While doing a scene of ‘Khuda Hafiz’, Vidyut Jamwal wept without glycerin, Director Farooq Kabir narrated interesting stories related to the film | ‘खुदा हाफिज’ का एक सीन करते हुए बिना ग्लिसरीन के रो पड़े थे विद्युत जामवाल, डायरेक्टर फारुक कबीर ने सुनाए फिल्म से जुड़े दिलचस्प किस्से

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10 दिन पहले

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विद्युत जामवाल की फिल्म खुदा हाफिज 14 अगस्त को डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हो चुकी है। इस फिल्म का दर्शकों को खूब प्यार मिल रहा है। फिल्म को असल माइग्रेंट की कहानी पर बनाया गया है जिसमें विद्युत समीर नाम के आम आदमी की तरह ही एक्शन करते नजर आए हैं। हाल ही में भास्कर से बातचीत में फिल्म निर्देशक फारुक कबीर ने फिल्म की शूटिंग और कहानी से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें शेयर की हैं। ये है प्रमुख अंश।

कैसी है फिल्म की कहानी

फिल्म में अगर आपको लग रहा है कि एक्शन ज्यादा है तो ऐसा बिल्कुल नहीं है इस फिल्म में एक्शन सेकेंडरी है। लेकिन इस फिल्म की कहानी में साफ तौर पर दर्शाया गया है कि किस तरह एक प्रेमी पति अपनी बीवी को ढूंढने के लिए जद्दोजहद करता है। इसमें बहुत ही साफ तौर पर दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह एक पति अपनी पत्नी को बचाने के लिए किसी के सामने झुकता भी है और जहां जरूरत होती है वहां पर वह अपने दिमाग का इस्तेमाल भी करता है । और एक्शन की अगर बात करें तो वह कहानी की डिमांड है उस कैरेक्टर के सामने ऐसी सिचुएशन आती है कि उसे मारपीट करना पड़ता है।

लोगों को लग रहा होगा कि इस फिल्म में विद्युत जामवाल हैं इसलिए फिल्म में एक्शन जरूर होगा, सबसे खास बात यह है कि इस पूरी फिल्म में ना तो विद्युत ने कहीं अपनी बॉडी को दिखाया है और ना ही कहीं हाफ स्लीव्ज़ शर्ट या टीशर्ट पहनी है। फिल्म में विद्युत ने एक अलग तरह का किरदार निभाया है। जो अब तक उन्होंने अपनी किसी भी फिल्म में नहीं किया है। इस किरदार के साथ जस्टिस करने के लिए उन्होंने अपने पूरे 3 महीने दिए हैं , विद्युत और मैंने 3 महीनों तक इस किरदार पर जमकर काम किया है ।

फिल्म कहां शूट की गई है?

फिल्म की शूटिंग लखनऊ में हुई है और इस फिल्म की कहानी जिस सच्ची कहानी पर आधारित है वह कहानी भी लखनऊ से ही है। हमने इसकी शुरुआत लखनऊ से की है और फिर उज्बेकिस्तान में शूट किया है । इस फिल्म को 48 दिनों तक उज्बेकिस्तान में हमने शूट किया है । वहां पर हमने मौसम बदलते देखा है। कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है उसके कारण जिस वक्त हम इस फिल्म की शूटिंग कर रहे थे उस वक्त उज्बेकिस्तान का टेंपरेचर माइनस 6 डिग्री था और कड़क धूप के साथ हवा भी चल रही थी जब आप फिल्म देखेंगे तो आपको थोड़ा भी इस बात का एहसास नहीं होगा कि वहां इतनी ठंड थी क्योंकि साफ बादल, धूप और हवा चल रही थी।

देह व्यापार दिखाने के पीछे कोई खास वजह?

फिल्म की कहानी की बात करें तो मैंने एक न्यूज पेपर आर्टिकल पढ़ा था और उस आर्टिकल का मुझ पर बहुत ही ज्यादा प्रभाव पड़ा था। जिसके बाद मैंने फैसला किया था कि मैं इस स्टोरी पर एक फिल्म जरूर बनाऊंगा। उसी वक्त से मेरी रिसर्च शुरू हुई लगभग 3 महीनों तक मेरी रिसर्च चली है। मैंने इस संबंध में उन लोगों से बात की जो मुसीबत से गुजरे हैं। साथ ही कुछ ऐसे लोगों से बात की जो घटना के बारे में जानकारी रखते थे। उसके बाद मुझे तकरीबन 9 महीने लगे स्क्रिप्ट लिखने में। लगभग 1 साल में मैंने इस पूरी फिल्म की कहानी को लिखने के लिए दिया।

यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है तो मैं नहीं चाहता था कि इस फिल्म में कहीं विद्युत समर सॉल्ट मारे या ऐसा एक्शन करे जो रियल लाइफ कैरेक्टर ना करता हो। तो अगर आप इस फिल्म में जो भी देखेंगे कह सकते हैं सभी एक दायरे में रहकर एक्टिंग और एक्शन कर रहे हैं। कुछ ऐसा नहीं है जो काल्पनिक लगे, इस फिल्म के स्क्रीनप्ले में 70 फीसदी सभी रियल इंसिडेंट है जो असल जिंदगी में हुए हैं। 30 फीसदी हिस्सा फिक्शनल है जो स्क्रीनप्ले के क्राफ्ट को ओर एंटरटेनिंग बनाने के लिए लिखा गया है।

क्या फिल्म शूट करते हुए आप इमोशनल हुए

फिल्म को शूट करते वक्त मैं और विद्युत एक बार नहीं कई बार इमोशनल हुए। मैं आपको एक सीन के बारे में बताना चाहूंगा विद्युत का जो कैरेक्टर है समीर जो असल जिंदगी में भी उस कंट्री में अपनी इंडियन कंट्री की एंबेसी में गुहार लेकर जाता है। बाहर के देश में जब आप अपनी कोई चीज ऐसे देखते हैं खासकर ऐसे परेशान हालात में हों तो चाहे वो इंसान हो या आपके देश की एंबेसी हो। उस जगह से आपकी एक उम्मीद जुड़ जाती है। कुछ इसी तरह विद्युत भी दूसरे देश में इंडियन एंबेसी में जो गुहार लगाने जाते है।

उस सीन को शूट करते वक्त मैं इमोशनल हो गया था, और रो पड़ा था। इसके साथ ही आपको बता दूं कि इस सीन को शूट करते वक्त विद्युत रो रहे थे बिना ग्लिसरीन के वो भी इतने इमोशनल हो गए थे।

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