र नेता है
  • जो खुद सक्रिय नहीं है वो पार्टी के सक्रिय होने की बात करते हैं
  • इन नेताओ ने राहुल गाँधी का मनोबल गिराया है

मुंबई
शिवसेना के मुखपत्र सामना में लिखे गए संपादकीय में कांग्रेस पार्टी के उन 23 नेताओं पर तंज कसा गया है, जिन्होंने पार्टी को सक्रिय करने के लिए पत्र लिखा था। सामना में इन सभी नेताओं की खुद की सक्रियता पर सवाल उठाया गया है। संपादकीय में लिखा गया है कि जिन नेताओं ने सवाल उठाएं हैं, वे राज्य तो छोड़िए जिला स्तर में भी नेता बनने के काबिल नहीं है, बावजूद इसके उनको कांग्रेस में मलाईदार पद मिलते रहे हैं।

सामना में लिखा गया है, ‘ऐसा दिख रहा है कि कांग्रेस के 23 प्रमुख नेताओं के पत्र से उठा तूफान फिलहाल शांत हो चुका है। पार्टी में तूफान पैदा करने की क्षमता कांग्रेस के किसी नेता में बची है क्या? कांग्रेस पार्टी को पूर्णकालिक सक्रिय अध्यक्ष चाहिए, ऐसी मांग करनेवाला एक पत्र पुराने कांग्रेसी नेताओं ने सोनिया गांधी को लिखा। जिन्होंने यह पत्र लिखा, उन सभी नेताओं की उम्र 70 वर्ष से अधिक है। उनमें से एक भी नेता राष्ट्रीय स्तर या राज्य स्तर छोड़िए, जिला स्तर का भी लोकनेता नहीं है। फिर भी इनमें से कई नेताओं ने कांग्रेस या गांधी-नेहरू परिवार के बल पर मुख्यमंत्री पद से लेकर केंद्रीय मंत्री पद तक की महत्वपूर्ण कुर्सियां गर्म की हैं। पी. चिदंबरम एक प्रख्यात वकील हैं, लेकिन वह नेता कब हुए? राजीव गांधी से मतभेद होने के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी और तमिलनाडु में खुद की पार्टी शुरू की थी।

सिब्बल का राजनितिक युग समाप्त
सम्पादकीय में सिब्बल को भी आड़े हाथों लिया गया है सामना में लिखा है कि कपिल सिब्बल ने कई सालों तक पार्टी का कानूनी पक्ष बहुत मजबूती से संभाले रखा। लेकिन इस समय राजनीति में उनका युग समाप्त हो चुका है। अहमद पटेल बेहतर ‘मैनेजर’ या ‘सलाहकार’ हैं लेकिन लोकनेता नहीं हैं। पृथ्वीराज चव्हाण और मिलिंद देवड़ा के बारे में हम ज्यादा क्या बोलें? सातारा से चुनकर आने के लिए पृथ्वीराज चव्हाण को शरद पवार की मदद लेनी पड़ती है।

‘लोक नेता या पत्र नेता’

इन सभी लोगों द्वारा कांग्रेस पार्टी के लिए एक पूर्णकालिक सक्रिय अध्यक्ष चाहिए, ऐसी मांग सोनिया गांधी से करना एक आश्चर्य लगता है। अब पार्टी को सक्रिय करना मतलब क्या? और पार्टी को सक्रिय करने के लिए इन ‘पत्र नेताओं’ को किसी ने रोका है क्या? ७० वर्षीय सोनिया गांधी पार्टी में संगीत कुर्सी, खो-खो और कबड्डी जैसी प्रतियोगिताएं करवा कर सक्रियता दिखाएं, ऐसा इन लोगों को लग रहा है क्या? दूसरी बात यह कि राहुल गांधी सक्रिय थे ही और उन्होंने अकेले मोदी-शाह का सामना किया। विधानसभा चुनाव में वे देशभर में घूमे। भाजपा की ओर से उन पर लगातार तीखे हमले हुए, उस समय यह सक्रिय ‘पत्र नेता’ कहां थे? राहुल गांधी को जितना मोदी-शाह और भाजपा ने नहीं दबाया होगा, उससे कहीं ज्यादा उनकी पार्टी के पुराने लोगों ने उनका मनोबल गिराया है। राहुल का नेतृत्व समाप्त करने के लिए के राष्ट्रीय षड्यंत्र में घर के भेदी शामिल होते हैं।

‘पत्र नेताओं की वजह से कांग्रेस बेहाल’

राहुल गांधी ने इसी संताप में लोकसभा चुनाव के पश्चात कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ दिया। राहुल और प्रियंका का कहना यही था… यह पार्टी अब तुम ही चलाओ। आवश्यकता पड़ी तो गांधी परिवार के बाहर का अध्यक्ष बनाओ। राहुल ने इसे खुले तौर पर कहा और इसमें किसी भी प्रकार की कोई कटुता नहीं थी। फिर इस चुनौती का सामना ‘पत्र नेताओं’ ने क्यों नहीं किया? कांग्रेस की जिम्मेदारी फिर से नासाज तबीयत की सोनिया गांधी पर डालकर ये सारे पुराने नेता छुट्टे हो गए। एक भी ‘माई का लाल’ आगे आकर कांग्रेस का आपातकालीन नेतृत्व करने के लिए तैयार नहीं हुआ। राजस्थान में सचिन पायलट ने बगावत की। उस समय सत्ता बचाने के लिए अशोक गहलोत द्वारा की गई दौड़भाग देश ने देखी। यह दौड़भाग खुद की कुर्सी बचाने के लिए ही थी।

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