राजनीति: महिला सबलीकरण की हकीकत

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ज्योति सिडाना

हमारे समाज में पुरुष-सत्ता के मूल्यों के आधार पर महिलाओं का समाजीकरण कुछ इस तरह से किया जाता रहा है कि महिला के अस्तित्व को पुरुष से अलग करके देखा ही नहीं जाता। महिलाओं के जीवन से जुड़ा हर निर्णय पुरुष-सत्ता ही तय करती आई है। यह भी एक तथ्य है कि लिंग के आधार पर श्रम का विभाजन लैंगिक भेदभाव का ही एक उदाहरण है। इसी प्रकार पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के यौन संबंधी कार्य भी पुरुषों की मर्जी से निर्धारित होते रहे हैं। कुछ नारीवादी विचारक मानते हैं कि स्वतंत्र प्रजनन और यौन कर्म के लिए शोषण को खत्म करना जरूरी है। यह तभी हो सकता है जब पूंजीवादी व्यवस्था और पितृसत्ता का अंत हो।

स्त्री को नियंत्रित करने के लिए पुरुष हमेशा से ‘भय के मनोविज्ञान’ का प्रयोग करता रहा है, जैसे कभी परिवार की मर्यादा के नाम पर, कभी उसे शारीरिक और बौद्धिक कमजोरी का यकीन दिला कर, मासिक धर्म के समय उसकी पवित्रता को संदेहास्पद मान कर, पति की सेवा को उसका धर्म और जन्म-मरण से मुक्ति का मार्ग बता कर या फिर संतान उत्पन्न न होने पर उसे मोक्ष न मिलने का तर्क देकर स्त्री को सदा अधीन बनाए रखता है। समाज में इसी तरह की अनेक किवदंतियां और पूर्वाग्रह लंबे समय से चले आ रहे हैं।

विडंबना है कि शिक्षित और आधुनिक समाज भी आज तक इन रूढ़ियों पर अंकुश नहीं लगा पाया या कहें कि लगाना ही नहीं चाहता। ऐसा देखते आए हैं कि विवाह के समय लड़की की उम्र लड़के से कम होनी चहिए, क्यों? शायद कम उम्र की लड़की में परिपक्वता कम होने के कारण उसको नियंत्रित-निर्देशित करना तुलनात्मक रूप से सरल होता है और उसका समाजीकरण मनमाने तरीके से किया जा सकता है। ऐसे में महिला समाजीकरण और उसका सबलीकरण विरोधाभासी नजर आते हैं। ‘

अगर महिलाओं का समाजीकरण पुरुष-सत्ता के अंतर्गत हुआ है, तो उसके सबलीकरण की बात ही बेमानी हो जाती है। अन्यथा महिला आरक्षण को अब तक लोकसभा में स्वीकृति मिल गई होती। क्या महिलाओं का सबलीकरण पुरुष समाज के समक्ष अनेक चुनौतियों को उत्पन्न करता है, जिसके भय से महिलाओं के आरक्षण विधेयक को पास नहीं होने दिया गया। यह एक ऐसा अनुत्तरित प्रश्न है, जिस पर विमर्श करने से भी शायद लोग कतराते हैं। महिलाओं के संदर्भ में ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिन पर विमर्श या सार्वजानिक चर्चा करने की जरूर सदियों से अनुभव की जाती रही है, पर समाज, राज्य, अकादमिक जगत और बुद्धिजीवी सभी खामोश हैं।

कुछ समय पहले महिला सुरक्षा को लेकर सत्ता के गलियारों में कुछ चर्चा सुनाई दी, पर परिणाम हम सबके सामने है। जब कोई बड़ी घटना हो जाती है, तो महिला सुरक्षा को लेकर लोगों का गुस्सा कुछ देर के लिए दिखने लगता है, पर कुछ समय बाद वही ढाक के तीन पात नजर आते हैं। लड़कियों को देर रात या सांझ के बाद घर से बाहर अकेले नहीं निकलना चाहिए, उन्हें छोटे वस्त्र नहीं पहनने चाहिए, उन्हें लड़कों की बराबरी नहीं करनी चाहिए, उन्हें ऊंची आवाज में बात नहीं करनी चाहिए जोर-जोर से नहीं हंसना चाहिए, सड़क चलते लड़कों की फब्ती पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, आदि।

आखिर ऐसा क्यों? क्यों किया जाता है महिलाओं का ऐसा समाजीकरण? पशु और स्त्री में क्या कोई फर्क नहीं है? या यह मान लिया गया है कि स्त्री के पास केवल शरीर होता है, मस्तिष्क नहीं? वह केवल भावनात्मक प्राणी है, इसलिए बौद्धिक निर्णय लेने की प्रक्रिया से उसे वंचित रखने का प्रयास जारी है? क्या महिला आरक्षण विधेयक का पास न हो पाना वास्तव में महिलाओं के विशिष्ट समाजीकरण और उसकी पुरुष द्वारा की गई व्याख्या में निहित हैं?

देखा जाए तो महिलाओं के सबलीकरण के यथार्थ को उनके समाजीकरण की विसंगतियों के आधार पर ही समझा जा सकता है। इस समाजीकरण में महिलाओं के शरीर, पवित्रता-अपवित्रता के संदर्भ, महिलाओं द्वारा प्रयुक्त किए जा रहे प्रतीक (विवाह पूर्व, विवाहित, विधवा के रूप में), बच्चों के जन्म तथा पालन-पोषण, रसोई में उनकी भूमिका, ससुराल और पति के बारे में दृष्टिकोण, भाषा के प्रयोग, विभिन्न व्यवसायों से जुड़ी महिलाओं, यौन संबंधों के सवाल, पोशाक, भोजन संबंधी आदतों आदि के बारे में बताते हैं और साथ ही यह भी बताते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं? चाहे वे घरेलू महिलाएं हों या पेशे से जुड़ी, सभी महिलाओं का समाजीकरण ऐसे ही किया जाता है और इन्हें सभ्यता और संस्कृति की व्याख्या का भाग बनाया जाता है, क्योंकि इन्हें सहेजने की जिम्मेदारी महिला को सौंपी गई है। अगर ये सभी व्याख्याएं और निर्धारण पुरुष करे तो सबलीकरण कैसा?

अभी कुछ समय पहले गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक पति द्वारा दायर तलाक याचिका के मामले में कहा कि अगर विवाहिता हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार मंगलसूत्र, चूड़ियां और सिंदूर लगाने से इनकार करती है, तो यह माना जाएगा कि विवाहिता को शादी अस्वीकार है। यह किस तरह का तर्क है?

हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में इस तरह का कोई तर्क नहीं दिया गया है कि पत्नी द्वारा इन प्रतीकों का प्रयोग न करने पर विवाह को अवैध माना जाएगा। तो फिर इस निर्णय का आधार क्या है? दूसरा उदाहरण, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार पुत्री को पिता की संपत्ति में अधिकार नहीं था। वर्ष 2005 में संशोधन के बाद उन्हें यह अधिकार मिला, पर इस शर्त के साथ कि यह अधिकार केवल 2005 के बाद जन्मी पुत्रियों को होगा।

वर्ष 2015 में पुन: इस निर्णय को संशोधित किया गया और सभी पुत्रियों को पिता की संपत्ति में अधिकार दिया गया, जिसे अनेक चुनौतियों के बाद हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकृति दी है। स्त्री को अपने किसी भी अधिकार के लिए हमेशा संघर्ष क्यों करना पड़ता है? शिक्षा का अधिकार, बराबरी का अधिकार, जीवन साथी चुनने का अधिकार, नौकरी करने या न करने का अधिकार, संतान पैदा करने या न करने का अधिकार, विवाह करने या अविवाहित रहने का अधिकार, यहां तक कि अपनी जिंदगी को अपनी मर्जी से जीने का अधिकार, अपना भविष्य तय करने का अधिकार, क्या ये सब अधिकार महिलाओं के व्यक्तित्व का हिस्सा बन पाए हैं। अगर नहीं तो फिर कैसा सबलीकरण? इन सभी सवालों पर ‘महिलाओं की आलोचना’ या ‘महिलाओं का संकोच’ उनके अराजनीतिक और असंगठित होने का सबूत कहा जा सकता है।

महिलाओं की स्वतंत्रता, उदारता, समानता और खुलेपन को परिवार और समाज-विरोधी मान लिया जाता है। इसलिए सिमेन द बोउआ तर्क देती हैं कि महिलाओं को स्वतंत्र परिवेश से पृथक रखा जाता है और ‘निर्भरता से जीवन में संतुष्टि मिलती है’, का विचार महिला की चेतना का हिस्सा बना दिया जाता है। परिवार, पति, बच्चे, कपड़े, रसोई पर तो उसे चर्चा करने का हक है, पर इस दायरे के बाहर का विश्व उसके चिंतन का विषय क्षेत्र नहीं हो सकता। पुरुष समाज ने हमेशा महिला को अधीनस्थ बनाया है, जिसे समाप्त किए बिना महिला सबलीकरण का रास्ता तलाशना कठिन है।

वर्तमान दौर में ‘ज्ञान शक्ति है’ का तर्क यह संकेत देता है कि महिला को भी ज्ञान के क्षेत्र में इतना गहरे उतरना होगा कि वह न केवल हर तरह के भय का सामना कर सके, बल्कि इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में एक शिष्ट जीवन भी जी सके। ज्ञान की इस शक्ति द्वारा ही महिला न केवल अपने शोषण से मुक्ति पा सकती है, बल्कि शक्ति संबंधों में भी अपना स्थान सुनिश्चित कर सकती है और तभी बराबरी का समाज उभार ले सकता है।

 

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