Expectations are seen in the agriculture sector itself at the time of GDP going down and Corona crisis

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जयंतीलाल भंडारी

कोरोना संकट से उत्पन्न हालात के बीच देश के करोड़ों लोगों की खाद्यान्न संबंधी जरूरतों को पूरा करने और अर्थव्यवस्था की स्थिति को सुधारने में कृषि क्षेत्र की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण हो गई है। हाल में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2020 की तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 फीसद की भारी गिरावट आई है। लेकिन संतोषजनक तथ्य यह है कि कृषि क्षेत्र मंदी की मार से न केवल अछूता रहा, बल्कि ऐसे अच्छे संकेत दे रहा है जिन पर सारी उम्मीदें टिकी हैं। जीडीपी में बड़ी गिरावट के बीच कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जिसमें 3.4 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि क्षेत्र की विकास दर बढ़ाने में रबी फसलों की पैदावार, खासतौर से गेहूं की भारी पैदावार ने प्रभावी भूमिका निभाई है। पिछले वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में कृषि क्षेत्र की वृद्घि तीन फीसद ही थी। इस वर्ष कृषि विकास दर में वृद्धि के साथ कृषि निर्यात की बढ़ने की भी संभावनाएं प्रबल हुई हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) सहित विभिन्न आर्थिक संगठनों की रिपोर्टों के मुताबिक कोविड-19 की चुनौतियों के बीच भारत के लिए कृषि एवं ग्रामीण विकास की अहमियत बढ़ गई है। देश में रबी की बंपर पैदावार के बाद फसलों के लिए किसानों को लाभप्रद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिला है। सरकार ने किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि के तहत जो पैसा दिया है और जनधन खातों में नकद रुपया डालने जैसे जो कदम उठाए हैं, उनसे किसानों को बड़ी राहत मिली है। ग्रामीण क्षेत्रों में उर्वरक, बीज, कृषि रसायन, ट्रैक्टर और कृषि उपकरण जैसी वस्तुओं के साथ-साथ उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में भी तेजी से दिखाई देने लगी है।

पिछले दिनों सरकार ने सत्रह खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में दो से साढ़े सात फीसद के दायरे में बढ़ोतरी का एलान किया। खासतौर से खरीफ की मुख्य फसल धान के लिए एमएसपी में 2.89 से 2.92 फीसद, दलहनों के लिए 2.07 से 5.26 फीसद और बाजरे के लिए साढ़े सात फीसद की बढ़ोतरी की गई। किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में इसे एक बड़ी पहल के रूप में देखा जा रहा है। इसका प्रभाव ग्रामीण विकास पर निश्चित रूप से पड़ेगा।

साथ ही, इससे कृषि निर्यात को भी बल मिलेगा। पिछले महीने कृषि मंत्रालय की ओर से जारी कृषि निर्यात संबंधी रिपोर्ट के मुताबिक कोविड-19 की चुनौतियों के बीच चालू वित्त वर्ष में मार्च-जून के दौरान कृषि निर्यात करीब तेईस फीसद बढ़ कर 25,552 करोड़ रुपए रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि में 20,734 करोड़ रुपए का रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक भारत गेहूं उत्पादन के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है, लेकिन गेहूं निर्यात के लिहाज से वह चौंतीसवें स्थान पर है।

इसी प्रकार फलों के मामले में भारत दुनिया में दूसरा सबसे उत्पादक देश है, लेकिन फल निर्यात के मामले में वह तेईसवें स्थान पर है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में भारत के उत्पादन के अनुरूप कृषि निर्यात का शीर्ष निर्यातक देश बनने की संभावनाओं को साकार करने के लिए रणनीतिक प्रयत्न किए जा रहे हैं।

सरकार ने कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत पहली बार कृषि सुधार के ऐतिहासिक फैसले किए हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन करने के फैसले से अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज की कीमतें प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति को छोड़ कर भंडारण सीमा से स्वतंत्र हो गई हैं।

ऐसे में जब किसान अपनी फसल को तकनीक एवं वितरण नेटवर्क के सहारे देश और दुनिया भर में कहीं भी बेचने की स्थिति में होंगे, तो इससे उन्हें उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा। कृषि सुधार का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि जब किसान अपने छोटे-छोटे खेतों से निकली फसल को कहीं भी बेचने के लिए स्वतंत्र होंगे, तो इससे जहां एक ओर बंपर फसल होने पर भी फसल की बबार्दी या फसल की कम कीमत मिलने की आशंका नहीं होगी, और दूसरी ओर फसल के निर्यात की संभावना भी बढ़ेगी।

किसानों को बाजार उपलब्ध कराने के मकसद से किसान ट्रेन का फैसला भी लाभदायक सिद्ध होगा। कृषि एवं ग्रामीण विकास को नया आयाम देने में किसान ट्रेन बड़ी भूमिका निभाएगी। सात अगस्त को देश की पहली किसान ट्रेन महाराष्ट्र के देवलाली रेलवे स्टेशन से बिहार के दानापुर रेलवे स्टेशन के लिए रवाना की गई। इस ट्रेन से महाराष्ट्र से संतरा और दूसरे फल व सब्जियां बिहार भेजे गए और बिहार से भी यह फल और सब्जियां लेकर महाराष्ट्र लौटी।

ऐसी किसान ट्रेनों का फायदा रास्ते में पड़ने वाले सभी गांवों और शहरों को मिलेगा। इस तरह की सुविधाओं से खराब मौसम या दूसरे प्रकार के संकट के समय शहरों में ताजा फल व सब्जियों की कमी नहीं होगी और किसानों को अच्छी कीमत मिल सकेगी। आने वाले समय में देश के विभिन्न भागों में भी ऐसी किसान ट्रेनों के जरिए कृषि आय को बढ़ाया जाएगा। ग्रामीण इलाकों में रोजगार मिलेगा।

इस समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजूबत बनाने के लिए कई बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सबसे अहम तो यह कि किसान गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। उनके पास नगदी नहीं है। इसलिए खरीफ मौसम के पहले कृषि उत्पादन संबंधी जरूरी सामान खरीदने के लिए किसानों को पर्याप्त नकदी उपलब्ध कराना बहुत जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्र के छोटे और कुटीर उद्योगों को बहुत ही न्यूनतम दरों पर या ब्याजमुक्त कर्ज दिए जाने की जरूरत है।

कुटीर उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और कृषि संबंधी कारोबार में बड़ी भूमिका अदा करते हैं। इसके अलावा जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों जैसे फलों और सब्जियों के लिए आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना होगा। खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को अतिरिक्त कार्यशील पूंजी मुहैया करानी होगी, ताकि वे कच्चे माल की खरीद कर सकें।

कृषि निर्यात ऐसा महत्त्वपूर्ण उपाय है, जिसके जरिए रोजगार और राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। इसलिए कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए कई और जरूरतों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। कृषि निर्यात मानकों में बदलाव करने होंगे, जिससे कृषि निर्यातकों को कार्यशील पूंजी आसानी से मिल सके। सरकार द्वारा अन्य देशों की मुद्रा के उतार-चढ़ाव, सीमा शुल्क अधिकारियों से निपटने में मुश्किल और सेवा कर जैसे कई मुद्दों पर भी गौर करने की जरूरत है। बेहतर खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता प्रमाणन व्यवस्था, तकनीकी उन्नयन, आपूर्ति शृंखला में सुधार और पैंकेजिंग गुणवत्ता की मदद से खाद्य निर्यात क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाया जा सकता है। इसके अलावा, 31 जुलाई को कृषि निर्यात पर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने सरकार को जो सिफारिशें सौंपीं हैं, उनका क्रियान्वयन लाभप्रद होगा।

किसानों को उम्मीद है कि एक लाख करोड़ रुपए के कृषि ढांचागत कोष कई दृष्टिकोणों से लाभप्रद होगा। इससे गांवों में नौकरियों के सृजन में मदद मिलेगी। इस कोष से फसल तैयार होने के बाद होने वाले नुकसान में भी कमी लाई जा सकेगी और छोटे किसानों की तकलीफें कम होंगी। भारत में फसल तैयार होने के बाद के प्रबंधन जैसे गोदाम, शीतगृहों और खाद्य प्रसंस्करण और कार्बनिक खाद्य में वैश्विक निवेश की अच्छी संभावनाएं बनेंगी। आत्मनिर्भर भारत अभियान से भारत में उन्नत कृषि, ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग, पशुपालन, डेयरी उत्पादन और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को नया प्रोत्साहन मिलेगा। ऐसे में मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद रख सकती है।

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