To make farmers self reliant bring system like developed nations of the world – राजनीतिः कैसे आत्मनिर्भर बनेगा किसान

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रवि शंकर

भारत की एक बड़ी प्राथमिकता देश की कृषि और किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है। कृषि में भारत काफी हद तक आत्मनिर्भर बन भी चुका है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसानों ने अपनी मेहनत के बलबूते से भारत को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन अभी भी देश के किसानों की जो स्थिति है, वह चिंताजनक ही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि किसानों के आत्मनिर्भर होने की बारी कब आएगी। आज भी देश का किसान खुशहाल नहीं है। सरकार खुद मान रही है कि देश के हर किसान पर औसतन सैंतालीस हजार रुपए का कर्ज है। हर किसान पर औसतन बारह हजार रुपए कर्ज साहूकारों का है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि किसानों की बदहाली व्यवस्था की देन है। करीब अट्ठावन फीसद अन्नदाता कर्जदार हैं। एनएसएसओ के मुताबिक साहूकारों से सबसे ज्यादा 61,032 रुपए प्रति किसान औसत कर्ज आंध्र प्रदेश में है। दूसरे नंबर पर 56,362 रुपए औसत के साथ तेलंगाना है और तीसरे नंबर पर 30,921 रुपए के साथ राजस्थान है। हमारे नीति नियंता ऐसी स्थिति कब पैदा करेंगे कि किसानों को अपनी उपज का अच्छा और पूरा दाम मिले और कर्ज लेने की नौबत ही न आए। इन आंकड़ों को देखने से साफ होता है कि किसानों को स्वावलंबी बनाने के लिए ज्यादा काम नहीं हुआ। नतीजा यह है कि कर्ज किसानों के लिए मर्ज बन रहा है और वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था का एक कड़वा सच यह है कि हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा आजीविका के लिए किसानी और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। लेकिन कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि और इससे संबंधित गतिविधियों का योगदान लगातार घटता जा रहा है। उदारीकरण के दौर में खेतिहर आबादी की आमदनी अन्य पेशेवर तबकों की तुलना में बहुत ही कम बढ़ी है। यह हकीकत है कि खेती घाटे का सौदा बन गई है। ज्यादातर किसान परिवार जीविका का कोई अन्य विकल्प मौजूद न होने की मजबूरी में ही खेती में लगे हैं। जिन्हें जरा भी कोई कोई काम शहरों में मिल जा रहा है, वे खेती का काम छोड़ कर दूसरे कामों में लग जाते हैं। खेतिहर मजदूरों के लिए तो दो जून की रोटी भी मुश्किल से मिल पाती है।

देश के अधिकतर किसान सीमांत किसान हैं, यानी उनकी जोत बहुत अधिक नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आजादी के बाद से खेती-किसानी को लेकर जो घोषणाएं की जाती रही हैं, वे कोरी घोषणाएं ही साबित हुई हैं। इसलिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत कृषि क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इस क्षेत्र में रोजगार और विकास की सर्वाधिक गुंजाइश तो है ही, साथ ही भारत का कृषि क्षेत्र जिन समस्याओं से जूझ रहा है, उनका समाधान भी यह अभियान कर सकता है। भारतीय गांव जैविक खेती के महान प्रयोग स्थल बन कर उभर सकते हैं। इससे किसान का सशक्तिकरण तो होगा ही, देश और दुनिया के सम्मुख खड़ी पर्यावरणीय चुनौतियां भी कम होंगी।

अगर किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य मिले, बाजार मिले, उत्पादकता बढ़ जाए और उत्पादन लागत कम हो, तो किसान खुशहाल हो सकता है। सरकारें हर साल कृषि कर्ज का लक्ष्य बढ़ा देती है, लेकिन किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जो जमीन पर काम होने चाहिएस वे नहीं होते। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी अधिकार बनाने के लिए किसानों को आज भी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। इतना ही नहीं, आजादी के सात दशक बाद भी खेती-किसानी की इतनी ही तरक्की हुई है कि हमारे किसानों की औसत आय सरकारी दफ्तर में काम करने वाले सेवक से भी कम है। किसी राज्य में किसान की सबसे ज्यादा औसत आय 18,059 रुपए है, जबकि आज भी सरकारी कार्यालयों में कार्यालय सेवक की तनख्वाह कम से कम पच्चीस हजार रुपए है। इसे लेकर तो संसद में सवाल भी पूछा जा चुका है। लेकिन कोई समाधान खोजने की दिशा में बढ़ा गया हो, ऐसा लगता नहीं है।

सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वादा किया है। लेकिन जिस हिसाब से प्रतिवर्ष किसानों की कृषि लागत बढ़ रही है, उस हिसाब से उनकी आय को दोगुनी होने में तो वर्षों लग जाएंगे। हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के विकास के लिए पहल तो शुरू हुई है। किसानों के लिए कई तरह की योजनाएं भी शुरू की गई हैं। पहले किसानों को अपनी फसल सिर्फ कृषि उत्पाद बाजार समिति की मंडियों में ही बेचनी होती थी। लेकिन अब यह बाध्यता खत्म कर दी गई है और किसान अपनी फसल कहीं भी बेच सकते हैं। सरकार का दावा है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी।

लेकिन फिर भी अहम सवाल यह है कि किसान गरीब क्यों है? क्यों हजारों किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं? किसानों की दुर्दशा खत्म करने के लिए वर्षों से कमेचियां और आयोग बनते रहे, बड़ी-बड़ी रिपोर्टें बनाई गईं, कुछ सिफारिशों को लागू भी किया गया, लेकिन आज किसानों की समस्याएं दूर नहीं हो पाईं। किसानों को सबसे ज्यादा आर्थिक मार झेलनी पड़ रही है। सरकार की नीतियां ही किसानों को मजदूरी के लिए शहरों में पलायन करने के लिए मजबूर कर रही हैं। अगर यह सिलसिला नहीं थमा तो अमेरिका की तरह हमारे देश में भी किसानों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। अमेरिका में वहां की कुल आबादी का सिर्फ दो फीसद हिस्सा कृषि क्षेत्र में काम करता है।

समृद्ध और संपन्न भारत के निर्माण में आत्मनिर्भर भारत अभियान निश्चित ही मील का पत्थर बन सकता है। इससे सभी क्षेत्रों की कार्य क्षमता और गुणवत्ता भी बढ़ेगी। लेकिन यह तभी संभव हो सकता है जब किसान हितैषी नीतियां बनें और उन्हें ईमानदारी के साथ लागू किया जाए। सवाल यह है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत किसानों की आय दोगुनी करने का सरकार ने जो लक्ष्य रखा है, वह हासिल कैसे किया हो? ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में जब किसान वर्ग खेती-बाड़ी से विमुख हो रहा है, कैसे सरकार आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाए? इस चुनौतीपूर्ण परिदृश्य में सरकार को समाज के साथ मिल कर कुछ प्रेरक मॉडल कृषि क्षेत्र के लिए विकसित करने की जरूरत है। कृषि की छोटी-छोटी जोतों को जोड़ कर प्रयोगधर्मी आकार के कृषक समूहों का निर्माण किया जाए, जो सहकारी खेती का एक सामाजिक मॉडल बन सकता है। इसमें कुछ नए प्रयोग किए जाने की जरूरत होगी। आज सबसे बड़ी जरूरत कृषि को योजनाबद्ध तरीके से आधुनिक बनाने की है। किसानों तक तकनीक और उसका लाभ पहुंचाना होगा।

किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमें दुनिया के विकसित राष्ट्रों जैसी व्यवस्था लानी होगी। हमें भूलना नहीं चाहिए कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी पंद्रह फीसद ही है, जबकि देश की तिरपन फीसद आबादी कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर है। जब तक किसान सशक्त नहीं बनेगा, तब तक आत्मनिर्भर भारत का सपना पूरा नहीं होगा। समय की मांग है कि किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी और तात्कालिक कदमों के साथ दीर्घकालिक नीतियां बनाई जाएं। किसान आत्मनिर्भर होगा, तभी भारत आत्मनिर्भर बनेगा।

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