अगले साल होने वाली जनगणना पर सरकार अपनी योजनाओं की जानेगी जमीनी हकीकत

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अगले साल होने वाली जनगणना एक ऐसा अवसर होगी, जब भारत सरकार अपनी लोक-कल्याणकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत जानने की कोशिश करेगी। सरकारी दावों के अनुसार देश खुले में शौच से मुक्त हो चुका है, सिर पर मैला ढोने की प्रथा खत्म हो चुकी है और देश के हर गांव में बिजली पहुंच चुकी है। ये घोषणाएं वास्तव में कितनी क्रियान्वित हुई हैं, इसकी पड़ताल नई जनगणना में की जाएगी। जनगणना पंजीकरण के अलावा आयुक्त संजय मानते हैं कि ‘भौगोलिक और सामाजिक रूप से अनेक विविधताएं हैं। ऐसे में जनगणना एक ऐसा अवसर है, जिसमें सरकार देश के प्रत्येक नागरिक से सीधे रूबरू होती है। ऐसे में अगर योजनाओं के अमल में कोई विसंगति पेश आती है, तो उन्हें दूर करने के उपाय किए जा सकते हैं।’ वैसे, पंचवर्षीय योजनाएं जनगणना के आधार पर ही बनती हैं। इसलिए जो भी हकीकत सामने आए, उससे निपटने की जरूरत है।

देश की जनता के स्थायी और निंरतर गतिशील पंजीकरण की दृष्टि से अब जरूरी है कि ग्राम पंचायत स्तर पर जनगणना की जवाबदेही सौंपी जाए। गिनती के विकेंद्रीकरण का यह नवाचार जहां दस साला जनगणना की बोझिल परंपरा से मुक्त होगा, वहीं देश के पास प्रतिमाह प्रत्येक पंचायत स्तर से जीवन और मृत्यु की गणना के सटीक और विश्वसनीय आंकड़े मिलते रहेंगे। यह तरकीब अपनाना इसलिए भी जरूरी है कि तेज भागती यांत्रिक और कंप्यूटरीकृत जिदंगी में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक बदलाव के लिए सर्वमान्य जनसंख्या के आकार और संरचना का दस साल तक इतंजार नहीं किया जा सकता। वैसे भी भारतीय समाज में जिस तेजी से लैगिंक, रोजगारमूलक और जीवन स्तर में विषमता बढ़ रही है, उसकी बराबरी के प्रयासों के लिए भी जरूरी है कि हम जनगणना की परांपरा में आमूलचूल परिपर्तन लाएं।

जनसंख्या के आकार, लिंग और आयु के अनुसार उसकी जटिल सरंचना का कुछ ज्ञान न हो, तो आमतौर पर अर्थव्यथा के विकास की कालांतर में प्रगति, आमदनी में वृद्धि, खाद्य पदार्थों और पेयजल की उपलब्धता, आवास, परिवहन, संचार, रोजगर के संसाधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के पर्याप्त उपायों का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है। अनुमान लगाना तब और कठिन होता है, जब देश और दुनिया में जनसंख्या वृद्धि को विस्फोटक स्थिति के रूप में आंका जा रहा हो। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया की जनसंख्या लगभग सात अरब हो चुकी है। 2050 में यह आंकड़़ा दस अरब तक पहुंच सकता है। इस आबादी का पचास प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा महज नौ देशों चीन, भारत, अमेरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नाइजीरिया, कांगो, इथियोपिया और तंजानिया में होगा।

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जितनी तेजी से आबादी उन्नीसवीं सदी में बढ़ी है, उतनी तेजी से पहले कभी नहीं बढ़ी। अठारहवीं सदी के अंत तक दुनिया की जनसंख्या एक अरब के आंकड़े को भी पार नहीं कर पाई थी। इन शताब्दियों में जन्म दर अधिक होने के बावजूद जनसंख्या वृद्धि दर बेहद मंद थी। प्रकृति पर निर्भर गर्भ निरोधकों से दूर और उपचार की आसान और सुलभ पद्धतियों से अनजान स्त्री-पुरुष बच्चे तो खूब पैदा करते थे, लेकिन उनमें से ज्यादातर मर जाया करते थे। बीमारियों की पहचान और उपचार से नियंत्रण के चलते बीसवीं शताब्दी के पहले ही तीन दशकों में यह आबादी दोगुनी होकर करीब पौने दो अरब के आंकड़े को छू गई थी।

भारत की जनसंख्या आजादी के साल 34.2 करोड़ थी। 1947 से 1981 के बीच भारतीय आबादी की दर में ढाई गुना वृद्धि दर्ज की गई और आबादी 68.4 करोड़ हो गई। जनसंख्या वृद्धि दर का आकलन करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में प्रति वर्ष एक करोड़ साठ लाख आबादी बढ़ जाती है। इस दर के अनुसार हमें अपने देश की करीब एक अरब तीस करोड़ लोगों की एक निश्चित जनसंख्या प्रारूप में गिनती करनी है, ताकि व्यक्तियों और संसाधनों के समतुल्य आर्थिक और रोजगारमूलक विकास का खाका खींचा जा सके। जनसंख्या का यह आंकड़ा अज्ञात भविष्य के विकास की कसौटी पर खरा उतरे, उसका मूलाधार वैज्ञानिक तरीके से की गई सटीक जनगणना ही है।

हर दस साल पर होने वाली जनगणना में करीब बीस लाख कर्मचारी जुटते हैं। छह लाख गांवों, पांच हजार कस्बों, सैकड़ों नगरों और दर्जनों महानगरों के रहवासियों के द्वार-द्वार दस्तक देकर जनगणना का कार्य करना कर्मचारियों के लिए जटिल है। ऐसे में गिनती की जल्दबाजी में वे मानव समूह छूट जाते हैं, जो आजीविका के लिए मूल निवास स्थल से पलायन कर जाते हैं। ऐसे लोगों में ज्यादातर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लोग होते हैं।

बीते कुछ सालों में आधुनिक और आर्थिक विकास की अवधारणा के चलते इन्हीं जाति समूहों के करीब चार करोड़ लोग विस्थापन के दायरे में हैं। इनसे रोशन गांव तो बेचिराग हैं, लेकिन इन विस्थापितों का जनगणना के समय स्थायी ठिकाना कहां है, जनगणना करने आए दल को यह पता लगाना मुश्किल होता है।

इसलिए जरूरी है कि जनगणना की प्रक्रिया के वर्तमान स्वरूप को बदला जाए, जिससे गिनती में निरंतरता बनी रहे। इसके लिए न भारी भरकम संस्थागत ढांचे की जरूरत है और न ही सरकारी अमले की। केवल गिनती की केंद्रीकृत जटिल पद्धति को विकेंद्रीकृत करके सरल करना है। गिनती की यह तरकीब ऊपर से शुरू न होकर नीचे से शुरू होगी। देश की सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई ग्राम पंचायत है, जिसका त्रिस्तरीय ढांचा विकास खंड और जिला स्तर तक है। करना सिर्फ इतना होगा कि तीन प्रतियों में एक जनसंख्या पंजी पंचायत कार्यालय में रख दी जाए। इसी पंजी की प्रतिलिपि कंप्यूटर में फीड हो। जिन गांम पंचायतों में बिजली और इंटरनेट की सुविधाएं हैं, वहां इसे जनसंख्या संबंधी वेबसाइट से जोड़ कर इन आंकड़ों का पंजीयन सीधे अखिल भारतीय स्तर पर हो सकता है।

परिवार को इकाई मान कर संरपच, सचिव ओर पटवारी को यह जबावदेही सौंपी जाए कि वे परिवार के प्रत्येक सदस्य की जानकारियां जनसंख्या प्रारूप के अनुसार इन पंजियों में दर्ज करें। चूंकि ग्राम पंचायत स्तर का प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे को बखूबी जानता है, इसलिए इस गिनती में चित्र और नाम के स्तर पर भ्रम की स्थित नहीं होगी, जैसी कि मतदाता सूचियों और मतदाता परिचय-पत्र में हो जाती हैं। गिनती की इस प्रक्रिया से कोई वंचित भी नहीं रहेगा। गांव में किसी शिशु के पैदा होने और किसी भी व्यक्ति की मृत्यु की जानकारी तुरंत पूरे गांव में फैल जाती है, इसलिए इस जानकारी को अविलंब पंजी में दर्ज कर संबंधित व्यक्ति को ज्म और मृत्यु प्रमाण-पत्र देने का आधिकार भी ग्राम पंचायत को दिए जाएं।

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ग्राम पंचायत स्तर पर एकत्रित होने वाली यह जानकारी हर माह की एक निश्चित तारीख को विकास खंड स्तर पर पहुंचाई और उसकी एक प्रति विकास खंड कार्यालय में रखी जाए। इसे आधार बना कर इसका तत्काल कंप्यूटरीकरण किया जाए। जिले के सभी विकास खंडों की यह जानकारी जिला स्तर पर एकीकृत कर इस गिनती को कंप्यूटर में फीड किया जाए। इस तरह सभी विकास खंडों के आंकड़ों की गणना कर जिले की जनगणना प्रत्येक माह होती रहेगी।

जिलावार गणना के डाटा को प्रदेश स्तर पर सांख्यिकीय कार्यालय में इकट्ठा कर प्रदेश की जनगणना का आंकड़ा भी प्रत्येक माह सामने आता रहेगा। प्रदेशवार जनसंख्या के आंकड़ों को देश की राजधानी में जनसंख्या कार्यालय में संग्रहीत कर प्रत्येक माह देश की जनगणना का वैज्ञानिक और प्रामाणिक आंकड़ा मिलता रहेगा। देश के नगर और महानगर वार्डों में विभक्त हैं। वहां वार्डवार जनगणना के लिए गिनती की उपरोक्त प्रणाली ही अपनाई जाए। इस गिनती में जितनी पारदर्शिता और शुद्धता रहेगी उतनी किसी अन्य पद्धति से संभव नहीं है।

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