इतिहासकार बोले-मुस्लिमों से नफरत के कारण म्यूजियम का नाम बदला

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14 सितंबर की देर शाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर लिखा कि आगरा में बनने वाले मुगल म्यूजियम को छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से जाना जाएगा। नए उत्तर प्रदेश में गुलामी की मानसिकता के प्रतीक चिन्हों का कोई स्थान नहीं है। हम सबके नायक शिवाजी महाराज हैं। योगी के इस फैसले के बाद से इतिहासकार और नवाबों के वंशज नाराज है। अवध के नवाब के वंशज इसे गंगा-जमुनी तहजीब पर हमला बता रहे हैं तो इतिहासकार इस फैसले को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने म्यूजियम का नाम बदलकर मुसलमानों के प्रति नफरत का सबूत दिया

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिस्ट्री डिपार्टमेंट के पूर्व चेयरमैन और कोआर्डिनेटर प्रो. नदीम रिजवी कहते हैं कि दुनिया भर में यह चलन है कि यदि कोई ऐतिहासिक स्मारक है और वहां कोई संग्रहालय बनाने की बात होती है तो उस स्मारक के बारे में साथ ही वहां के कल्चर के बारे में जानकारी देने के लिए संग्रहालय बनाया जाता है। दुनिया में इसके कई उदाहरण हैं। लेकिन, आगरा में ताजमहल के पास बनने वाले जिस संग्रहालय का नाम बदला गया, वह सिर्फ सीएम की मुगलों के प्रति, मुसलमानों के प्रति नफरत को दिखाता है। दरअसल, सब राजनीति से प्रेरित है। बिहार में चुनाव है और सरकार के पास जनता को बताने के लिए कुछ नहीं है। यही वजह है कि कुछ ऐसा शिगूफा छोड़ो, जिससे जनता भ्रमित रहे।

मानवेंद्र पुंढीर।

बिठूर से शिवाजी का इतिहास, वहां कुछ क्यों नहीं बनाया? इतिहासकार का सवाल

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिस्ट्री डिपार्टमेंट में प्रोफेसर और आगरा शहर पर रिसर्च करने वाले मानवेंद्र कुमार पुंढीर सरकार के निर्णय के खिलाफ नहीं है, लेकिन मंशा पर जरूर सवाल खड़ा करते हैं। वह कहते हैं कि, हम छत्रपति शिवाजी महाराज का म्यूजियम बनाने पर एतराज नहीं कर रहे हैं। लेकिन अगर उनके नाम पर म्यूजियम बनाना है तो फिर बिठुर में क्यों नहीं? जहां का इतिहास छत्रपति से जुड़ा हुआ है। मैंने खुद आगरा में ऐसी 120 इमारतों को ढूंढा है, जो मुगलों का इतिहास बताती है। लेकिन वह अभी भी एएसआई द्वारा संरक्षित नहीं है। हमें पहले उसे सहेजना चाहिए।

शीरीन मूसवी।

शीरीन मूसवी।

…फिर तो ब्रिटिशर्स की निशानियां भी हटा देनी चाहिए

क्या मुगल गुलामी का प्रतीक हैं? इस सवाल पर मानवेंद्र कहते हैं कि फिर तो ब्रिटिशर्स की भी निशानियां हटा देनी चाहिए। क्या मुगलों से पहले राजपूत राजा अपने से छोटे राज्यों पर आक्रमण नहीं करता था? क्या वह अपने से छोटे राजाओं को गुलाम नहीं बनाता था? हमारा देश विकासशील है। आज जो हो रहा है आने वाला कल उसे कैसे देखेगा यह भविष्य बताएगा।

वहीं, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की इतिहासकार शीरीन मूसवी कहती हैं कि वह हमें नाम बदलने के नाम पर अफीम दे रहे हैं और हम अफीम खा रहे हैं। जो असल मुद्दे हैं, उनसे दूर हो रहे हैं। इतिहास देखे तो बृज टेंपल टाउन मुगलकाल में ही बना है। जिस पर अब राजनीति की जा रही है।

अवध के नवाब भी हैं निराश बोले- यह मुनासिब नहीं है

अवध के नवाबों के वंशज जफर मीर अब्दुल्ला भी इस फैसले से निराश हैं। उन्होंने कहा कि यह सारी कोशिशें गंगा जमुनी तहजीब को मिटाने के लिए की जा रही हैं। ये सत्ता में बैठे लोग ताजमहल को झूठलाएंगे या फिर लालकिला को गायब कर देंगे। ये लोग मनमाना रवैया अपना रहे हैं। इसी मुल्क के रजवाड़े भी तो अपनी हुकूमत का दायरा बढाने के लिए एक दूसरे पर आक्रमण करते थे। गुलाम बनाते थे। उन्होंने कहा कि यह सत्ता तो ऐसी है कि कोई खुलकर अपनी राय दे दे तो उस पर भी शिकंजा कस दिया जाता है। उन्होंने कहा मुगलों को गुलामी का प्रतीक जा रहा है। लेकिन, मुगलों ने ही बंटे हुए हिंदुस्तान को एकजुट किया था। यह लोग साजिश के तहत अपने पसंद के हिसाब से अच्छे को बुरा कह रहे हैं यह गलत है।

नवाब मीर जाफर।

नवाब मीर जाफर।

क्या राजनीति के लिए ऐसा किया गया है?

सीनियर जर्नलिस्ट रतन मणि लाल कहते हैं कि भाजपा का यह पॉलिटिकल नहीं बल्कि सांस्कृतिक एजेंडा है। इन्हें जब मौका मिलता है उसे पूरा करते हैं। इनके हिसाब से हमें अपने कल्चर पर, अपने इतिहास पर गर्व और गौरव होना चाहिए। इसमें बहुत सारे जगहों के नाम बदलना और नए संस्थान स्थापित करना इसमें शामिल है। बिहार में जेडीयू ने अपने एजेंडा में ऐसे मुद्दों को कभी भी फोकस में नहीं रखा। अभी भी बिहार में चुनाव भाजपा नीतीश के लीडरशिप में लड़ रही है। जोकि ऐसी बातों को ज्यादा महत्व नहीं देते हैं। आप देखे यह पूरी तरह से भाजपा का एजेंडा है। वह राष्ट्रवाद की सोच को और भारत की पुरानी सांस्कृतिक विरासत को प्रमुखता से आगे ले जाने का एजेंडा है।

आगरा से शिवाजी महाराज का रिश्ता

इतिहासकार बताते है कि छत्रपति शिवाजी 16 मार्च, 1666 को अपने बड़े पुत्र संभाजी के साथ आगरा आए थे। तब मुगल बादशाह औरंगजेब ने उन्हें कैद कर लिया था। बाद में लगभग 5 महीने बाद 13 अगस्त, 1666 को वे फल की एक टोकरी में बैठकर गायब हो गए। औरंगजेब हाथ मलता रह गया। यही नहीं बताया जाता है फरारी के दौरान शिवाजी आगरा में कई स्थानों पर भी रुके। उन्हीं यादों को संजोने के लिए मुगल म्यूजियम में छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ी जानकारियां भी रखी जाएंगी।

अभी क्या स्थिति है मौके पर

2015 में सेंक्शन हुआ यह प्रोजेक्ट अभी कुछ कदम भी नही बढ़ पाया है। सपा सरकार में कुछ निर्माण शुरू भी हुआ रहा लेकिन योगी सरकार में यह अभी मौके पर बन्द पड़ा हुआ है। जानकारी के मुताबिक वहां जो सीमेंट वगैरह आई थी वह भी किसी काम की नहीं रह गई है।

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