collapse of world trade center Demolished towers and revenge missions – राजनीतिः ध्वस्त मीनारें और बदले के अभियान

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अजय श्रीवास्तव

वह अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर की 11 सितंबर, 2001 की अलसाई सुबह थी। तकरीबन आठ बज कर छियालीस मिनट पर एक हवाई जहाज वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के उत्तरी टावर से टकराया। पलक झपकते ही टावर आग के शोलों में तब्दील हो गया। भारी अफरातफरी के बीच लोग बदहवास अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे, तभी एक और जहाज दक्षिणी टावर से टकराया। वह भी धूधू कर जलने लगा। फिर वह हुआ, जिसकी कल्पना टावर बनाने वालों ने भी नहीं की होगी। दोनों टावर ताश के पत्तों की तरह भहरा कर गिर गए। इसके थोड़े अंतराल के बाद एक और जहाज वाशिंगटन के रक्षा विभाग के मुख्यालय, जो अतिसुरक्षित क्षेत्र में था, से टकराया और वहां भी वही विनाशलीला शुरू हो गई, जो वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुई थी। चौथा विमान भी हमले के लिए निकला था, मगर वह नाकाम होकर खेतों में गिर गया।

इस आत्मघाती हमले में तीन हजार से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। जिस समय वह हमला हुआ था, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लगभग अठारह हजार लोग काम कर रहे थे। गनीमत थी कि जब उत्तरी टावर में आग लगी तो दक्षिणी टावर में काम कर रहे अधिकांश लोग बाहर आ गए थे। मरने वालों में सत्तर अलग-अलग देशों के नागरिक थे, जो बेहतर जिंदगी की तलाश में अमेरिका आए थे।

अमेरिका की शान थे ये दोनों टावर, जिस पर अलकायदा की नजर 1996 से ही थी। इस हमले में अमेरिका को अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा था। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मे रखी दुर्लभ कलाकृतियों की कीमत करीब दस करोड़ डॉलर आंकी गई थी। करोड़ों के कम्प्यूटर, फर्नीचर और अन्य चीजें नष्ट हो गर्इं। इसके अलावा जो चीज सबसे अधिक प्रभावित हुई, वह अमेरिका की साख थी। सबसे सुरक्षित देश का दंभ भरने वाले अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था तार-तार हो गई थी।
एफबीआई की जांच में पता चला कि इस हमले के पीछे अल-कायदा है। फिर उसके सरगना उसामा बिन लादेन की तलाश शुरू हुई। यह वही ओसामा बिन लादेन था जिसे अमेरिका ने सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर कब्जे की लड़ाई में हर तरह की मदद की थी।तालिबान और अल-कायदा मूल रूप से एक ही हैं, जो अफगानिस्तान युद्ध की उपज हैं।

1978 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान के शासक की मदद की गुहार पर अफगानिस्तान में प्रवेश किया था। उन दिनों अफगानिस्तान में साम्यवादी सरकार थी और उसे मुजाहिदीन लगातार अस्थिर कर रहे थे। सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका ने सीधे न उतर कर पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक रख कर लड़ाई लड़ने की योजना बनाई। पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक मदद दी जाने लगी। अमेरिका ने अपनी कूटनीति से इस लड़ाई को इस्लाम के खिलाफ रूस की लड़ाई कह कर प्रचारित किया। पाकिस्तान ने अपने लड़ाकों से कहा कि इस्लाम खतरे में है और तुम्हे इस्लाम के लिए जेहाद करना है। अमेरिका और पाकिस्तान की यह मुहिम रंग लाई और अनपढ़ नौजवान जेहाद करने के लिए तैयार हो गए। बहुत से इस्लामिक देशों ने इस लड़ाई के लिए मोटी रकम दी, जिससे आधुनिक हथियार खरीदे गए।

दस साल तक चले इस सघर्ष में सोवियत संघ धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया और सन 1990 में उसने अफगानिस्तान से हटने का निर्णय किया। सोवियत सेना के लौटने के तुरंत बाद तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लिया। तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर और अल-कायदा प्रमुख लादेन इस युद्ध के हीरो थे और फिर अफगानिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बना दिया गया।

जिस सांप को अमेरिका ने इतने दिनों तक दूध पिलाया उसी ने एक दिन उसे डंस लिया। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने तालिबानी प्रमुख मुल्ला उमर से लादेन को सौंपने के लिए कहा था, पर उसने इससे इनकार कर दिया। तब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर तालिबान को सत्ता से बेदखल किया था।

ट्रेड सेंटर की जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि इस पूरे अभियान की कमान लादेन ने अपने दाहिने हाथ खालिद शेख मोहम्मद को दे रखी थी। खालिद शेख ने इस ऑपरेशन के लिए तकरीबन पचास लोगों को प्रशिक्षित किया, जिसमें उन्नीस लोगों को विभिन्न तरीके से अमेरिका भेजा और ये सभी आत्मघाती थे। उन्नीस अपहरणकर्ताओं में से पंद्रह सऊदी अरब के थे और बाकी यूएई, इजिप्ट और लेबनान के रहने वाले थे। हमले वाले दिन एयरपोर्ट की सुरक्षा को भेदते हुए आतंकियों ने चार जहाजों का अपहरण कर लिया, जो विभिन्न जगहों से न्यूयॉर्क आए थे और इन पर यात्री बैठे हुए थे। आतंकियों ने यात्रियों से भरे जहाज को विभिन्न जगहों पर टकराया था।

अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने ओसामा को पकड़ने के लिए अफगानिस्तान में तालिबानी शासन को तहस-नहस कर दिया, मगर वहां लादेन पकड़ा नहीं जा सका। वह तो आंतकवाद की पनाहगाह पाकिस्तान के ऐबटाबाद में छिपा था। एक ऑपरेशन के दौरान गिरफ्तार किए गए एक आतंकी से एफबीआई के एजेंटों को सूचना मिली कि लादेन पाकिस्तान के ऐबटाबाद में छिपा हुआ है। तब उसे पकड़ने के लएि जेरोनिमो नाम से निर्णायक ऑपरेशन की रूपरेखा बनाई गई। रात ग्यारह बजे ऑपरेशन शुरू हुआ। तेईस सदस्यों की अमेरिकी नौसेना की सील टीम दो ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टरों में बैठी। लगभग आधे घंटे की यात्रा के बाद हेलीकॉप्टर लादेन के घर के ऊपर मंडराने लगे। हेलीकॉप्टरों को इस तरह से डिजाइन किया गया था कि उनसे कम से कम आवाज निकले और वे पाकिस्तानी रडार की पकड़ के बाहर रहें। ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टरों के उड़ान भरने के पैंतालीस मिनट बाद उसी रनवे से चार चिनूक हेलीकॉप्टरों ने लक्ष्य की तरफ उड़ान भरी।

चार में से दो हेलीकॉप्टर पाकिस्तानी सीमा के पास रुक गए और शेष दो अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ गए। यह पहले से तय नहीं था। राष्ट्रपति ओबामा के कहने पर इन्हें बैकअप के रूप में भेजा गया था। वे चाहते थे कि अगर आॅपरेशन विफल होगा तो सैनिकों को किसी भी तरह अफगानिस्तान पहुंचाया जा सके, जहां से यह ऑपरेशन संचालित हो रहा था।
दो ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टरों में से एक लादेन के घर लैंडिंग के समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया, उसके पंख कंक्रीट की मजबूत दीवार से टकरा कर क्षतिग्रस्त हो गए थे, मगर पायलट की सूझबूझ से उसकी सफल लैंडिंग करा दी गई। दूसरा हेलीकॉप्टर सफलतापूर्वक लैंड हो गया और नेवी शील के प्रशिक्षित कमांडो ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।

दरवाजे को तोड़ कर कमांडो अंदर घुसे, तभी लादेन की बीवी की नींद तेज आवाज के साथ खुल गई। आवाज सुन कर लादेन भी जागा और वह देखने के लिए बाहर निकला। जब तक वह लोहे के दरवाजे को बंद करने का प्रयास करता, एक कमांडो उसके कमरे में घुस चुका था। अपने को घिरा हुआ देख कर लादेन चुपचाप खड़ा हो गया, वह जान चुका था कि अब बचना नामुमकिन है। कमांडो ने बिना समय गवाए लादेन पर डबल टैप शॉट लगाया, जो उसके सीने और बाईंआंख को बेधते हुए बाहर निकल गई। उसके प्राण पखेरू पहली गोली में ही उड़ गए थे। मारने के बाद लादेन के शरीर को हेलीकॉप्टर में लाद कर अफगानिस्तान ले जाया गया और डीएनए की जांच कर पुख्ता कर लिया गया कि वह लादेन ही है।
जब अमेरिकी कमांडो सफलतापूर्वक ऑपरेशन पूरा करके चले गए तब पाकिस्तान को यह खबर मिली कि अमेरिकी नेवी शील ने ओसामा बिन लादेन को उनकी सरजमीं में घुस कर मार डाला है और उसके शव को ले गए हैं। इस तरह अमेरिका ने अपने निर्दोष नागरिकों की मौत का बदला लिया था।

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