योगी जी, भ्रष्ट अफसरों पर कसे शिकंजा, कारनामें और बेतुके बोल खराब कर रहे सरकार की छवि

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लखनऊ। ( फर्स्ट आई न्यूज ब्यूरो): उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि को दागदार बनाने की मुहिम नौकरशाहों ने छेड़ रखी है। बेलगाम अफसरों की इस मनमानी का फायदा राजनीतिक दल भी उठा रहे हैं। इस प्रायोजित अभियान को लेकर मुख्यमंत्री भी गंभीर हो गए हैं। माना जा रहा है कि सीएम के अब भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ सख्ती का नतीजा है कि तमाम भ्रष्ट नौकरशाहों की कुर्सी हिलने लगी है और वह इसी बौखलाहट में कुछ भी बोलने से बाज नहीं आ रहे हैं।

गौरतलब बात है कि मुख्यमंत्री की जड़ें राजधानी स्थित सचिवालय से लेकर जिलों तक काफी गहरी हैं। सी.एम के जीरो टॉलरेंस अभियान के प्रति जनता में भी जबरदस्त जागरूकता आई है और वह भ्रष्ट अफसरों के कारनामों को उजागर करने के लिए न केवल संघर्ष बल्कि गोपनीय सूचनाएं भी सरकार को दे रही हैं। जनता के तेवर को समय से समझने वाले जनप्रतिनिधियों की नींद भी टूट चुकी है। उन्हें यह लग रहा है कि समय रहते यदि संगठित भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार लोगों को बेनकाब करने में लापरवाही करते हैं तो जनता का गुस्सा फूट सकता है, इसीलिए वह भी अब प्रामाणिक दस्तावेजों को सीएम तक पहुंचाने में मदद कर रहे हैं और भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई करने की पैरोकारी में जुट गए हैं। राजधानी के पीजीआई थाना क्षेत्र में दुर्गेश यादव की हुई हत्या के बाद खुले राज से पहले डेढ़ दशक से सचिवालय में नौकरी के नाम पर चल रहे फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है।

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हालांकि सचिवालय में ठगी का यह मामला कोई नया नहीं है। 2013 में हजरतगंज कोतवाली में धारा 467, 468, 419 व 420 के तहत नामजद ए.आई.आर दर्ज हुई थी। करीब आधा दर्जन सचिवालय कर्मी नामजद थे। सभी पर नौकरी का झांसा देकर बड़ी रकम एंठने का आरोप था। मामला सुर्खियों में आने के बाद आरोपी बर्खास्त कर दिए गए। लेकिन बाद में इन सब पर ऐसी कृपा बरसी कि सभी पुन: नौकरी पाने में सफल हो गए और ये आदेश विधानसभा सचिवालय के मुखियों ने ही जारी किया। इससे साफ है कि बड़े अफसरों का भ्रष्ट और भ्रष्टाचारी दोनों से ही गहरा नाता है। शायद यही वजह है कि 7 सालों बाद एक बार फिर नौकरी के फर्जीवाड़े में सचिवालय के नाम आ जाने से पुराने कारनामें लगातार अब भी जारी हैं और इसका खुलासा हो गया है। यदि 2013 में ही ऐसे मामले का खुलासा हो जाने पर सख्ती हो गई होती तो सचिवालय क्या किसी भी विभाग में यह गोरखधंधा करने की हिम्मत नहीं पड़ती।

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दूसरी ओर सुल्तानपुर की जिलाधिकारी पर वही के विधायक का कोविड-19 के उपचार हेतु खरीदी जाने वाली सामग्री में रिश्वतखोरी के गंभीर आरोपों की जांच पूरी होती और दोषी के विरुद्ध कार्रवाई होती इसी बीच रायबरेली के जिलाधिकारी पर सीएमओ ने भ्रष्टाचार करने का दबाव बनाने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी। डीएम वैभव श्रीवास्तव अपनी विवादित कार्यशैली को लेकर काफी चर्चित हैं। सीएमओ रायबरेली ने महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एंव परिवार कल्याण को लिखे गए पत्र में जिलाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए हैं और काम करने से मना कर दिया है।

पीलीभीत में भी इनके कई कारनामें चर्चा में रहे हैं। कहा जाता है कि प्रदेश सरकार के एक कैबिनेट मिनिस्टर का इन पर वरदहस्त है। लेकिन मंत्री जी अपनी सरकार की किरकिरी ऐसे अफसरों से खुद कब तक कराएंगे ये तो वही जानें। बहरहाल सीएम को भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था को लेकर एक जबरदस्त सफाई अभियान चलाना चाहिए राजधानी से लेकर जिलों तक चलने वाले इस अभियान की कमान उन्हें खुद संभालनी होगी क्योंकि नौकरशाही इन हालातों के लिए जिम्मेदार हैं इसीलिए उन पर भरोसा करने से परहेज करना होगा।

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