Uttar Pradesh Politics News Update; Will Aam Aadmi Party able to fill the opposition’s place in UP? | 6 साल बाद यूपी में एक्टिव मोड पर आम आदमी पार्टी; शार्टकट का सहारा लेकर जनाधार बनाने में जुटे नेता

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लखनऊ17 घंटे पहले

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सांसद संजय सिंह यूपी में आम आदमी पार्टी का चेहरा हैं।

  • पिछले एक महीने से यूपी में सक्रिय हैं ‘आप’ के राज्यसभा सांसद संजय सिंह
  • 16 कॉन्फ्रेंस करके योगी सरकार को घेरा, अलग-अलग शहरों में दर्ज हुए 13 मुकदमे

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा, बसपा और कांग्रेस पार्टी सोशल मीडिया के जरिए राजनीति कर रही हैं। इससे धरातल पर विपक्ष का एक स्पेस खाली-सा हो गया है। वहीं, आम आदमी पार्टी एक मुखर विपक्ष बनकर उभर रही है। कोरोना संक्रमण का मामला हो या कानून व्यवस्था का मुद्दा, हर मोर्चे पर योगी सरकार को घेरने की कोशिश हो रही है। पिछले एक माह में यूपी प्रभारी और राज्यसभा सांसद संजय सिंह पर 13 मुकदमे अलग-अलग शहरों में दर्ज हुए। उन्होंने अब तक 16 से ज्यादा प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए योगी सरकार पर निशाना साधा है। जातिगत सर्वे के जरिए ब्राह्मणों के मुद्दे को आप बनाम अन्य पार्टियां बनाकर चर्चा भी बटोरी।

लेकिन, अब सवाल उठने लगा है कि लगातार सुर्खियों में बनी आम आदमी पार्टी क्या यूपी में विपक्ष की खाली जगह भर पाएगी या फिर सुर्खियों में ही बनी रहेगी। या फिर सत्तापक्ष की एक रणनीति है कि जनता भ्रमित हो जाए कि मुख्य विपक्ष कौन है? पांच सवालों के जवाब की एक रिपोर्ट…

लखनऊ में आप पार्टी का प्रदेश कार्यालय।

लखनऊ में आप पार्टी का प्रदेश कार्यालय।

क्या आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लगी है?

उत्तर प्रदेश में सभी पार्टियों ने विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी है, लेकिन आम आदमी पार्टी ने अब यूपी में पैर जमाना शुरू किया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार आप पार्टी ने वाराणसी में पीएम मोदी और अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा। दोनों जगह हार मिली थी। पार्टी छह साल बाद वापसी की तैयारी कर रही है। विवादित मुद्दे उठाना, रोज प्रेस कॉन्फ्रेंस करना क्या यह सब यूपी की जनता को आकर्षित करने के लिए काफी होगा?

पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता वैभव महेश्वरी कहते हैं कि जाहिर है कि किसी भी राजनैतिक दल के केंद्र में चुनाव ही होता है। अभी एनाउंस तो नही किया गया है। क्योंकि पहले हम संगठन मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं। इसके अलावा हम कई तरह के सर्वे करा रहे है और उसके जरिए जानना चाहते है कि क्या यूपी की जनता हमें वाकई ऑप्शन के रूप में देख रही है या नहीं। वैभव के अनुसार जिला लेवल की कमेटियां बनी हुई हैं और अभी विधानसभा लेवल की कमेटियां भी तैयार हो गई हैं।

लेकिन इसके उलट सीनियर जर्नलिस्ट सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि आम आदमी पार्टी के पास यूपी में मजबूत संगठन नहीं है। जब पार्टी बनी थी, तब उसने यूपी में अपना विस्तार किया था। लेकिन, उनका ध्यान दिल्ली और पंजाब पर ही रह गया। ऐसे में जो पार्टी से जुड़े है वह हताश होने लगे। आम आदमी पार्टी कोई ऐसी कैडर आधारित पार्टी तो है नहीं कि कार्यकर्ता आंख मूंद कर काम करता रहता। अभी आम आदमी पार्टी जो थोड़ा बहुत दो तीन महीनों से यूपी में एक्टिव है। वह सिर्फ सुर्खियों तक ही सीमित रहेगा।

क्या स्ट्रेटजी है आम आदमी पार्टी की?

  • वैभव बताते हैं कि हम गांव तक पहुंचने के लिए ऑक्सीमीटर अभियान चलाने जा रहे हैं। यूपी के 1 लाख से ज्यादा गांव तक पहुंचने के लिए हमने 40 हजार लोगों की टीम तैयार की है। 4-4 लोगों की 10 हजार टीम बनाकर हम गांव से फीडबैक लेंगे और पार्टी का मजबूत आधार बनाएंगे। हम अभी पंचायत चुनाव में हिस्सा लेंगे। उसके रिजल्ट तय करेंगे कि हम कितना मजबूत है और आगे क्या विधानसभा चुनाव लड़ पाएंगे।
  • सिद्धार्थ कलहंस कहते है कि अभी जो दिख रहा है उससे यही लग रहा है कि आम आदमी पार्टी सिर्फ हिट एंड रन वाली स्ट्रेटजी पर काम कर रही है। चूंकि, विपक्ष में स्पेस है नहीं और विधानसभा चुनाव को देखे तो काम करने का समय बचा नहीं है। ऐसे में धरना-प्रदर्शन और रोज प्रेस कॉन्फ्रेंस करना मीडिया में बने रहने की कवायद ज्यादा दिख रही है बनिस्बत जमीन पर कुछ करने का।

सुर्खियों में रह कर दिल्ली फतह कर लिया तो यूपी क्यों नही?: जब आम आदमी पार्टी बनी तो मीडिया में खूब छाई रही। विधानसभा चुनाव हुए और उसने दिल्ली में शानदार प्रदर्शन भी किया लेकिन यूपी में वह क्यों फेल होगी? जानकार उसके कई कारण बताते हैं।

  • सीनियर जर्नलिस्ट सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि आम आदमी पार्टी हर राजनैतिक दल की तरह चुनाव लड़ना चाहती है। लेकिन वह खबरों में तो बनी हुई है लेकिन जमीन पर कहीं नहीं है। जमीन पर जाने के लिए समय, मेहनत, संसाधन वगैरह चाहिए जिसकी कमी है। विधानसभा चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी ने संगठन मजबूत करने की बजाय सुर्खियों में बने रहने की कवायद को महत्व दिया।
  • इनकी तुलना में अगर कांग्रेस को देखे तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लगातार फील्ड में निकल रहे हैं। 10-12 सालों में वह इकलौते राजनेता है जो पॉलिटिकल कारणों से 23 दिन जेल में रहे। साथ ही उनका संगठन भी है लेकिन इसके बावजूद वह उतने मजबूत नही नजर आते हैं। प्रियंका के आने के बाद संगठन में काम भी हो रहा है। फिर भी वह जानते हैं कि यूपी में मजबूत आधार खड़ा करने में समय उन्हें समय लगेगा।
  • अगर सपा की बात करें तो वह सड़क पर नहीं दिखती है। लेकिन जिला स्तर से लेकर ब्लॉक स्तर तक उनके पास संगठन है। हताश जरूर है, लेकिन निराश नहीं है। जब सपा तैयारियों में जुटेगी तो कार्यकर्ताओं को मोटिवेट करने में उन्हें कम समय लगेगा। जबकि आप ने वह काम नहीं किया है। इन्होंने शार्ट कट रूट लिया है।
  • दिल्ली में आप के नेता काम करते रहे। वॉलंटरी सेक्टर में वह काफी समय से काम कर रहे थे। पूरी लीडरशिप दिल्ली में है। यूपी की अपेक्षा छोटी जगह में जैसे दिल्ली में काम करना संभव है लेकिन यूपी में ग्रामीण इलाका जोकि 72% होता है। ऐसे में यहां पकड़ बनाने के लिए लंबा वक्त चाहिए और मैन पॉवर चाहिए। इसलिए दिल्ली में यह चल गया, लेकिन यहां ऐसा नहीं चल पाएगा। अब यूपी में जब आप आए हैं तो विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे में आप प्रेस कॉन्फ्रेंस करके या धरना प्रदर्शन करके या कंट्रोवर्सी क्रिएट करके आप चाहते हैं कि एक जनाधार बन जाएगा तो यूपी में ऐसा संभव नहीं है। यहां जमीन पर काम करना होगा।

आम आदमी पार्टी अचानक क्यों एक्टिव हुई?

आम आदमी पार्टी पिछले 6 सालों में पहली बार डेढ़ दो महीने से इस मोड में एक्टिव हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? सीनियर जर्नलिस्ट प्रदीप कपूर कहते हैं कि ऐसा लगता है कि सरकार भी चाहती है कि आम आदमी पार्टी सुर्खियों में बनी रहे। यह एक सत्तापक्ष की रणनीति भी हो सकती है कि मुकदमे कर दो। बयान जारी कर दो और इन्हें सुर्खियों में बनाए रखो ताकि जनता कंफ्यूज हो जाए कि मुख्य विपक्ष है कौन? अब यह कसरत साल भर चलती रहेगी। हालांकि प्रदीप कपूर यह भी कहते है कि इस कवायद से हो सकता है कि शहरी क्षेत्र में एक दो सीट का फायदा हो जाए क्योंकि जनता विकल्प तो खोज ही रही है अगर विश्वास इन्होंने बना लिया तो फायदा भी हो सकता है।

संजय सिंह की अगुवाई में यूपी में संगठन को फिर से एक्टिव करने की कोशिश की जा रही है।

संजय सिंह की अगुवाई में यूपी में संगठन को फिर से एक्टिव करने की कोशिश की जा रही है।

जातीय राजनीति में कहा टिकेगी आप?

आम आदमी पार्टी की अभी जो कवायद दिख रही है, वह वन मैन आर्मी के रोल में संजय सिंह दिख रहे हैं। उनके अलावा यूपी में कोई लीडरशिप नहीं दिख रही है। यूपी में संजय सिंह ने अभी हाल ही में ठाकुरवाद का मुद्दा भी उठाया था, लेकिन सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि जब तक यूपी में उनके पास क्षेत्रवार, जातिवार नेता नहीं होंगे तब तक सफलता दूर है। कलहंस कहते हैं कि विधानसभा चुनाव लोकल मुद्दों पर होता है। यहां थोड़ी थोड़ी दूर पर भाषा और जाति बदलती है। ऐसे में यहां इस पर फोकस किए बिना सफलता नहीं मिल सकती। इन्हें दलित, यादव, कुर्मी, मुस्लिम फेस इत्यादि चाहिए होंगे। जिनकी अपने इलाके में पकड़ हो। हालांकि अभी यह काम पार्टी के लिए मुश्किल लग रहा है।

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