भोजपुरी में पढ़ें: कुंवर सिंह के कहानी बहुते तूफानी  | ayodhya – News in Hindi

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इसे ते देश के कोना-कोना आजादी के लड़ाई में एक से एक बलिदान कइले बा, पर वाह से भोजपुरिया माटी कि तरह तरह के रेकार्ड एहि धरती के लगे बाड़े. अठारह सौ सत्तावन के विदरोह में मंगल पांड़े अउर 1942 में जिला के आजाद करावे वाला नेता चित्तू पांड़े भोजपुरिया इलाका में एक ही जिला बलिया के रहे वाला रहले. इ दुनो लोगनि के बिना देश में आजादी के लड़ाई के कहानी ना लिखल जा सकेला. एहि लोगनि अइसन एगो अउरी क्रांतिकारी के नाम लिहल जाऊ, त उ हवुअन बीर कुंवर सिंह. बिहार में भोजपुर के जगदीशपुर के किलेदार के कहानी रोंगटा खड़ा करि देबे वाला बा. अठारह सौ सत्तावन के क्रांति में जब उ अपना सैनिकन के संगे मैदान में उतरले, ओ घरी उनकर उमिर अस्सी साल के रहे-

हड्डी ठोस, पेसानी दमकत, पुष्ट वृषभ-कंधा बा
अस्सी के बा उमर भईल, जे कहे बूढ़? अंधा बा
सिंह चलन, रवि जलत नयन, जुग सुगठित चंड भुजा बाअईसन डोलेला ज़ईसे, डोलेला विजय पताका..

कवि कहत बाड़े कि अस्सी साल के उमिर के बावजूद जे उनके बूढ़ कहे, उ आन्हर होई. बाबू कुंवर सिंह सत्ताइस अप्रैल उनइस सौ सत्तावन के दिने आरा नगर पर कब्जा कइ लिहले. ए उमिर में गजब के घुड़सवारी अउर तलवारबाजी. देखीं ए गीति में-

रामा बोली उठे देवी दुरगवा हो ना…
कुंवर इहे हवे मानिक पलटनिया हो ना..
रामा घोड़वा नचावे कुंवर मैदनवा हो ना..

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इ कविता 1857 के आसपास लिखल ‘कुंवर विजयमल’ से लिहल गईल बा. एकर लेखक के नाम जानकारी में नइखे आ पावल. आरा नगर पर कब्जा खातिर अंगरेज सेना आइल त बीबीगंज अउर विहिया के जंगल में लड़ाई भइल. अंगरेज एकरा बाद कुंवर सिंह के गढ़ जगदीशपुर पर हमला कइ देहलसि. कुंवर सिंह के भाई अमर सिंह अंगरेजन के घेरत रहले अउर बीर बाबू कुंवर सिंह बांदा, रींवा, आजमगढ़,बनारस, बलिया, गाजीपुर आ गोरखपुर में विदरोह के आगि फूंके लगले. दुनो भाई कुंवर सिंह अउर अमर सिंह के बीचे गजब के तालमेल रहे. कुंवर सिंह पहिलवे से अपना छोटका भाई के हाल बतावत रहले –

लिखि लिखि पतिया भेजे कुंअर सिंह
सुनि ल अमर सिंह भाई हो राम.
चमवा के टोंटवा दांत से चलवावता
छत्री के धरम नसावे हो राम…

‘छत्री धरम’ माने अतियाचार के खिलाफ लड़ाई कुंवर सिंह के मंतर रहे. एहि से उ कबो विदेशी सरकार के ना सुनले. अंगरेजी सरकार उनकरा के तरह तरह के लालचि दिहलसि. बड़ सूबा बना के ओकर राजा बनावे के कहलसि, बाकिर वाह से कुंवर सिंह कि, अपना देश के कीमति पर उनकरा के कवनो जागीर ना चाहीं-

कप्ताम लिखे खुंवर सिंह
आरा के सूबा बनाइब ऐ.
तोहफा देबो, इनाम देबो
तोहके राजा बनाइब ऐ.
बाबू कुंवर सिंह भेजले सनेसवा
मोसे ना चली चतुराई ऐ.
जब तक प्रान रही तन भीतर
मारग नाही बदलाई ऐ.

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बाबू कुंवर सिंह एहि गीतिए को मोताबिक साबितो कइले. लड़ाई में उतरले त उ भयंकर तरीका से दुश्मन सेना पानी मांगे लागलि. कुंवर सिंह के समे के ही कवि तोफा राय लिख तारे-

देवता देखे लागल जोगनी भखे लगलि
गोरन के रक्त लाल पीके पेट भरल नू
ऊपर आकाश गरजे, नीचे बीर कुंवर गरजे
गोर फिरंग संग पावस होले खेलल नू

दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह के किताबि ‘भोजपुरी के कवि एवं काव्य’ में एगो भोजपुरी नाटक ‘कुंवर सिंह’ भी बा. युद्ध के वरणन ओहु किताबि में बा. एगो गीति के दुगो लाइन ह-

बाबू ग़जब फेंके तरुआरि, बाघे अस टूटि परे
टपाटप बाजे ओके टाप, छपा-छप मुड़ी गिरे…

बाबू कुंवर सिंह बीर अइसन के ओघरी दुश्मन देश के इतिहासकार भी बड़ाई करत बाड़नि. बिरटेन के लेखक होम्स कहत बाड़े कि उ बुजुर्ग राजपूत बिरटिस सत्ता से आन-बान-शान के साथ लड़ले. होम्स मान तारे कि गनीमत इहे रहे कि लड़ाई के समे कुंवर सिंह अस्सी साल के रहले. जदि उ जवान रहते त अंगरेज ओही घरी भारत छोड़ि देले रहतनि. बाबू कुंवर सिंह पर अउरी विदेशी विदवान लोग भी खूबे लिखले बा. जी. डब्ल्यू. फ़ॉरेस्ट के किताबि ‘अ हिस्ट्री ओफ़ इंडियन म्यूटिनी’; गिबर्न सिवेकिंग के पुसतक ‘अ टर्निंग प्वाइंट इन द इंडियन म्यूटिनी’; अउर जॉन जेम्स हॉल्ज़ की किताबि ’आरा इन 1857’ भी बहुते कुछ कह तारी सनि. एहि तरे पॉल ब्रोका के चिट्टी-पतरी, जॉर्ज ए ग्रियरसन के किताबि ‘बिहार पेज़ंट्स लाइफ़’ अउरी एलएसएस ओ मैली के भी ‘शाहाबाद के गज़ेटियर’ में कुंवर सिंह के वीरता के बारे में खूब कहले बाड़े.

अइसन बीर कुंवर घरे के भेदी के कारन आपन जान गंवा बइठले. तमाम जगहि से जीतत जब उ जगदीशपुर के ओरि फेरि लौटत रहले, ओही समे पर गंगा बीच अंगरेज सेना के सिपाहियन के गोली से उनकर एगो हाथ घाही हो गइल-

देसी अउर विदेसी के फरक कह राखल नाही
अपने में लड़ लड़ के विदेशी के जितौले बा
गोरा सिख सेना ले निडर जे चढ़ल आवे
घर के विभिखन भेद घरवे नू बतवले बा.

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बाबू कुंवर सिंह के रिश्ता में भाई लागे वाला नर्मदेशवर प्रसाद सिंह के ए गीति में घर के भेदिया के करतूत बतावल गइल बा. गोली लगला पर भी कुंवर सिंह ना रुकले. घाही हाथ काटि के गंगा जी के चढ़ा दिहले. जगदीशपुर पहुंचि के तेईस अप्रैल, अठारह सौ अठावन के फेरू से जगदीशपुर के आजादी के घोषणा कइले. नियति के कुछ अउरे मंजूर रहे. गोली लगला से शरीर में फइलल जहर के कारण अइसन बीर कुंवर सिंह तीन दिन बादे चलि बसले.

काली किंकर दत्त के कुंवर सिंह पर लिखल दुगो किताब के भी बड़ा चरचा होला. पहिलका ‘अनरेस्ट अगेंस्ट ब्रिटिश रुल इन बिहार, 1831-1859’ अउरी दुसरका ‘बायोग्राफी ऑफ़ कुंवर सिंह एंड अमर सिंह’ में बहुते विस्तार से लिखल गइल बा. एकरा बादो अइसन लागत बा कि जवन कहानी लोकगीत अउरी लोगन के बीच बा, ओह पर काम कइल जाउ त अउरी बढ़िया होई.



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