भोजपुरी विशेष: बंगाल में भोजपुरिया ठसक – आखिर कउन लासा ह भोजपुरी में कि सबके सटा लेला | ayodhya – News in Hindi

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बंगाल में भलेहू कई कल कारखाना अब न चलत होखे लेकिन उहवां अंग्रेजन क जमाना से बनल कल कारखाना खासकर चटकल (जूट मिल ) अउर सूताकल ( धागा- कपड़ा मिल ) के आसपास बसल बिहारी अउर पूर्वांचली समाज क मोहल्ला में आजहऊ भोजपुरिया बोली क हनक दिखाई पड़ेला. अइसन नईखे कि उहवां रहे वाला सब लोग बिहार और पूर्वांचल के भोजपुरी बोले वाला इलाका से आवे ल. भोजपुरी के अलावा बिहार के मगही, मैथिली, अंगिका, बज्जिका और पूर्वांचल के अवधी बोले वालन समाज के लोग भी उहवां बहुत हउंवन लेकिन सब क अपने में बोलचाल भोजपुरी में ही होला. हुगली नदी के नियर बसल अइसने बंद हो गईल चटकल अउर  सूताकल के अगल बगल रहे वाला इलाका में एगो मोहल्ला क नाम ह मुंगेरपाड़ा. मुंगेर ह बिहार क एगो बड़ जिला. आज से पचास साठ साल पहिले उहवां से रोजी रोटी के जुगाड़ में कुछ लोग बंगाल के 24 परगना जिला के ई इलाका में आइ के बस गइ ल.. आस्ते आस्ते पूरा मोहल्ला बस गईल अऊर नाम पड़ गईल मुंगेरपाड़ा.

अंगिका इलाका के लोगन के बोली भी भोजपुरी
मजे क बात इ ह कि मुंगेरपाड़ा में रहे वाला अपने घर में त अंगिका ( मैथिली क उप बोली) बोले नन, लेकिन बाहर उनकर बोली भोजपुरी हउए… शुरू में बिहार से आकर बसे वालन मुंगेरिया भाई लोगन के भोजपुरी बोले में दिक्कत त जरूर होइल होई लेकिन उहवां जनम लेवे वालन उन क बाल बच्चन त घर में आपन बोली के साथे मोहल्ला से बाहर भोजपुरी बोले में कउनो दिक्कत न होइल होई… काहे से कि उन सब कर बोली में आपन बोली क कउ न परभाव नाही दिखाई पड़ेला. अब सवाल इ ह कि दूसर बोली बोले वालन के भोजपुरी ही काहे बोले पड़ेला. उ आपन बोली भी त बोल सकत रहलन. जाहिर ह कि उहवां भोजपुरी क परभाव ज्यादा होई. काहे से कि भोजपुरी बोले ज्यादा होई हं. लेकिन मजे क बात इ ह कि उ इलाका में भोजपुरी के अलावा दोसर बोली जैसे अंगिका और मगही बोले वाला तनको उन्नीस न होइहें बलुक दूनो मिला के भोजपुरी से दूना होइहें.

त भोजपुरी में कौन लासा बाफेर भोजपुरी में अइसन कउन लासा ह कि दोसर बोली बोले वालन के भी अपने से साट लेला. हो सकेला भोजपुरी बोले वाला उहवां के लोग दबंग होइहें. एकरे चलते अंगिका और मगही बोले वालन उनकर परभाव में तुरते आ जात होईहें. एमन थोड़ बहुत सच्चाई हो सकेला लेकिन पूरा नाहीं. काहे से कि अंगिका और मगही बोले वालन लोग भोजपुरी बोले वालन से दबंगई में तनको कम न होलन. रेलगाड़ी पर चढ़ के बंगाल से आपन गांव जाए वाले भोजपुरिया भाई लोगन के इ बात जरूर पता होई कि बिहार के अंगिका और मगही बोली वाले इलाका जमुई, किउल, बाढ़, बढ़इया, मोकामा, पटना से जब गाड़ी निकले त उहवां के लोगन के सामने उनकर मुंह पर कइसे ताला लग जाला. त कहे क माने इ कि मगही और अंगिका बोले वाले भोजपुरी से बीसे होलन. त आखिर भोजपुरी में आखिर कौन खास बात है कि गैर भोजपुरी वाले ओके बोले पर मजबूर हो जालन.

मूल रूप से पूर्वांचल के रहे वाले बंगाल के अइसने इलाका में पढ़ल बढ़ल एगो बड़ पत्रकार स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह आपन एगो इंटरव्यू में एगो सवाल के जवाब में कहले रहलन कि भोजपुरी में आपन अलगे तरह क परभाव है कि उ दूसर बोली – भाषा प हावी हो जाले. अपने तर्क में उनकर कहना रहे कि गैर बंगाली बोली त छोड़अ. उनकर साथ पढ़े वाले अउर भोजपुरी मोहल्ला के पास पड़ोस में रहे वालन कई बंगाला भाषी भी भोजपुरी बोलल सीख गईलें. अउर उनकर अपने में भोजपुरी ही बोलचाल क बोली रहल. ह हैरान करे वाली बात कि बंगाल में रहे वाला बंगला भाषी भोजपुरिया समाज में मिल जुल कर भोजपुरी सीख लेलस. कई बंगाली भाई त अइसन भोजपुरी बोलेनन कि केहू पकड़े न पाई कि उ बंगाली हउंअन. दोसर ओर बंगाल क चटकल इलाका में कई अइसन बिहारी – पूर्वांचली परिवार बसल ह कि दू तीन पीढ़ी से बंगाल में रोजी रोटी कमा के भी आज तक साफ बंगला नाही बोल पावेला.

अइसन नइखे कि भोजपुरी बोले वाला बंगाली भाई लोग ढेर हऊअन. आज हूं उहवां के कल कारखाना के अगल बगल बसल समाज के साथ रह के भी ठेठ भोजपुरी बोले वाला बंगाली भाई लोग बहुत कम हउअन. लेकिन जे तरह से उहवां के लोगन में बिहारी अउर पूर्वांचली समाज के लेके एगो खास विचार रहल ह उ हिसाब गिनन चुनल लोग भी भोजपुरी बोले लागल त ई बहुते बड़ बात मानन जाई. ईहवां ई बतावल जरूरी है कि बंगाली भाई लोग कौनो सौख से भोजपुरी बोलल ना सीखे ल… उ त संगत के फेर में सीखे पड़ेला या त फेर भोजपुरी में ही अइसन लास ह कि जे के लग जाला ओसे छोड़ावल मुसकिले होला. संगत में ठेठ बोले के सीख ले ल कि दो गो भोजपुरिया साथिन के आपस में बतिआवल देख के बंगला भुला के ठेठे में बोले लगे न. साथी संगी क गोल बड़ो होईले पर जेमे बंगाली के साथे मान ल मारवाड़ी अउर पंजाबी संगी भी हउअन, दो गो भोजपुरिया भाई ही भारी पड़े लं.

माडवाड़ी लोग भी भोजपुरी सिखलस

बंगाल में रहे वाला गैर बंगाली समाज में मारवाड़ी लोगन क संख्या भी बहुते ज्यादा ह. अइसे से त राजस्थान से व्यापार करे आइल ई समाज के लोग समूचा बंगाल में फैइलन हउअन. लेकिन कलकत्ता में व्यापार के चलते और अगल बगल के जिला में बसल कल कारखाना में खास हुगली नदी के किनारे बनल चटकल अऊर सूताकल में काम करले के चलते. अंग्रेजन के बाद कलकत्ता सहित बंगाल बिहार ( एक जमाना में बिहार अऊर उड़ीसा परदेस बंगाले क हिस्सा रहल ) के व्यापार व कल कारखानन क मालिक मारवाड़ी ही बन गईलन. मारवाड़ी मालिकन के दोसर केहू पर तनिको बिसवास नाही रहे. एही के चलते आपन कारखाना चलावे क जिम्मा उ पढ़ल लिखल मारवाड़ियन के हाथे देत रहलन. पुरान मारवाड़ी भाई लोग त हनक से कारखाना चलावें.

मिल क मजदूर भाइयन से ढेर मिले मिसे ना ही. लेकिन मिल के क्वार्टर में रहे वाला उनकर बच्चा लोग, मजदूर भाइयन क बच्चन के साथ में खेले कूदे लग नय. बड़ होले पर दोनों समाज क लइका लइकी साथ पढ़े ऊ लागल. अब इयां भी भोजपुरी आपन कमाल देखा देलस. मारवाड़ी बच्चा भोजपुरिया समाज में मिल मिस कर ठेठ बोले लागल. मजेदार बात इ ह कि भोजपुरी बोले वाला संगी साथी संगे रह के भी मारवाड़ी बोले ना सीख पाइल. चाहे नइकी पीढ़ी हो चाहे पुरनकी. ह न ई एगो दोसर भाषा बोली वाला परदेस में आपन परभाव छोड़े क कमाल. अब चाहे इ भोजपुरी बोली का हनक होखे चाहे ओके बोले वालन क ठसक. अ चाहे इ बोली क आपन मिठास. एकर परभाव में दोसर भाई लोग तुरते आ जा ला.

एगो अउर बात बतवते चली. मगही, मैथिली, भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका बोले वाला परदेस बिहार में पुलिस के सिपाहियन क आपस में बोल चाल क बोली भोजपुरिये ह. इ कइसे अउर काहे होइल. एपर बिस्तार से फेर कबहूं चरचा होई.



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