New Challenges in West Asia and the Treaty between Israel-United Arab Emirates and US Strategy – राजनीति: पश्चिम एशिया में नई चुनौतियां

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ब्रह्मदीप अलूने

बदलते अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में धार्मिक संरक्षणवाद की परंपरागत नीति से राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर पाना संभव नहीं रहा गया है। अब सामरिक और आर्थिक विवशता के कारण भी संबंधों के प्रतिमान बदलते जा रहे हैं। हाल में इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐतिहासिक घोषणा की, तो यह साफ हो गया कि हिंसा, तानाशाही और आतंकवाद से अभिशप्त पश्चिम एशिया अरब राष्ट्रवाद को दरकिनार करने की ठान चुका है।

इजराइल विरोधी अरब राष्ट्रवाद का छिन्न-भिन्न होना दुनिया के लिए बेहद प्रभावकारी परिणाम लाने वाली घटना हो सकती है। इस समय वैश्विक कूटनीति में जो बदलाव आ रहे हैं और इजराइल तथा संयुक्त अरब अमीरात के रिश्तों की जो शुरुआत हुई है, उसमें संतुलन, सामंजस्य, समझौता और इन दोनों देशों के कड़े प्रतिद्वंद्वी ईरान पर मनोवैज्ञानिक बढ़त लेने की भावना प्रतिबिंबित हो रही है। इस समूची कूटनीति के केंद्र में अमेरिका है, जिसके लिए ईरान आतंकवाद की धुरी है।

पश्चिमी एशिया को दुनिया की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है। इस इलाके के दो परंपरागत शत्रु इजराइल और सऊदी अरब रहे हैं। ऐसे में अरब राष्ट्रवाद के आक्रामक व्यवहार के जरिए इजराइल को उखाड़ फेंकने का सपना गढ़ने वाले सुन्नी बहुल संयुक्त अरब अमीरात का इजराइल से राजनयिक संबंध स्थापित करना आधुनिक विश्व के लिए क्रांतिकारी परिणामों वाला कदम हो सकता है।

फिलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इस समझौते के बाद अरब लीग की बैठक बुलाने का प्रस्ताव रखा है। उन्हें डर है कि इस समझौते के बाद खाड़ी के दूसरे देशों के भी इजराइल के साथ संबंध मजबूत होंगे और इससे फिलस्तीन के अस्तित्व पर ही संकट गहरा जाएगा। वहीं पाकिस्तान जैसे देश के लिए यह इतना अप्रत्याशित है कि उसकी इस्लामिक दुनिया के नेतृत्व की उम्मीदें ही ध्वस्त हो गई हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कूटनीति को शांति का साधन माना जाता है, जो तर्क, समझौता, वार्ता और लेन-देन की भावना के आधार पर संघर्षों को रोकती है। अमेरिका ने इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के रिश्तों को लेकर कुछ ऐसा ही भरोसा जताया है। वास्तव में यह समझौता अस्तित्व में भले ही अभी आया हो, लेकिन इसकी संभावनाएं दशकों पहले बनने लगी थीं।

इस्लामिक दुनिया में शिया-सुन्नी विवाद बहुत पुराना है और 1979 की ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से यह विवाद और खौफनाक रूप में सामने आया है। इस्लामिक जगत में सऊदी अरब की बादशाहत को लगातार चुनौती देने वाले ईरान को शिया हितों के लिए लड़ने वाले देशों का समर्थन हासिल है और इससे मध्यपूर्व का संकट लगातार गहराया ही है।

ट्रंप का इजराइल प्रेम जगजाहिर है, वहीं सामरिक कारणों से ईरान के सामने अमेरिका का पारंपरिक दोस्त सऊदी अरब इस क्षेत्र में सुन्नी नेतृत्व की भूमिका में है। इस वक्त यमन गृहयुद्ध से जूझ रहा है और वहां सऊदी अरब के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की सेना है जो हूथी विद्रोहियों से मुकाब़ला कर रही है। सऊदी नेतृत्व को ये लगता है कि हूथी विद्रोहियों को हथियारों की मदद ईरान दे रहा है।

सीरिया में जारी गृहयुद्ध में ईरान खुल कर राष्ट्रपति बशर अल-असद के साथ है। पश्चिम एशिया के एक और देश लेबनान में अस्थिरता है और यहां पर भी ईरान समर्थित शिया मिलिशिया समूह हिजबुल्लाह का प्रभाव सऊदी अरब के लिए जानलेवा है।

इतना ही नहीं, यमन, सीरिया और लेबनान में ईरान का सामरिक मित्र रूस है और इसीलिए मध्यपूर्व में नियंत्रण स्थपित रखने के लिए महाशक्तियां आमने-सामने हैं। इन स्थितियों में नए राजनीतिक-सामरिक समीकरण बनते गए और दुश्मन का दुश्मन दोस्त की तर्ज पर इजराइल और सऊदी अरब के रिश्तों में अप्रत्याशित रूप से ईरान के विरोध को लेकर लगातार एकरूपता दिखाई दी।

वर्ष 2012 में नेतान्याहू ने ईरान के परमाणु बम की एक तस्वीर बनाई थी और लाल पेन से उसके शीर्ष पर एक रेखा खींच दी थी। यह इस बात का संकेत था कि ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम जिस दिशा में जा रहा है, इजराइल उसे जाने नहीं देगा। 2018 में ईरान के गोपनीय परमाणु हथियार कार्यक्रम ‘प्रोजेक्ट अमाद’ की हकीकत को बेहद सनसनीखेज तरीके से दुनिया के सामने लाकर इजराइल ने रणनीतिक दांव खेला था और इससे ईरान की मुश्किलें बढ़ गई थीं।

नेतन्याहू ने दावा किया था कि ईरान परमाणु समझौते को ठेंगा दिखा कर गुपचुप तरीके से परमाणु हथियारों का जखीरा बनाने की और अग्रसर है। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से अमेरिका को अलग करने की घोषणा की थी।

खाड़ी के देशों में महाशक्तियों के व्यापक आर्थिक हित जुड़े हैं और धर्मतंत्र को लेकर बेहद संरक्षणवादी हित रखने वाले सऊदी अरब की इजराइल को लेकर खामोशी व्यापक प्रभाव डालने वाली है। खासकर इस्लामिक जगत में सऊदी अरब की बादशाहत को लगातार चुनौती देने वाले ईरान के लिए यह सदमे जैसा है।

इन सबके बीच भारत के लिए अमेरिका, अमीरात और इजराइल के संबंधों का नया त्रिकोण नई संभावनाओं वाला है। हालांकि इसमें सजग रहने की भी जरूरत है। ईरान के प्रति इजराइल का यह रुख यूएई के लिए मुफीद रहा है, जो ईरान को अपने लिए एक बड़े प्रतिद्वंदी के तौर पर देखता रहा है। यूएई के हमकदम सऊदी अरब की नीतियों में भी इजराइल के प्रति नरम रवैया देखा गया, यहां तक कि उसने भारत और इजराइल के बीच की विमान सेवा शुरू करने के लिए अपने एयर स्पेस के इस्तेमाल की इजाजत भारत को देने में बिल्कुल संकोच नहीं दिखाया।

2019 में संयुक्त अरब अमीरात ने भारत के प्रधानमंत्री को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाजा था और इसे भारत के इस्लामिक देशों से मजबूत सम्बन्धों को भी नई दिशा मिली। इसके पहले भारत के लिए इस्लामिक दुनिया से रिश्तों में संतुलन लाना आसान नहीं था।

गौरतलब है कि 1969 में मोरक्को में विश्व के मुसलिम राष्ट्रों के शिखर सम्मेलन में भारत को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन पाकिस्तान के कड़े विरोध के बाद पूर्ण अधिवेशन में भारतीय दल को शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी। पर आज चार दशक बाद स्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं।

अब इजराइल और यूएई के संबंध मजबूत होने से अमेरिका की स्थिति एशिया में मजबूत होगी, वहीं इन देशों के प्रमुख सहयोगी के रूप में भारत के उभरने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं। ईरान, पाकिस्तान और चीन जैसे देशों को सामरिक रूप से मजबूत होने के लिए रूस का समर्थन बेहद जरूरी है, लेकिन रूस के लिए यह बड़ी चुनौती होगी। सोवियत संघ के विघटन के बाद तकरीबन दस लाख यहूदी वहां से जाकर इजराइल में बस गए थे।

इस समय इजराइल में आबादी का तकरीबन बीस फीसद हिस्सा विघटित सोवियत संघ से आए रूसी मूल के लोगों का है। इन लोगों का प्रभाव इजराइल और रूस दोनों में है। इसलिए पुतिन इजराइल के खिलाफ किसी सैन्य गठबंधन का समर्थन करें, यह मुश्किल होगा। जाहिर है, कूटनीति की दुनिया में भारत, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के मजबूत संबंध न केवल आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव ला सकते हैं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी इनका सशक्त प्रभाव कायम हो सकता है।

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