UP Legislative Assembly- वित्तीय घोटालों के मकड़जाल में उलझा विधानसभा सचिवालय !

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UP Legislative Assembly Secretariat embroiled spate financial scandals
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लखनऊ। भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ तक डूबे विधानसभा सचिवालय की विधानमंडल सहकारी समिति घोटालों का गढ़ बन चुकी है। नौकरी कम हो या ज्यादा ,कर्मचारी की पात्रता हो या न हो कोई फर्क नही पड़ता। सारे नियम कानून ताक पर रखकर विधानमंडल सहकारी समिति से लोगों को लोन रेवड़ी की तरह बांटा गया। लोन लेने के लिए पात्रता सिर्फ इतनी होनी चाहिए कि उसका प्रमुख सचिव की गुड़ बुक में शामिल होना अनिवार्य है।

अगर अधिकारी,कर्मचारी रिटायर भी होना वाला है तो भी कोई फर्क नही पड़ता समिति उसे पचास लाख और उससे अधिक का भी लोन दे देगी फिर मर्जी अधिकारी की कि उसे वह वापस करे या न करे। जबकि नियमानुसार विधानमंडल सहकारी समिति से लिया गया लोन कर्मचारी और अधिकारी को अपनी सेवानिवृत्ति से एक वर्ष पूर्व ही चुकता कर देना होता है।

लेकिन विधानमंडल सहकारी समिति में इतने बडे़ पैमाने पर घोटाले हो रहे हैं कि जो अधिकारी कर्मचारी आज की तारीख में रिटायर हो चुके हैं उन पर आज भी लाखों रूपये का लोन बकाया है। जो नियमतःपूरी तरह से गैर कानूनी है। कर्मचारियांे को नियमावली के विरूद्ध ऋण इस तरह बांटा गया कि आज विधानसभा सचिवालय वित्तीय घोटालों के इस मकड़जाल में इस कदर उलझ चुका है कि सरकार की जडे़ हिलाने के लिए काफी है।

विदित हो कि विधानमंडल सहकारी समिति का काम है कि जरूरत पड़ने पर आवश्यकतानुसार विधानसभा सचिवालय के अधिकारियों और कर्मचारियों ऋण मुहैय्या कराना। लेकिन इस ऋण के लिए कुछ नियम और शर्ते निर्धारित की गयी है। जिसके तहत लोन लेने वाला व्यक्ति विधानसभा सचिवालय का कर्मचारी होने के साथ साथ विधानमंडल सहकारी समिति का सदस्य भी होना अनिवार्य है।

यही नही नियमतः लोन लेने वाले कर्मचारी की नौकरी का कम से कम तीन पूर्ण हो चुके हो। लेकिन विधानमंडल सहकारी समिति में इन नियमों का कोई मतलब नही है। सरकारी नियमावली की धज्जियां उड़ाते हुए इस समिति में लोन रेवड़ी की तरह बांटा जा रहा है। इसके पीछे भी एक गहरी साजिश छिपी हुई है।

गौरतलब यह है कि सोसाइटी एक्ट मे यह प्रावधान है कि तीन वर्ष की सेवा पूर्ण होने के बाद ही कर्मचारी विधानसभा सचिवालय की सहकारी समिति का सदस्य हो सकता है। और उसे तभी लोन दिया जा सकता है। नियम 47 के (क) अनुसार चार प्रकार के ऋण दिये जा सकते है। इसकी सीमाएं भी निर्धारित है असीमित धनराशि के श्रण सोसाइटी द्वारा नही दिये जा सकते। नियम 45 के अनुसार अधिकारियों एवं कर्मचारियों को ऋण केवल निर्दिष्ट आवश्कताओं ओर वैध उद्देश्यों के लिए ही स्वीकार किये जा सकते है। उपयोगिता प्रमाणपत्र प्रमाणों के साथ दिया जाना भी अपेक्षित है। लेकिन इस सहकारी समिति में ऐसा कोई प्रमाण नही लिया जाता है।

नियम 47 के पैरा चार में स्पष्ट उल्लेख है कि ऋण की अदायगी की किस्त निश्चित करते समय इस बात का ध्यान रखा जाये कि पूरे ऋण की अदायगी ऋणी अथवा उसके संभावित जमानतदारों संभावित अवकाश ग्रहण करने के पूर्व ही हो जायेगी। लेकिन यहां सैंय्या भये कोतवाल तो डर काहे का वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। स्वयं प्रमुख सचिव सेवानिवृत्त हो चुके है वैशाखी पर चल रहे प्रदीप दुबे की कुर्सी कब छिन जाये पता नही है। इनके द्वारा लिये गये पचास लाख के ऋण की अदायगी कौन और कैसे होगी यह कोई नही जानता ।

यही हाल सुरेश चन्द्र द्विवेदी का है यह भी अगले साल रिटायर हो रहे है और इन पर पचहत्तर लाख छप्पन हजार सात सौ तिरासी का श्रण बकाया है। इनके रिटायर होने में कुछ ही माह शेष है ऐसे में करीब पचहत्तर लाख रूपये की वसूली होना टेढ़ी खीर है। इसी तरह कई लोग ऐसे हैं जिनका रिटायरमेन्ट सामने है और लाखों रूप्ये के लोन की अदायगी बाकी है।

सोसाइटी के नियम 50 में स्पष्ट उल्लेख है कि ऋण लेने वाले कर्मचारियों के दोनों जमानतियों का स्थाई कर्मचारी होना अत्यन्त आवश्यक है। लेकिन ऋण देते समय यह दिशानिर्देश भी बौने दिख रहे है। सचिवालय में प्रतिनियुक्ति पर आये तत्कालीन वित्तनियन्त्रक एवं मुख्य लेखाअधिकारी शंखेश्वर त्रिपाठी भी सात लाख नवासी हजार पांच सौ रूपये ऋण लेने में सफल रहे ।

नियम 6 (2 के अनुसार श्री त्रिपाठी सांसाइटी से ऋण प्राप्त करने की पात्रता नही रखते है। यही नही प्रदीप दुबे के सलाहकार जय प्रकाश बाजपेई को सेवानिवृत्ति के बाद सोसाइटी की बैंक का कोषाध्यक्ष 2016 में बना दिया गया। श्री बाजपेई को श्याह सफेद करने का अच्छा अनुभव हैं नोट बन्दी के दौरान भी करेंसी की जमकर इन्होंने अदला बदली कराई। जबकि आर बी आई के नियमों के अधीन काम करती है।

हैरत तो इस बात की है कि सोसाइटी से कर्मचारियों के मकानों के खरीदने के लिए दिये गये ऋण के बाद मकान की रजिस्टी के मूल पेपर सोसाइटी में बन्धक होने चाहिए। लेकिन यहां आर बी आई के नियमों के विपरीत सिर्फ जमानतदार की जमानत पर ही लाखों रूपये का श्रण आसानी से मिल जाता है। जानकार यह भी बताते है कि कई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों केे मकान श्रण देकर खरीदवाये गये और बाद में स्वहित के चलते इन मकानो को बिकवा दिया गया। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को ब्रिक्रीत मकान के पैसे भी नही मिले ।

कर्मचारियों को धमकाकर एवं गुमराह कर उनसे खाते की ब्लैंक चेकें ले ली गयी और उनके खाते से सारा पैसा छद्म नामों से निकाल लिया गया। इन कर्मचारियों का ऋण आज भी बकाया चल रहा है। सोसाइटी की बैंक में जिस मकान की एवज में ऋण दिया उनका वर्तमान में कोई अस्तित्व नही है। जो आर बी आई के नियमों का खुला उल्लंघन है। सोसाइटी ने जिस प्रापर्टी के सापेक्ष लोन दिया उसकी रजिस्टी के मूल कागजात बैंक में क्यों सुरक्षित नही रखे जाते यह बड़ा सवाल है।

नियम 32 और 4 में यह प्रावधान है कि वह व्यक्ति समिति के संचालन मंडल में बने रहने का पात्र नही है जो आपस में रिश्तेदार हों। जबकि कोषाध्यक्ष जय प्रकाश बाजपेई के भंजे अखिलेश मिश्रा वर्तमान में उपसभापति है। लेकिन यहां हुए करोड़ों को फर्जीवाडे़ पर पर्दा डालने के लिए अपनों को ही बड़े बड़े ओहदों पर बैठाया गया है। ज्ञानदत्त दीक्षित के बाद जय प्रकाश बाजपेई और अब अखिलेश मिश्रा घोटालों की इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे है।

विधानसभा सचिवालय में बड़ी संख्या में तदर्थ रूप से नियुक्त कर्मचारियों को रेवड़ी की तरह ऋण बांटा गया है। जय कुमार पाण्डे को 16 लाख 36 हजार 62 रूपये,प्रवीन कुमार मिश्रा 5 लाख 37 हजार 541 रूपये, प्रवीन कुमार सिंह 9 लाख 82 हजार 141 भूपेन्द्र सिंह 15 लाख 92 हजार 617, बर्खास्त कर्मचारी चन्द्रप्रकाश वर्मा 14 लाख 76 हजार 175 रूपये, अखिलेश मिश्रा 18 लाख 8 हजार 53 रूपये,प्रमोद कुमार द्विवेदी 2 लाख 50 हजार 223 रूपये, अनिल कुमार सिंह 14 लाख 80 हजार 621 रूपये,रिटायर ज्ञानदत्त दीक्षित 36 लाख 96 हजार 151रूपये, और अगले वर्ष रिटायर होने वाले सुरेश चन्द्र द्विवेदी पर 75 लाख 53 हजार 783 रूप्ये, प्रयेश कुमार मिश्रा 98 हजार रूपये, अजय कुमार पाण्डे 90 हजा, विमल कुमार 1 लाख 10 हजार,स्वतंत्र यादव 7 लाख 20 हजार, राजेश कुमार मिश्र 1 लाख 44 हजार रूप्ये,धीरेन्द्र प्रताप 14 लाख रूपये,आशीष कुमार सोनकर 2 लाख 50 हजार रूपये,सुश्री आकृति तिवारी 1 लाख 30 हजार,शशिकान्त यादव 4 लाख 60 हजार रूपये,सुधीर कुमार 7 लाख 40 हजार रूपये,पीयूष कुमार 14 लाख 67 हजार रूपये, सुकेश कुमार शाह वर्तमान में 1 लाख 44 हजार रूपये की देनदारी बताई जा रही है।

यही वजह है कि 2017 में सहायक समीक्षा अधिकारी अंकिता द्विवदेी को 44 लाख रूपये ऋण के रूप में मिल जाता है। इनकी काबिलियत यह है कि यह प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की रिस्तेदार बताई जाती है। जिसके चलते इन्हें सोसाइटी की बैंक ने 44 लाख रूपये की बड़ी धनराशि लोन नियमों को ताक पर रखकर बिना सेवाअवधि पूरी किये ही जारी कर दी।

नियम 69 में उपविधियों के संशोधन की व्यवस्था है। क्योंकि इसके लिए असाधारण सामान्य बैठक में कम से कम दो तिहाई सदस्यों के मत से पारित प्रस्ताव के बाद ही किसी उपविधि में संशोधन किया जा सकता है। लेकिन इस प्रचलित नियमावली के बाद कोई भी संशोधित नियमावली प्रकाशित नही की गयी है। इससे साफ है कि बैंक में न आर बी आई और न ही निबन्धक सहकारी समितियां उत्तर प्रदेश के किसी दिेशा निर्देश का पालन होता है। यही वजह है कि नियम 31(1) में संचालक मंडल के लिए प्रमुख सचिव विधानसभा/ विधान परिषद तीन तीन वर्षो के लिए बारी बारी से समिति के पदेन सभापति होंगे। लेकिन इस पद पर विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे लम्बे समय से सभापति के पद क शोभा बढ़ा रहे है।

किसको दिया जा सकता है लोन

1-सरकारी प्रक्रिया को पूरा करते हुए कर्मचारी की नियुक्ति की गयी हो।

2-नियुक्ति से तीन वर्ष तक की नौकरी पूर्ण कर चुके कर्मचारी को ही लोन दिया जा सकता है।

3-लोंन लेने के लिए विधानमंडल सहकारी समिति का सदस्य होना अनिवार्य है।

4-लेकिन कर्मचारी को विधानमंडल सहकारी समिति का सदस्य नौकरी के तीन वर्ष पूर्ण करने के बाद ही बनाया जा सकता हैं।

5-समिति की सदस्यता कर्मचारी की सेवाएं तीन वर्ष पूर्ण करने के बाद ही दी जा सकती है।

6-ऋण लेने वाले कर्मचारी का विधानसभा सचिवालय और विधानसभा का स्थाई कर्मचारी होना अनिवार्य है।

7-ऋण की अधिकतम सीमा कर्मचारी को मिलने वाले वेतन और सेवा अवधि के आधार पर तय की जाती है। यानि कि कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने से एक वर्ष पूर्व ऋण चुकता हो जाना चाहिए।

करोड़ों का लोन लेकर हो गये रिटायर

रवड़ी की तरह इस सोसाइटी मे बांटे जा रहे लोन में करोड़ों रूपयों का लोन ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों पर है जो रिटायर हो चुके है। और अपनी आगे की जिन्दगी ऐशा-आराम से काट रहे हैं। ऐसे ही कुछ रिटायरी ऋण धारकों से आपका परिचय कराते हैं जिन्होंने विधानमंडल सहकारी समिति से करोड़ों का चूना लगाकर आज घर पर आराम फरमा रहे है।

इन अधिकारयों में अनिल कुमार सिंह की बात करें तो यह कई साल पहले रिटायर हो चुके है और इन करीब चार लाख रूपये आज भी सोसाइटी का बकाया हैं। इसी तरह सुरेश चन्द्र द्विवेदी पर 75 लाख 56 हजार रूपये की बड़ी रकम लोन के रूप में बाकी है। खास बात यह है कि आगामी कुछ ही दिनों में यह भी सेवानिवृत्त होने वाले ह और सहकारी समिति को लाखों रूपयों का चूना लगाने की तैयारी में है।

इन्हीं की तरह सोसाइटी के उपसभापति अखिलेश मिश्रा भी है,और पद का लाभ लेते हुए श्री मिश्रा ने भी लोन ले लिया और अभी भी इन पर लगभग 19 लाख रूपये बकाया है। सुरेश चन्द्र द्विवेदी का रिटायरमेन्ट 8 दिसम्बर 2021 को । प्रमोद कुमार द्विवेदी का रिटायरमेन्ट 9 जुलाई 2020 को। अनिल कुमार सिंह रिटायर हो चुके है, और 18 लाख रूपये का लोन ले रखा है। ये कुछ नाम बानगी भर है। जबकि दर्जनों ऐसे नाम है जिन्होंने लाखों रूपयों का अब तक सोसाइटी को चूना लगाया है।

समिति के पदाधिकारी भी वित्तीय लाभ लेने से नही चूके। कहा जाता है कि समिति के सभापति प्रमुख सचिव प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे ने भी पचास लाख का ऋण ले रखा है। विधानसभा सचिवालय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष लाल रत्नाकर सिंह ने पद का दुरूपयोग कर लाभ लेने की शिकायत कई स्तरों पर कर रखी है। वहीं अपुष्ट सूत्रों की मानें तो श्री दुबे ने बतौर सभापति एक करोड़ रूपये का ऋण समिति से ले रखा है। इस समिति पर भी सभापति का एकाधिकार है।

हैरत तो इस बात की है कि निबन्धक सहकारी समितियां भी इस संगठित भ्रष्टाचार पर आखें बद किये हुए है। पिछले दस वर्षो से शोध अधिकारी बैंकिंग का पद रिक्त है। शोध अधिकारी का पदीय दायित्व इन सहकारी समितियों द्वारा संचालित होने वाली बैंको के वित्तीय मामलों का परीक्षण ,ऋण वितरण व रिकवरी के कार्यो में पारदर्शिता के साथ ही बैंकों में होने वाले घोटालों एवं मनमानी पर नियंत्रण रखना है लेकिन प्रदेश की राजधानी में भी शोध अधिकारी बैंकिंग का पद दस वर्षो से रिक्त है। सहकारी बैंकों में घोटाले पर घोटाले हो रहे है। लेकिन इसके बाद भी न तो विभाग चेत रहा है और न ही सहकारिता मंत्री।

मामलो की जांच कराई जायेगी- संजीव मित्तल

विधानसभा सचिवालय के वित्तीय घोटालों पर वित विभाग भी अंकुश नही लगा पर रहा है। जबकि वित विभाग की कमान तेज तर्रार कहे जाने वाले अपर मुख्य सचिव संजीव मित्तल के हाथों में है। फिर भी विधानसभा सचिवालय के वित्तीय घोटालों पर अंकुश न लग पाना काफी हतप्रभ है। वित विभाग द्वारा विधानसभा सचिवालय के वित्तीय मामलों की देखरेख के लिए तैनात किये गये संयुक्त एवं विशेष सचिव एवं सयुक्त सचिव स्तर के दो अधिकारी वित्तीय निर्णयों एवं भुगतान संबन्धी अभिलेखों का परीक्षण करने के बजाय आंख बंद कर उन पर संस्तुति करना इनकी कार्य शैली में शुमार है। नौ वर्षो से वित विभाग के संयुक्त सचिव अंजू अग्रवाल विधानसभा सचिवालय में तैनात है।

इन्हें विशेष सचिव का दर्जा मिला हुआ है। इन्हें काम न करने की आदत बताई जाती हैं । इनसे जुडे़ अधिकांश कार्य दूसरे संयुक्त सचिव अनुज कुमार पाण्डेय करते है। इन दोनो अधिकारियों ने आज तक एक भी वित्तीय अनियमितता का मामला नही पकड़ा है। जबकि विधानसभा सचिवालय महा घोटालों का गढ़ है। बताते है कि वित विभाग के ये दोनो अधिकारी विधानसभा सचिवालय में सक्रिय काकस के हाथों की कठपुतली बने हुए है। न यह वित्तीय मामले में कोई परामर्श दे रहे है और ही किसी वित्तीय मामले में रोक लगा पा रहे है। न खाता न बही जो बडे साहब कहे वही सही की कार्य पद्धति पर वित विभाग में भी काम हो रहा है।

अंजू अग्रवाल के खिलाफ काम न करने की तमाम शिकायतें है और यही हालत अनुज कुमार पाण्डेय की है। लेकिन वित विभाग के कानों पर जू नही रेंग रहा है। इस सम्बन्ध में जब प्रमुख सचिव वित्त संजीव मित्तल से बात की गयी तो उन्होंने कहा कि मामला संज्ञान में आया है। मामले की जानकारी कर जांच कराई जायेगी।

करोड़ों की परीक्षाओं के परिणाम जीरो

विधानसभा सचिवालय का घोटालों से दिली रिश्ता है। यहां जो भी आया उसने दिल खोल कर सरकारी खजाना लूटा और लूटाया । प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे के कार्यकाल में पिछले सारे रिकार्ड ही नही टूटे,बल्कि घोटालों के नये कीर्तिमान भी स्थापित हुए। सरकारी खजाने से करोड़ों रूपये भर्ती परीक्षा के नाम पर पानी की तरह बहाये गये। और नतीजा सिफर रहा।

श्री दुबे के कार्यकाल में 90 कर्मचारियों की भर्ती के लिए टाटा कन्सल्टंेसी सर्विस लिमिटेड को दिसम्बर 2015 में साढे़ तीन करोड़ रूपये का वर्क आर्डर दिया गया। टी सी एस और विधानसभा सचिवालय के बीच एग्रीमेन्ट भी हुआ। यह एग्रीमेन्ट विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव पी केे दुबे द्वारा हस्ताक्षरित है। टी सी एस को पूरे प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षा आयोजित कराने का जिम्मा सौंपा गया। अनुबन्ध के तहत पचास फीसदी धनराशि टी सी एस को अवमुक्त की गयी।

परीक्षा भी आयोजित हुई। बाद में परीक्षा निरस्त कर दी गयी और टी सी एस को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। अब टी सी एस अपनी बकाया धनराशि को प्राप्त करने के लिए नोटिसे दे रहा है। काली सूची के औचित्य की भी जानकारी चाह रहा है। कम्पनी का कहना है कि वह देश की नामचीन कम्पनी होने के साथ ही अपनी कार्य क्षमता पर लगे काले दाग को साजिस बता रहा है। जानकार बताते है कि टी सी एस ने मुम्बई हाईकोर्ट में विधानसभा सचिवालय के खिलाफ एक रिट दायर कर बकाया धनराशि के ब्याज सहित भुगतान की मांग की है।

यही नही इसी परीक्षा के लिए यू पी टी यू को भी हायर किया गया था और उसे भी 48 लाख रूपये का भुगतान किया गया बाद में यह परीक्षा भी निरस्त कर दी गयी । वर्ष 2011 में यूपीटीयू और वर्ष 2015 में टी सी एस की आन लाइन परीक्षा कराने और लाखों रूपये इन परीक्षाओं पर खर्च परीक्षा परिणाम सिर्फ इस लिए निरस्त कर दिये गये क्येांकि आनलाइन परीक्षा हेोने के कारण प्रमुख सचिव विधानसभा सचिवालय के मनमाफिक कन्डीडेट परीक्षा में सफल नही हो पाये थे। जिसके चलते तीसरी बार यही परीक्षाएं आफ लाइन एक दूसरी एजेंसी अपटेक द्वारा करवाई गयी। यह परीक्षा इतनी सफल हुई कि 90 पदों के लिए होने वाली इस परीक्षा परिणाम में 107 लोग पास हो गये ओर सभी को नियुक्ति भी मिल गयी।

मुख्यमंत्रियों के तैल चित्रों के लिए ब्रान्ड पर बहाये साढे़ सात करोड़

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार जीरो टालरेन्स की बात कर भ्रष्ट अधिकारियों पर डण्डा चलाने का काम कर रहे है। फिर भी मुख्यमंत्री योगी की नाक के तले बैठे भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम लगने का नाम नही ले रही है। महापुरूषों की आयल पेन्टिग्स् बनवाने के नाम पर सरकारी खजाने में रखे जनता के धन की लूट पिछली सरकार के समय जो शुरू हुई वह आज तक बदस्तूर जारी है। विधानसभा के हाल में पूर्व मुख्यमंत्रियों से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री और पूर्व विधानसभा अध्यक्षों की ऑयल पेन्टिग्स् पर करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाने के बाद अब विधान परिषद के हाल में पूर्व विधान परिषद सभापतियों की ऑयल पेन्टिग्स का काम भी शुरू होने वाला है। जिनकी कीमत भी करोड़ों में है।

लेकिन वहां पर पहले से लगी 4 कार्यकारी अध्यक्षों के तैल चित्र वर्तमान में गायब हो गये है। जिनकी जिनकी कीमत करीब बत्तीस लाख रूपये बताई गयी है। यही नही जानकारी के मुताबिक अब पूर्व विधान परिषदां के सभापतियों की पेन्टिग्स् लगने वाली है जिनकी एक पेन्टिग की कीमत करीब आठ लाख रूपये है।

विदित हो कि विधानसभा के हाल में 21 तैल चित्र पूर्व मुख्यमंत्रियों के और कार्यकारी विधानसभा अध्यक्षो सहित 24 विधानसभा अध्यक्षों के तैल चित्रों को बनाने का काम मथुरा की कम्पनी किशन कन्हाई को दिया गया था। इन तैल चित्रों में मुख्यमंत्रियों के तैल चित्रों का साइज 4 ग 7 और एक चित्र की कीमत बत्तीस लाख बीस हजार रूपये अधिकारियों द्वारा बताई गयी जबकि विधानसभा अध्यक्षों के तैल चित्रों का साइज 8 ग 10 फीट और एक चित्र की कीमत लगभग आठ लाख रूपये बताई जाती है। जबकि एक तैल चित्र राष्टपिता महात्मा गांधी का भी है जिसकी कीमत करीब 48 लाख रूपये बताई जाती है।

उत्तर प्रदेश में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों ने सरकारी और जनता के धन की ऐसी लूट मचा रखी है जो शायद ही अन्य राज्य में हो। करोड़ों रूपये सरकार के खजाने से दिन ब दिन गायब होते जा रहे है जैसे मानों गधे के सिर से सींग। बावजूद इसके अधिकारी डकार भी नही आने दे रहे है। इसका उदाहरण पीडब्ल्यूडी द्वारा विधानसभा सचिवालय में लगायी गयी पूर्व एवं वर्तमान मुख्यमंत्रियों की पेंन्टिंगस् है। जिनकी कीमत लाखों में है। हालांकि यह पेन्टिंग्स तो बानगी भर है फिर भी देखना यह होगा कि इन पेन्टिंस् में ऐसा खास क्या है जिसकी वजह से यह पेंटिग्स लाखों की कीमत की है। इन पेन्टिग्स् को लगवाने केे लिए करोड़ों रूपये पानी की तरह बहा दिये गये। इसके लिए जिम्मेदार लोगों का कहना है कि बत्तीस लाख बीस हजार रूपये प्रति पेन्टिग जो खर्च किया गया वह पेन्टिग पर नही किशन-कन्हाई ब्रान्ड पर खर्च किये गये। इससे ऐसा लगता है कि यहां पर कलाकार की कोई कीमत नही,अगर कीमत है तो वह ब्रान्ड की।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा सचिवालय का हाल पूर्व मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक के ऑयल पेंटिंग्स् सजाया गया है। यह पेन्ट्ग्सि वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समय में मथुरा की एक कम्पनी द्वारा बनवाई गयी थी। जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समय में पूर्व मुख्यमंत्रियों के तैल चित्र विधानसभा सचिवालय में लगाने का प्रस्ताव सरकार के सामने प्रस्तुत किया गया था। इस प्रस्ताव के पास होने के बाद इन तैल चित्रों को बनवाने और लगाने की पूरी जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी को दी गयी थी और पीडब्ल्यूडी ने सरकार और जनता की मेहनत की गाढ़ी कमाई का ऐसा सदुपयोग किया कि इसे जांच का विषय ही बना दिया।

विधानसभा सचिवालय के हाल में लगाई गयी इन 21 पेन्टिग्स् को बनाने की जिम्मेदारी पद्वम्श्री अवार्ड से सम्मानित मथुरा की किशन-कन्हाई इन्डियन आर्टिस्ट नाम की कम्पनी को दी गयी। इस कम्पनी के माध्यम से जो वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्रियों के चित्र बनवाये गये उस एक चित्र की कीमत बत्तीस लाख बीस हजार रूपये है। इस तरह से देखा जाये तो विधानसभा सचिवालय के हाल में लगे इन 21 तैल चित्रों की कीमत करीब सात करोड़ आठ लाख चालीस हजार रूपये मथुरा की इस कम्पनी किशन-कन्हाई को सरकारी खजाने से भुगतान किया गया। इन तैल चित्रों में एक चित्र का साइज 4ग7 है और कीमत बत्तीस लाख बीस हजार रूपये है। गौरतलब बात यह है कि एक तैल चित्र की कीमत इतनी ज्यादा है जो कल्पना से भी परे है। जानकारों का कहना है कि एक तैल चित्र की कीमत में ही सारें चित्र बनवाये जा सकते थे। लेकिन अगर ऐसा होता तो सरकारी धन की लूट खसोट कैसे हो पाती।

क्या कहते है पीडब्ल्यूडी के जेई सुरेश कुमार दुबे

पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों के तैल चित्र बनवाने की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी के जेई सुरेश कुमार दुबे को दी गयी थी। इतने महंगे तैल चित्रों के सम्बन्ध में जब सुरेश कुमार दुबे से बात की गयी तो उनका कहना है कि पैसा तैल चित्रों पर नही किशन-कन्हाई ब्रान्ड पर खर्च किया गया। क्यों कि किशन-कन्हाई ऐसा ब्रान्ड है कि जहां पर पिता और पुत्र दोनों को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया है। अब ऐसे ब्रान्ड से काम करायेगे तो महंगा होगा ही। जब श्री दुबे से इसे सरकारी धन का दुरूपयोग कहा गया तो उनका कहना था कि यह तो काफी सस्ते में काम हुआ है। किशन-कन्हाई तो इन्हीं तैल चित्रों के प्रति तैल चित्र एक करोड़ रूपये मांग रहे थे। वह तो उन्होंने सरकार पर एहसान करते हुए एक करोड़ की कीमत वाली पेन्टिग्स मात्र बत्तीस लाख बीस हजार रूपये प्रति पेन्टिंग में ही बना दी। श्री दुबे की माने तो सिर्फ 19 पेन्टिग्स् ही लगी है।

क्या कहते है विधानसभा सचिवालय प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे

इस सम्बन्ध में विधानसभा सचिवालय के कर्ताधर्ता प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे से बात की गयी तो उन्होंने इस मामले से सिरे ही पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कहा कि कौन सा कितना महंगा काम कहां से कराया जा रहा है यह सब वित विभाग की जिम्मेदारी है। जबकि गौरतलब है कि किसी भी काम के लिए प्रस्ताव यही से और प्रमुख सचिव स्तर से जाता है। फिर भी प्रमुख सचिव ने इस मामले में कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया। श्री दुबे ने किसी भी सवाल का जवाब देने से इन्कार करते हुए कहा कि जो भी सवाल पूछना है वह आप लिखित में पूछे। जब कि गौर तलब बात यह है कि दस सवालों को लिखित तौर पर सरकारी डाक द्वारा भेज कर पूछा गया तो उन्होंने आज तक कोई जवाब नही दिया। इससे साफ है कि विधानसभा प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे के पास फस्र्ट आई मैग्जीन द्वारा भ्रष्टाचार पर पूछे जा रहे किसी भी सवाल का जवाब नही है।

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