By making agriculture the basis of the economy, a way can be made to make villages self-sufficient. – राजनीति: गांव ही बनाएंगे आत्मनिर्भर

0
36
.

सरोज कुमार

पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों से तस्वीर साफ हो गई है कि कम से कम पिछले सौ सालों के इतिहास में ऐसी आर्थिक तबाही नहीं आई, जैसी आज हम देख रहे हैं। मौजूदा आर्थिक संकट के लिए मोटे तौर पर कोरोनाविषाणु को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कहानी यह कि संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में पूर्णबंदी की गई और परिणामस्वरूप आर्थिक गतिविधियां ठप हो गईं और इसका परिणाम यह हुआ कि अर्थव्यवस्था रसातल में पहुंच गई। इसके बचाव में यह दलील भी दी जा रही है कि बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी सिकुड़ गईं हैं।

कारण और तर्क जो भी हों, लेकिन यह अब सच्चाई है कि अर्थव्यवस्था पैंदे में जा चुकी है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर हमने यह कौन-सी व्यवस्था बना रखी थी, जो एक विषाणु के व्यवधान के बीच हमें चंद महीनों की मोहलत भी नहीं दे सकी। समय के इस मोड़ पर जरा ठहर कर सोचना-समझना उतना ही जरूरी है, जितना विषाणु का टीका बनाना।

आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का मौजूदा स्वरूप बाजार की बुनियाद पर खड़ा है। बाजार उत्पादक, विक्रेता और खरीदार से बनता है। भारत भी इस बाजार का हिस्सा है और हर कोई बाजार से जुड़ने के लिए लालायित भी है। जो कुछ बाकी बचा है, उसे भी बाजार से जोड़ने का उपक्रम चल रहा है। जबकि, तथ्य यह भी है कि बाजार की इसी अंधी दौड़ ने हमें आज बेजार किया है। बाजार को चलते रहने के लिए उत्पादन होता रहना चाहिए, उत्पादों की बिक्री के लिए दुकानें खुलनी चाहिए, दुकानों चलें इसके लिए खरीदार होने चाहिए और खरीदारी के लिए लोगों की जेब में पैसे होने चाहिए। बाजार की यह शृंखला तभी दुरुस्त रहेगी, जब इसकी सभी कड़ियां अपनी जगह ठीक से काम करती रहें। एक भी कड़ी ढीली पड़ी या टूटी, तो अर्थ की यह व्यवस्था निरर्थक हो जाएगी।

अर्थव्यवस्था के मौजूदा स्वरूप को चलते रहने के लिए बाजार की इस शृंखला को हमेशा चुस्त-दुरुस्त बने की जरूरत है। लेकिन कोरोना ने कुछ ऐसा किया कि लाख रखवाली के बावजूद बाजार की यह शृंखला टूट गई। वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं। विकास दर शून्य से नीचे 23.9 फीसद तक गिर गई है। ऐसे में अब हम इसे ‘एक्ट आफ गॉड’ कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकते। लेकिन किसी को रास्ता भी नहीं सूझ रहा कि आखिर करें तो क्या करें।

आज के बारह साल पहले यानी 2008 में अमेरिका में रियल एस्टेट बाजार में अचानक आई तेजी और फिर धड़़ाम से नीचे आ जाने के बाद कर्ज देने वाले वित्तीय संस्थान एक-एक कर डूब गए थे। प्रतिष्ठित ब्रोकरेज कंपनी लेहमैन ब्रदर्स ने 15 सितंबर, 2008 को अमेरिका के इतिहास में अपने को 619 अरब डॉलर की राशि का सबसे बड़ा दिवालिया घोषित किया था। वित्तीय कंपनियों के दिवालिया होने के कारण तमाम लोग अपनी बचत से हाथ धो बैठे और बेघर हो गए। विश्व बाजार की सबसे बड़ी दुकान अमेरिका में आई इस वित्तीय बंदी को महामंदी नाम दिया गया था। इस दौरान अमेरिका के जीडीपी में 4.3 फीसद की गिरावट आई और बेरोजगारी दस फीसद तक बढ़ गई थी। इस आर्थिक भूकंप का केंद्र भले अमेरिका ही था, लेकिन इसके झटके यूरोप और दुनिया के दूसरे देशों तक महसूस किए गए। भारत भी इससे अछूता नहीं था। उस वक्त भारत सरकार ने अपने यहां आर्थिक झटके को बेअसर करने के उपाय किए थे और जीडीपी का 3.5 फीसद यानी एक लाख 86 हजार करोड़ रुपए के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की थी।

इस वक्त बड़ा सवाल यह है कि राजकोषीय उपायों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था गोता क्यों लगा गई। कोरोना प्रकोप से पहले ही पिछले साल सितंबर में सरकार ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कारपोरेट कर में अट्ठाईस साल में सबसे बड़ी दस फीसद की कटौती कर दी थी, जिससे कारपोरेट जगत को 1.45 लाख करोड़ रुपए का लाभ पहुंचा था। महामारी के बाद विभिन्न उपायों के जरिए सरकार ने बीस लाख करोड़ रुपए के पैकेज घोषित किए। लेकिन इन सारे उपायों का असर क्यों नहीं हुआ? सरकार कह रही है कि असर दीर्घकाल में होगा, लेकिन अब तक के अनुभवों से इस बात पर भरोसा कम ही होता है।

साल 2008 की मंदी के दौरान राजकोषीय उपायों के कारण भारत का राजकोषीय घाटा 2.7 फीसद से बढ़ कर छह फीसद तक जरूर पहुंच गया था, लेकिन 2008-09 की जीडीपी दर 6.7 फीसद से नीचे नहीं गई थी और चौथी तिमाही में जीडीपी 5.8 फीसद थी। अलबत्ता 2009-10 के दौरान जीडीपी दर वापस 8.5 फीसद पर लौट आई थी। जबकि आर्थिक मजबूती के लिए उठाए गए नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक सुधार के ऐतिहासिक कदमों और कॉरपोरेट कर कटौती के बावजूद 2019-20 की चौथी तिमाही में जीडीपी दर 3.1 फीसद पर आ गई थी। सवाल है आखिर ऐसा क्यों हुआ? ऐतिहासिक उपायों के बावजूद आर्थिक सेहत सुधरने के बदले बिगड़ती क्यों चली गई?

नवंबर 2016 की नोटबंदी से पहले की तिमाही में जीडीपी दर 7.6 फीसद थी, जो दिसंबर तिमाही में घट कर 6.8 फीसद हो गई और उसके बाद की तिमाही में लुढ़क कर 6.1 फीसद पर पहुंच गई। कई अध्ययनों में कहा गया है कि नोटबंदी के कारण भारत की जीडीपी को दो फीसद का नुकसान हुआ। जीडीपी से बाहर कितना नुकसान हुआ, इसका हिसाब लगा पाना कठिन है। इसी तरह जीएसटी से जीडीपी को एक से तीन फीसद की मजबूती मिलने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन एक जुलाई, 2017 को जीएसटी लागू होने से पहले ही सिर्फ उसके भय से जीडीपी दर तीन साल के निचले स्तर 5.7 फीसद पर पहुंच गई। उसके बाद की तस्वीर सबके सामने है।

आर्थिक पतन के इस दौर में भी कृषि क्षेत्र ने उत्थान की दिशा दिखाई है, जहां 3.4 फीसद की वृद्धि दर सामने आई है। यानी रोशनी की किरण गांवों से आ रही है। फिर इन गांवों को ही विकास का अगुआ क्यों न मान लिया जाए। कृषि को अर्थव्यवस्था का आधार बना कर गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान शुरू किया जा सकता है। देश में कुल साढ़े छह लाख से ज्यादा गांव हैं और इन गांवों में पैंसठ फीसद आबादी निवास करती है। आबादी के इतने बड़े हिस्से के आत्मनिर्भर बन जाने का अर्थ देश का आत्मनिर्भर हो जाना है।

महात्मा गांधी की ग्राम स्वराज की कल्पना में यह बात निहित है। समय के मौजूदा संदर्भ में गांधी के ग्राम स्वराज में थोड़ा संशोधन भी करना होगा, उससे कुछ कदम आगे बढ़ना होगा। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि गांवों की आत्मनिर्भरता की यात्रा में सरकार की भूमिका एक सहयोगी की हो, न कि शासक और प्रशासक की। इसके लिए जहां आम जन को जागरूक करना होगा, वहीं शासक-प्रशासक वर्ग को भीतर से तैयार होना होगा।

बदलाव व सफलता के सवाल का आंशिक जवाब पहली तिमाही के कृषि विकास के आंकड़े से मिल जाता है। जवाब के बाकी हिस्से के लिए प्रायोगिक तौर पर किसी गांव को आजमाया जा सकता है। हालांकि ऐसे उदाहरण पहले से भी मौजूद है। लेकिन नए सिरे से प्रयोग करने में कोई हर्ज नहीं है। यदि परिणाम 70-80 फीसद भी अनुकूल आ जाता है तो उसी दिन देश भर की ग्राम सभाएं एक साथ बैठक कर अप्रासंगिक हो चुकी मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ प्रस्ताव पारित करें और सरकारों को अवगत करा दें।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। में रुचि है तो



सबसे ज्‍यादा पढ़ी गई




Source link

Authors

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here