Barring few banks NPAs most banks declined in June quarter – राजनीतिः फंसे कर्ज का मर्ज

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भारत की अर्थव्यवस्था संकट भरे दौर से गुजर रही है। खासकर सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) की हालत ठीक नहीं है। अधिकांश कंपनियां, जिनमें एमएसएमई भी शामिल हैं, कर्ज की किस्तों और ब्याज का भुगतान महीने के आखिरी सप्ताह या महीने के आखिरी दिन कर रहे हैं। ऐसी कंपनियों के कर्ज खाते इसलिए गैर निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) में तब्दील नहीं हो रहे हैं, क्योंकि वे अंतिम समय में किस्त चुका दे रहे हैं। हालांकि उनकी वित्तीय स्थिति भी खस्ताहाल है। इसलिए ऐसे उद्योगों एवं अन्य ग्राहकों को वित्तीय संकट से उबारने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने बड़ी कंपनियों, एमएसएमई क्षेत्र की कंपनियों और खुदरा व व्यक्तिगत कर्ज खातों के पुनर्गठन की अनुमति दे दी है। कर्ज पुनर्गठन की सुविधा उन्हीं कर्जदारों को मिलेगी, जिन्होंने एक मार्च,2020 तक कर्ज भुगतान में तीस दिन से अधिक देरी नहीं की थी। ऐसे कर्ज खातों का पुनर्गठन 31 दिसंबर तक किया जा सकता है।

तकनीकी तौर पर एनपीए में तब्दील होने से पहले किसी खाते को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। ऐसे खाते स्पेशल मेंशन अकाउंट्स (एसएमए) के नाम से जाने जाते हैं। एसएमए-0, वे खाते होते हैं, जिनमें भुगतान में तीस दिनों तक की देरी हुई है। एसएमए-1 वे कर्ज खाते होते हैं जिनमें इकतीस से साठ दिन तक भुगतान बकाया रहता है। और फिर इकसठ से नब्बे दिनों तक भुगतान बकाया रहने पर खाते एसएमए-2 में रखे जाते हैं। अगर भुगतान नब्बे दिनों से अधिक बकाया रहता है तो खाते एनपीए में तब्दील हो जाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने एमएसएमई क्षेत्र के कर्ज खातों के एसएमए के किसी भी श्रेणी में रहने पर पुनर्गठन की अनुमति दे दी है, लेकिन शर्त यह है कि कर्जदार को कुल पच्चीस करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज नहीं दिया गया हो। पच्चीस करोड़ रुपए से अधिक कर्ज लेने वाले उद्योग जो एसएमए-1 और एसएमए-2 श्रेणियों में आते हैं, उनके कर्ज का पुनर्गठन नहीं किया जाएगा, अर्थात एमएसएमई सहित जिन उद्योगों ने पच्चीस करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज लिया है और चुकाने में तीस दिनों से ज्यादा की चूक की है, उन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।

कुछ बैंकों को छोड़ कर अधिकांश बैंकों का एनपीए जून तिमाही में कम हुआ है। लेकिन सितंबर और दिसंबर तिमाही में एनपीए में बढ़ोतरी की आशंका है। हालांकि जून तिमाही में भी कुछ बैंकों ने परिसंपत्ति गुणवत्ता में गिरावट आने का अनुमान लगा कर एनपीए के लिए प्रावधान किए हैं। बैंकों का मानना है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने में अभी भी समय लगेगा, जिससे कर्ज अदायगी स्थगन का लाभ लेने वाले कर्जदारों को कर्ज की किस्त एवं ब्याज चुकाने में और भी समय लग सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कर्ज पर पहले मार्च से जून और फिर अगस्त तक छह महीनों के स्थगन की घोषणा की है। दबकि बैंकों का कहना है कि कर्ज की किस्त और ब्याज का स्थगन समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि विमानन, पर्यटन, यात्रा और निर्माण जैसे प्रभावित उद्योगों को कर्ज स्थगन सुविधा का लाभ देने के बाद भी उनकी आर्थिक स्थिति में तुरत-फुरत में सुधार आना बहुत ही मुश्किल है।

हालांकि कर्ज की किस्तों और ब्याज स्थगन की योजना कर्जदारों के बीच लोकप्रिय नहीं है। एक अनुमान के अनुसार केवल पंद्रह फीसद कारपोरेट कंपनियों ने ही इस विकल्प को चुना है, जबकि खुदरा क्षेत्र में सिर्फ बीस से तीस फीसद लोगों ने यह विकल्प चुनना उचित समझा। अगर सभी क्षेत्रों को मिला दिया जाए, तो कुल तीस फीसद कर्जदारों ने कर्ज पुनर्गठन के विकल्प को चुना। दरअसल किस्त एवं ब्याज को टालना अस्थायी प्रक्रिया है और इसकी एक सीमा है। लंबे समय तक इस प्रक्रिया को जारी नहीं रखा जा सकता है। ऐसा करने से कर्ज की राशि, टाली गई राशि को मिला कर इतनी बड़ी हो जाएगी कि उसकी वसूली बैंकों के लिए असंभव हो जाएगी। कर्ज अदायगी स्थगन की सुविधा की जगह कर्ज खातों का पुनर्गठन ज्यादा व्यवहारिक है, लेकिन यह भी सभी के लिए नहीं होना चाहिए। यह सुविधा सिर्फ प्रभावित उद्योगों और व्यक्तियों को ही दी जानी चाहिए। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कोरोना महामारी बैंकों पर कितना असर डालेगी। यदि अगस्त महीने में कर्ज अदायगी का स्थगन समाप्त हुआ, तो एनपीए की वास्तविक तस्वीर चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में दिख सकती है।

जून, 2020 की तिमाही में कर्जों के भुगतान पर रोक से परिसंपत्ति गुणवत्ता पर काफी दबाव रहा। इस तिमाही में बैंकों को एनपीए के मद में बड़ी राशि का प्रावधान करना पड़ा। प्रमुख निजी बैंकों की पहली तिमाही के आय विश्लेषणों से पता चलता है कि परिसंपत्ति गुणवत्ता में कमी की वजह से समग्र आधार पर आकस्मिक प्रावधान किए गए। कोरोना महामारी के कारण बैंकों के परिचालन लाभ में सत्ताईस फीसद तक की गिरावट दर्ज की गई। अब आने वाले वक्त में हालात और बिगड़ने का अंदेशा है। कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न हालात के चलते आगामी महीनों में एनपीए की स्थिति और बिगड़ने का खतरा सामने है। रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक अगले साल मार्च तक सकल एनपीए का स्तर बढ़ कर 14.7 फीसद हो सकता है। यदि मार्च 2021 तक सकल एनपीए 14.7 फीसद हुआ तो यह पिछले बाईस वर्षों का उच्चतम स्तर होगा। इससे पहले वर्ष 1999 में सकल एनपीए 15.9 फीसद के स्तर पर पहुंच गया था, जो वर्ष 2000 में घट कर 14 फीसद और वर्ष 2003 में 9.3 फीसद रह गया था।

वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी बैंकों की स्थिति निजी बैंकों से ज्यादा खराब हो सकती है। भारी-भरकम एनपीए का असर बैंकों की पूंजी और कर्ज देने की क्षमता पर भी पड़ेगा। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि दबावग्रस्त परिसंपत्तियों की वजह से कम से कम पांच बैंक अगले मार्च तक न्यूनतम पूंजी स्तर का पालन करने में चूक कर सकते हैं। इस साल सितंबर तक तिरपन देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी पर्याप्तता अनुपात कम होकर 14.1 फीसद होने का अनुमान है, जो सितंबर 2019 में 14.9 फीसद थी। निजी बैंक पूंजी बढ़ा चुके हैं या इस प्रक्रिया में हैं। सरकार को अभी सरकारी बैंकों में पूंजी डालने की योजना की घोषणा करनी है। बजट में इस बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया था। जिन बैंकों को पूंजी नहीं मिलेगी, उनकी वित्तीय स्थिति का खराब होना लगभग तय है। इस रिपोर्ट में निजी बैंकों का एनपीए अनुपात 3.1 फीसद से 4.5 फीसद के बीच बढ़ने का अनुमान है।

भारत में कोरोना की दस्तक से पहले तक बैंकों के एनपीए का स्तर घट रहा था। पूंजी पर्याप्तता अनुपात भी मजबूत था। इसलिए माना जा रहा है कि कोरोना महामारी से उत्पन्न संकटों से निपटने में भी भारतीय बैंक कामयाब रहेंगे। वित्त वर्ष 2012-13 में बैंकों ने बड़े पैमाने पर कर्ज खातों का पुनर्गठन किया था। फिर भी, वे संकट से उबर गए थे।

कोरोना संकट के चलते कर्ज की लागत बढ़ गई है। आगामी महीनों में एनपीए बढ़ने की संभावना भी प्रबल है। ऐसे में सरकारी बैंक कोरोना संकट से उत्पन्न हालात से निपट सकें, इसके लिए सरकार सरकारी बैंकों को स्वतंत्र निदेशक खुद चुनने अधिकार दे सकती है। सरकार इस मामले में पीजे नायक समिति की सिफारिशों को लागू करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि यह अधिकार मलने के बाद सरकारी बैंक बिना किसी दबाव के यह फैसला कर सकेंगे कि किन कर्ज खातों का पुनर्गठन करना है।

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