भोजपुरी सिनेमा में खलनायक – ना खेलब ना खेले देब, खेलवे बिगाड़ देब

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भोजपुरी डेस्क। ना खेलब ना खेले देब, खेलवे बिगाड़ देब .सिनेमा में खलनायक के इहे काम होला नू. दरअसल खलनायक से हीं नायक के अस्तित्व बा. जब ले अन्हार ना होई, अंजोर के कीमत ना बुझाई. रावण के बिना राम के श्रीराम बनल मुश्किल रहे. नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि भी लिखले बानीं कि व्यवस्थित वेशधारी प्रतिनायक भा खलनायक नाटक के मध्य पात्र ह जे नायक के स्थापित करे आ प्रसंग के आगे बढ़ावे में विदूषक भा कॉमेडियन के जइसन सहायता करे ला. दुनिया के कवनो भाषा भा बोली के नाटक होखे, उहे नाटक सबसे बेसी सफल चाहे यादगार भइल बा, जेकरा में खलनायक के भूमिका भी ओतने दमदार रहल बा जेतना नायक के. अगर हिंदी सिनेमा के बात कइल जाय त कई गो फिलिम में अइसन डायलाग चाहे खलनायकन के करेजा कंपकपा देवे वाला एक्टिंग बा जेकरा कारण कई दशक बीतला के बादो ऊ सब फिलिमन के याद कइल जाला.

90 के दशक के फिलिम प्रेमी से पूछ लिंही कि तहलका फिलिम याद बा त ऊ शायद सोच-विचार में पड़ जाई कि कवन तहलका बाकिर अगर ओही घरी एगो डायलाग सुना दिहीं ‘डॉन्ग कभी रॉन्ग नहीं होता’ त तुरंते सब याद आ जाई. धर्मेंद्र, शम्मी कपूर, नसीरुद्दीन शाह, आदित्य पांचोली जइसन बड़-बड़ हीरो लोग से सजल ई फिल्म अपना खलनायक अमरीश पुरी के डेरावे वाला भेष-भूसा आ डायलाग खातिर आजो याद राखल जाला. मिस्टर इंडिया के मोगैंबो खुश हुआ केकरा ना याद होखी. तेजाब फिल्म के हीरो से जादे जलवा ओकर खलनायक मोगैंबों के रहे. सिनेमा देख के निकले वाला लोग मोगैंबों के चर्चा करत निकलल रहे. गब्बर सिंह शोले फिल्म के करीब तीन दशक बादो ओसहीं याद बाड़न जइसे उनकर डायलाग कितने आदमी थे.

भोजपुरी सिनेमा के भी उमिर कम नइखे

हिंदी सिनेमा सौ साल से ऊपर के हो गइल बा त भोजपुरियो सिनेमा लगभग 60 साल के हो गइल बा. भोजपुरी सिनेमा में हीरो के रोल त एह स्तर के गढ़ल गइल जे दशकन बीतलो पर याद रहे बाकिर खलनायकन के चरित्र में ओह स्तर के प्रयोग ना भइल जइसन कि हिंदी सिनेमा में देखे के मिलल.

एकर कारण शायद कुछ सामाजिको हो सकेला. सिनेमा अपना समाजे के नू प्रतिनिधित्व करेला. ओकरे नू प्रतिबिम्ब ह. शुरूआती भोजपुरी सिनेमा के कहानी गंवई वातावरण में बेसी गढ़ल गइल बा जहां लोग के बीच परमानेंट खलनायक जइसन बात चाहे भावना जादे ना रहेला. गांव-घर या गोतिया-नाता से बेसी मुंह-फुलाई चाहे जरनियाही जइसन बात रहेला. ई आपसी मनमुटाव तक त रहेला बाकिर बहुत सा अइसन परब-त्योहार चाहे शादी-बियाह के मोका बा जवना में ई गोतिया देयाद के भी साथे लेवे के पड़ेला. कुल देवता के पूजा चाहे परिवार के कवनो आदमी के किरिया करम होखे, लाख जरनियाही के बादो सब गोतिया लोग के साथे आवे के होखेला त गंवई माहौल या आपसी फूट के बहुत बड़ा स्तर पर देखावे के कम गुंजाइश के कारणे शायद भोजपुरी में मौगैंबो, गब्बर सिंह डॉन्ग के स्तर के ना गढ़ाइल होखी. भोजपुरी सिनेमा में शुरु में विलेन अमूमन ठाकुर, दबंग अउर डाकू होत रहल. देखल जाय त हिंदी फिलिमन के शुरुआती दौर के खलपात्र भी एही तरह के होत रहले. धीरे-धीरे ओकरा में नया-नया रंग आइल आ ऊ मोगैंबों, डॉन्ग, लॉयन चाहे डॉर डैंग के ओरे कूच कइल. त भोजपुरी सिनेमा धीरे-धीरे हिंदी के बेसी लगे आवत गइल त खल चरित्र पर भी काम होखे शुरू भइल. खल चरित्रन के भेस-भूषा से लेके, उनकर रुआब, संवाद सब पर काम होखे शुरू भइल. भोजपुरी भाषा में जतना मिठास बा ओतने कड़क एकर मिजाजो ह त जब खल चरित्रन पर प्रयोग भइल त उहो जबरदस्त हिट रहल. भोजपुरिया विलेन में भी विविधता आवे लागल.

कुछ डायलॉग चलले सब

‘जिंदगी झंड बा, फिर भी घमंड बा’ भोजपुरी के ई हिट डायलाग त हिंदी सिनेमा से लेके टीवी चैनलन पर आ कॉमेडी शो में भी केतना बेर इस्तेमाल भइल होखी कवनो ठेकाना नइखे. ई भोजपुरी के गर्व, ओकरा अक्खड़पन आ ओकर फकीरी मिजाज तीनों के बड़ सुघर संजोग ह. ओसहीं ‘ना खेलब ना खेले देब, खेलवे बिगाड़ देब’ होखे चाहे ‘फटी त फटी लेकिन पावर ना घटी’ जइसन डायलॉग के साथे देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर वाला बात बा. ‘अपना जबान के लंबाई से हमरा करेजा के चौड़ाई के नाप मत लीहे, ना त खानदान के लास उठावत-उठावत जिनगी बीत जाई’ खतरनाक गेट अप, लाल-आंख चढ़ाके जब भोजपुरिया फिलिमन के खलनायक भी दमदार डायलॉग बोलेले त फिलिम के स्तर ऊपर उठ जाला. ई बात कहे में कवनो संकोच ना होखे के चाहीं कि भोजपुरी सिनेमा में विलेन पर ओतना काम नइखे भइल जतना होखे के चाहत रहे बाकिर जतना भइल बा, उहो कम दमदार नइखे.

पुरनका विलेन

बात अगर पुरनका दौर के विलेन के कइल जाव त पहिले के भोजपुरी फिल्म 1962 के ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ईबो’ के विलेन रहलन रामायण तिवारी जे बाद में कई गो बड़ भोजपुरी फिलिम प्रोड्यूस भी कइलें. दूसर फिलिम ‘लागी नाही छूटे राम’ में भी रामायण तिवारी ही खलनायक रहलें. उनके बाद कुंदन अइलें जे बिदेसिया, बलम परदेसिया जइसन फिलिम कइलें. हरी शुक्ला आपन पहिल फिलिम‘ गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ईबो ’में कॉमेडी रोल कइलें रहलें. बाद में उ कॉमेडियन के साथे साथ विलेन भी बने लगलें. उनकरे जइसन कन्हैया लाल भी शुरुआती फिल्मन में कबो कॉमेडियन त कबो मुनीम या कवनों खलपात्र करत रहलें. राम सिंह खलनायकी में आपन एगो अलगे पहचान बनवलें, उ सुजीत कुमार के दूगो हिट फिलिम‘ दंगल’ अउर ‘माई के लाल’ में दमदार खलनायक के रोल निभा के दर्शकन पर आपन असर छोड़लें. बाद में उ कइगो सफल फिल्मन में खलनायकी कइलें. ब्रजकिशोर के पुरान भोजपुरी फिल्मन में खलपात्र निभावत देखल जा सकेला. उ कुणाल सिंह के कई गो फिल्मन में नकारात्मक भूमिका निभवले बाड़े.  विजय खरे पुरान भोजपुरी फिल्मन के बड़ विलेन में पहला पंक्ति में आवेलें.  उ आपन करियर के शुरुआत साल 1983 के हिट फिलिम‘गंगा किनारे मोरा गाँव से’कइलें. पुरान दौर के खलनायकन में गिरीश शर्मा आ उदय श्रीवास्तव के काम भी उल्लेखनीय बा

महिला खलनायकन में भी स्थिति जन्य किरदार ही बनत रहल. तब लीला मिश्रा, शुभा खोटे आदि कलाकार भोजपुरी मे बतौर खलनायिका काम करत रहली जे हिंदी फिल्म में भी काफी सक्रिय रहली. तब आज के जइसन भोजपुरी एगो अलग इंडस्ट्री के रूप में व्यवस्थित ना भइल रहे, कलाकार से लेके टेक्नीशियन तक हिंदी, मराठी अउर साउथ के फिल्मन से ही आवत रहले. शुभा खोटे के कुछ बड़ भोजपुरी फिलिम में सुजीत कुमार के ‘दंगल’ अउर भारत कपूर के ‘गंगा के तीरे तीरे’बा. उनकरा पर ‘दंगल’ में फिल्मावल गइल एगो गाना काफी मशहूर बा.

नायक कुणाल सिंह बतावेलें कि पुरान समय के विलेन आज के जइसन माफिया, आतंकवादी, गुंडा, अंडरवर्ल्ड डॉन कम जबकि लाला, ठाकुर, सामाजिक समस्या के वजह से बनस. विलेन, बेटी के गैर-जातीय विवाह के विरोध करे वाला अड़ियल पिता जादा होत रहले. हालाँकि उहो एकरा पीछे समाजके तत्कालीन बनावट के प्रेरणा स्रोतबतावेलन. जबकि अब भोजपुरी फिलिम गांव से निकलके शहर में आके समाज के दायरा बढ़वले बा. डिजिटल ज़माना में लोग भारत में बइठल पूरा विश्व के ब्यौरा लेत रहता एही से सिनेमा में हीरो आ विलेन के चरित्र निर्माण में अंतर आवता. कुछ बुनियादी समस्या जइसे महिला पर होत ज़ुल्म, भ्रूण हत्या, जातीय असमानता समाज में आज भी बा, जेकरा से फिल्मन के खलपात्र भी ओइसने गढ़ल जात बाड़ें. आज के विलेन माने एंटी हीरोज पहचान के मुहताज नइखन. एह दौर के कुछ स्थापित आ लोकप्रिय विलेन में सुशील सिंह, अवधेश मिश्रा आ संजय पाण्डेय के नाम लिहल जा सकेला. अनूप अरोड़ा, मनोज टाइगर आ विपिन सिंह के भी कई गो शेड्स बा. एकरा बाद आयाज़ खान, समर्थ चतुर्वेदी, देव सिंह, उमेश सिंह, विष्णु शंकर बेलू , बालेश्वर सिंह, राज प्रेमी, प्रेम दुबे, करण पाण्डेय, अमित शुक्ला आ महिला विलेन में नीलिमा सिंह चर्चित नाम बा.

ब्रजेश त्रिपाठी

आज विलेन पर एतना बात हम एह से कह गइनी ह कि आज भोजपुरी सिनेमा के एगो दमदार विलेन के जन्मदिन ह. एगो अइसन विलेन, अइसन कलाकार जे भोजपुरी सिनेमा के पुरनका आ नवका दुनो दौर में सक्रीय रहल बाड़न. उनकर नाम ह ब्रजेश त्रिपाठी. साल 1983 में आपन करियर के शुरुआत करे वाला ब्रजेश त्रिपाठी भोजपुरी के साथे हिंदी में भी बहुते काम कइलें बाड़े। आपन लम्बा कद काठी अउर चौड़ा डील-डौल के वजह से उनका के हमेशा दमदार किरदार ही ऑफर होत रहल बा. उ मशहूर भोजपुरी हीरो राकेश पाण्डेय के फिलिम‘ बंसुरिया बाजे गंगा तीर’ फिलिम से आपन सफ़र के शुरुआत कइलें रहले. ओकरा बाद उ फिलिम ‘गंगा की बेटी’ में महाभारत सिरियल के द्रोणाचार्य सुरेंदर पाल के विरुद्ध खलपात्र निभवले. ‘पिया टूटे ना पिरितिया के डोर’, ‘बटोहिया’, ‘हो जाये द नैना चार’, ‘पतोह-बिटिया’ उनकर 80 आ 90 के दशक के उल्लेखनीय फिलिम हवे. आधुनिक दौर में पंडित जी बताई ना बियाह कब होई’, ‘राम-बलराम’, ‘देवा’, ‘उठाई ले घुंघटा चाँद देख ले’ उनके कुछ बेहतरीन किरदार वाला फिलिम ह. बकौल ब्रजेश त्रिपाठी अब भोजपुरी सिनेमा के कैनवास बड़ हो गइल बा अउर उ बड़ बजट में भी बने लागल बा. एगो ज़माना रहल जब साल में 1-2 फिलिम बनत रहल, अब समूचे भारत भर में भोजपुरी के हर रोज़ कम से कम 15 गो फिलिम के शूटिंग होता. कोरोना के असर भोजपुरियो इंडस्ट्री पर पडल बाकिर फेर सुगबुगाहट भइल बा.

न्यूज-18 से साभार…

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