Teachers’ Day celebrates on September five every year, since 1962 to honour Dr. Sarvepalli Radhakrishnan second president of india – राजनीति: कैसे लौटे शिक्षक की गरिमा

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राजकुमार भारद्वाज

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। कई स्तरों पर चिंतन-मनन हो रहा है और बड़े-बड़े आलेख छप रहे हैं। सहसा ही गुरु द्रोण और आचार्य चाणक्य की स्मृतियां जीवंत हो चली हैं। गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन को धर्मरक्षार्थ श्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के लिए काल के कई कलंक अपने माथे लिए, भले ही कई लोग इसे सर्वथा अनुचित ठहराएं।

आचार्य चाणक्य ने नंद वंश के अहंकारी सम्राट घनानंद से मगध की मुक्ति के लिए चंद्रगुप्त सरीखा अनुशासित शिष्य और सम्राट विकसित किया। भारतीय धरा पर गुरु द्रोण और आचार्य चाणक्य जैसी लंबी शृंखला मिलेगी, जिसमें आचार्यों और गुरुओं ने अपने अनुशासन और तपश्चर्या से उत्ताल उद्देश्यों के संधान के लिए जीवन होम कर दिया और तीनों लोकों में कीर्ति अर्जित की।

अब आजकल की बानगी देखिए। अभी कोरोना काल चल रहा है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं। आनलाइन शिक्षण का बोलबाला है। अभिभावक कह रहे हैं कि स्कूल बंद हैं, तो फीस किस बात की। स्कूल कह रहे हैं कि उनके कर्मचारी तो स्कूल आ रहे हैं और उनके जरूरी खर्च भी कम नहीं हुए हैं, इसलिए उन्हें फीस तो चाहिए। इस पर कोर्ट-कचहरी भी चल रही है।

अभिभावक इस कोष और उस कोष में फीस बढ़ाए जाने की शिकायत करते मिल जाते हैं। नर्सरी के दाखिले के लिए पांच-पांच लाख के दान के चर्चे भी उच्च समाज में खूब होते हैं। देश भर के निजी विद्यालयों में बेहद कम वेतन पर काम करने वाले लाखों शिक्षक बेरोजगार हो गए हैं और रोजी-रोटी के लिए भटक रहे हैं। इससे पता चलता है कि पहले के शिक्षालय, शिक्षा, शिक्षण और शिक्षक मानकों के किन शिखरों पर शोभायमान थे और आज कितनी तीव्रता से रसातल की ओर बढ़ रहे हैं।

पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी का कहना था कि भारत में अध्यापन वास्तविकता में हताशा की अंतिम शरण बन गया है। देश भर में कुकुरमुतों की भांति खुले बीएड कॉलेज शिक्षक बनाने के नाम आर्थिक रूप से विपन्न छात्रों को जम कर लूट रहे हैं। पंडित जी ने अपने हाईस्कूल प्राध्यापक पन्नालाल माथुर से जीवंत भेंट बाद कहा था- ‘यदि आप आज छात्र में अनुशासन की भावना भरते हैं, तो आप कल एक अनुशासित समाज होने की उम्मीद कर सकते हैं और अगर समाज ने मूल्यों की उपेक्षा की, जो अनुशासन को बढ़ावा देते हैं, तो यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि छात्र में इस सदगुण का विकास होगा।’

उन्होंने जिस विषय के तंतुओं को झंकृत किया है, वह आज के शिक्षक के लिए सर्वाधिक समीचीन है। ईश्वरीय अनुकंपा से हमें लड़कपन में आदर्श शिक्षकों का सानिध्य प्राप्त हुआ। हमारे स्कूल में सर्वप्रथम प्रार्थना के पश्चात पहली कक्षा नैतिक शिक्षा की होती थी। मुझे तब अधिक खोटा लगता था कि जब नैतिक शिक्षा की कक्षा में किसी अग्रपाठी या सहपाठी की चुगली पर मुझे अपने विद्यालयीय समय के अतिरिक्त समय में गुल्ली-डंडा या कंचे खेलने पर पाठशाला में डंडास्वामी का साक्षात्कार करना पड़ता था। तब यह लगता था कि शिक्षक मेरी निजता का अतिक्रमण कर रहे हैं। किंतु मेरे शिक्षकों के प्रति आज मन श्रद्धा से पूरित रहता है कि वे क्यों मेरे कंचे खेलने पर अपना रक्तचाप बढ़ाया करते थे।

ऐसे आदर्श शिक्षक अपने छात्रों के शिक्षण के अतिरिक्त उनके सर्वांगीण विकास और चारित्रिक उन्नयन के लिए न केवत आतुर रहते थे, अपितु वे छात्र के कुल कृत्यों पर महीन दृष्टि भी रखते थे। उन शिक्षकों को शत-शत नमन जो अपने वेतन से ऐसी पुस्तकें वितरित करते थे, जो लघु एवं बोध कथाओं से युक्त होती थीं, जो बाल मन पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ती थीं। संस्कृत के उन अध्यापक का नाम अब विस्मृत तो हो गया है, लेकिन यह स्मरण है कि उन शिक्षक ने एकदा अपने घंटे में संस्कृत पढ़ाने के स्थान पर इस बिंदु पर केंद्रण किया था कि ‘मैं गाजर क्यों खाता हूं।’

वस्तुत: वे स्कूल में भी गाजर और मूली खाते हुए दिखते थे। उन्होंने तब संभवत: 11-12 वर्ष की आयु वर्ग के सभी सहपाठियों को गाजर की नेत्र-ज्योति और रक्त सुधार की महत्ता समझाई थी। वे छात्र में भाषा, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि विषयों के बीजारोपण के अतिरिक्त आहार, निद्रा, श्रम, संयम, योग और ब्रह्मचर्य आदि सूक्ष्म ज्ञान का सिंचन करते थे। वे सिखाते थे कि बड़ों का आदर करें, मात-पिता-रक्तसंबंधियों, पड़ोसियों, सामाजिकों-राष्ट्रवादियों, विचारकों, मनीषियों, तपस्वियों के चरण स्पर्श करें, उनका सानिध्य और संवाद करें, नित्यकर्म-गृहकार्य-अध्ययन के लिए समय का प्रबंधन करें।

वे प्राणपण से लालायित रहते थे कि वे अपने शिष्यों में ‘नियमन एवं अनुशासन’ को समाविष्ट कर पाएं। लेकिन अब विद्यालयों के शिक्षक बच्चों से बेहूदा, भौंडे और यहां तक कि बहुत बार अश्लील गानों पर नाच करवाते हैं और कॉलेजों के शिक्षक कक्षा में रिकॉर्डिड कैसेट की तरह चालीस मिनट का घंटा पूरा कर दरवाजे से निकल जाते हैं, यह जाने बिना कि किस छात्र ने उन्हें ध्यान से सुना, नोट किया, समझ आया या नहीं। छात्र-शिक्षक संबंध इतने हाशिए पर आ गए हैं

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के विचारों से उत्प्लावित तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र एवं शिक्षक रहे माधव सदाशिव गोलवलकर कहते थे कि छात्र के लोक व्यवहार का पूर्ण दायित्व का भार शिक्षक का होता है।

बोधिधम्म के अनुसार बिना किसी गुरु के दस लाख लोगों में से सिर्फ एक व्यक्ति ही बुद्धिमान बन सकता है। महर्षि अरविंद कहते थे कि शिक्षक शिक्षा द्वारा पुनर्जागरण कर सकते हैं। गांधीजी के विचार में भारत में बच्चों को तीन एच की शिक्षा अर्थात हेड, हैंड और हार्ट की शिक्षा दी जाए, यानी शिक्षा को मस्तिष्क विकास, हाथों को नियोजन और हृदय को सुविचारों का केंद्र बनाए। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना था कि सच्चे शिक्षक वे हैं, जो हमें अपने लिए सोचने में सहायता करते हैं।

शिक्षक वह कुंजी है, जिससे बीज फूट कर संपूर्णता की सुवास से ओत-प्रोत वृक्ष बनता है। माता-पिता पेट की भूख मिटाते है और शिक्षक ज्ञान से मस्तिष्क की क्षुधा का शमन करते हैं। छात्र अपने केंद्र से ब्रह्मांड तक की यात्रा स्वयं करता है, लेकिन उसके द्वार शिक्षक ही खोलता है। वे बताते हैं कि हार्ड डिस्क में संरक्षित ज्ञान को कैसे प्रोसेस किया जाए। ज्ञान की अगली कड़ी विवेक द्वारा ज्ञान का सदुपयोग किस तरह हो और जीवन के गुह्यतम प्रश्नों का क्या आकार हो सकता है।

शिक्षक सीखने के लिए प्रेरित भी करता है। बिना प्रेरणा के शिक्षण कार्य ठंडे लोहे पर चोट मारने सरीखा है। अपनी भावी पीढ़ी के निर्माण के लिए समाज और सरकार का भी दायित्व बनता है कि शिक्षकों को अति सम्मान के साथ सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक अर्थ की व्यवस्था करें। तभी शिक्षक भी जागेगा।

शिक्षक बनना तीसरे या अंतिम माले का काम नहीं होगा। तभी हम आत्मबल से कह सकेंगे, हे शिक्षक, निष्काम कर्मयोगी प्रभु श्री कृष्ण की तरह सारथी बन कर, अर्जुन के ज्ञान चक्षु आलोकित करने के लिए और एक सशक्त, सुदृढ़, सुव्यवस्थित, चैतन्य भारतवर्ष, अजनाभवर्ष और आयावर्त के पुनर्निर्माण के लिए तुम लौट आओ अपनी सनातन शक्ति और प्रभाव में।

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