ब्रजभाषा में पढ़िए – गीतिनि किऊ बढ़ी महिमा होवै या ब्रज में तौ | lucknow – News in Hindi

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भक्ति में शक्ति तौ जे गीत नि ते ही आवे है। औरु बात फिरि जे ब्रज के गाने नि की होवे है तौ बाको तौ अलग ही आनंद होवे है. जे गीत आनन्द नि के द्वारा होने वाली भक्ति रस धारा के लें तौ देवता भी यहां ब्रज की धरती पर देह धारण करिबे के काजै तरसै हैं. लोगनि के जन्मजन्मांतर के पुण्य उदय होवै तब जा ब्रज में जन्म मिले है. ई ब्रज तौ भैया भक्ति आस्था की नगरी है यहाँ पे सब धर्म, सम्प्रदायों के लोग आवें हैं, अपने अपने आराध्य की भक्ति करें. यहाँ वृंदावन, नंदगाँव, बरसाना, गोवर्धन, राधाकुंड, जन्मभूमि में बाहिर ते करीब 170 देशनि के लोग आवे हैं जौ यहाँ पे आके तिलक- चंदन लगावे हैं, जनेऊ- कंठी धारण करें, भारतीय संस्कृति के धोती कुर्ता पहने हैं. स्त्रियां भी यहाँ आके ब्रज की गोपियाँनि कौ स्वरूप धारण करे, लहँगा- चुनरी, ओढ़नी, कंठी- माला धारण कर भजन कीर्तन करें. राजा रजवाड़े तक तौ जा ब्रज के गीत आनन्द में आके ऐसे रमजायें कि फिर उनको याँ से जावे कौ मनहि ना करे.

ब्रज में जौ उत्सव, त्यौहार, आयोजनों पर गीत आनंद होवे हैं तौ उनको अलग ही आनंद होवे है. गीत, भजन, मल्हारनि में सिर्फ मनोरंजन ही ना होवे है इनमें हमारी संस्कृति, संस्कार, महिमा, कौ शिष्टता के साथ बखान भी करो जावे है. हर तरे के संस्कार, उत्सव, आयोजनों के अलग अलग गीत होवै हैं जो लोगनि कूं खूब सुहावै है. और जा ब्रज में तौ साल के 365 दिननि में 365 तरेह के त्यौहारनि के गीत, भजन, मल्हार होवै हैं. झांझी के अलग होवै, साँझी के अलग होवे हैं, टेसू के दिवारी, संक्राइति के अलग होवे हैं, होरी, ठाकुर जी के फूल बंगला उत्सव के अलग होवै हैं, सावन के झूलाओं के अलग होवे हैं, जन्माष्टमी, राधाष्टमी यम द्वितीया, गोवर्धन पूजा, गोपाष्टमी, नंदोत्सव, कंस मेला जिनके अलग होवे हैं.

प्रेम, आस्था, भक्ति की नगरी में ऐसे संगीतमय आयोजननि के अलावा यहां पै तो शादी- व्याह भी अलग अलग तरह के गीत आनन्दों से जमे हैं। ब्याह की अलग अलग रश्मों के अलग अलग गीत होवे है। देअरी सिराइवे के अलग होवें, लगुन पै गवे-
रघुनंदन फुले न समायलगुन आई हरे- हरे
लगुन आई मेरे अँगना।
चाचा सज गए, चाची सज गईं,

सज गयी सारी बारात।
रघुनन्दन तो ऐसे सज गए, जैसे श्री भगवान
लगुन आई हरे- हरे …….

फिरि सगाई के, आरते के, रतिजग के, माँगरु, हल्दी के, लारौ के, बन्नी के, भात के, उघटन के, निकरौसी के, बारौटी के अलग होवै हैं। बारात जब दावत खावै तौ, दावत पे जौनर गवे हैं-
मनमोहन मदन गुपाल कौरे ते बैठो कैसो मटके
सखी री जिनि खाई बाजरा की रोटी, पूड़ी ने देखे कैसो मटके.. हरे हरे रसगुल्ला देखे केसौ मटके
मनमोहन मदन गुपाल कौरे ते बैठो कैसो मटके

बाके बाद में फिरि भाँवरिनि पे गवे-
सिया रघुवर जी के संग परन लागी हरे हरे… परन लागी भाँवरिया
छाओ चहु दिशि प्रेम कौ रंग परनि लागी भाँवरिया
मेरी पहली भाँवरिया रे अबई तौ बेटी बापहि की…..

फिरि गऊदान, चढ़ाओ, गठजोरो गवे, सुहाग गवे, फिरि विदाई पे गवे-
बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले
माइके कभी ना याद आए, ससुराल में इतना प्यार मिले
नाजों से तुझे पाला मैंने, कलियों की तरह फूलों की तरह
बचपन में झुलाया है तुझको बाहों ने मेरी झूलों की तरह

विदाई के बाद फिर समधी जब लड़की के घर की देअरी पूजतु है तौ महिलाएं प्रेम भरी गारी गावैं हैं-
भजौ मति जाए तौइ मारे लुगईया, लुगईयनि कौ मारो सारौ कारौ परि जाए.. पीरो परि जाए…
सारौ हाथ जोरि जाए, सारौ पाँव छीव जाए….

फिरि जब लड़की अपने ससुराल में पहुँच जाए तौ वहाँ पै महिलाएँ बहुलेत के गीत गावे हैं फिरि नौतौ सूतौ गवे फिर बधाए गवे हैं-
आज तौ बधाई बाजे रंग महल में…
रंग महल में रामजी आए, राम जी आए संग सीता जी को लाए
सीताजी की पायल बाजै रंग महल में
रंग महल में श्याम जी आए, श्याम जी आए संग राधा जी को लाए

व्याह की जे सब रश्म हौवे हैं जिनमें अलग अलग रश्म पर अलग अलग तरह के गीत गवे. इन गीतों के बोलनि ते आपकूं भाव समझ में आई रहो होगो कै किस प्रकार से शादी को कितनी पावन शीतलता के उत्सव की खुशियों को कितनी पावनता और शीतलता के साथ जोड़ के मनायो जातु है. जैसे भगवान कौ ब्याहु भयो वैसे हीं आजु भी या ब्रज में व्याह हौवे हैं. जेही कारण है कि यहाँ पर शादियों के बन्धन को जन्मजन्मांतर का बंधन माना जाता है. देश दुनिया में शादी- संबंध और रिश्ते नाते टूटने के तमाम किस्से देखने को मिले हैं परि जा ब्रज में तौ बहुत कमिहि होवे है. चूंकि जो पवित्र रश्मों के संग भगवान व देवी देवताओं व अपने आराध्यों को साक्षी मानिके शादी हौवे है तौ उन रिश्तें में निष्ठा, आस्था व मधुरता हौवे है. जे ही तौ हमारी जा संस्कृति की विशेषता है. परंपरा व संस्कृति से जुड़ी चीजों आजु भी लोगों के मनों मैं बसती हैं. परि भैया आधुनिकता के दौर में जे जौ लोगनि की सभ्यता व संस्कृति में बदलाव हो रहे है जाही वजह सौं आज जे इतनी नाना भाँति की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं. मैं आज भी जा दावा ऐ कर सकूं कै अगरि कोई भी इंसान हमारी जा संस्कृति सभ्यता व परंपरा कौ अनुसरण करैगो तौ निश्चित तौर पै उसका जीवन सुख, समृद्धि व शांति के संग बीतैगो.



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