वाह बजट आह बजट…

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लेखक- नितेन्द्र वर्मा

एकदम जबर्दस्त। सुपर से भी ऊपर। कल्पनाओं के परे। सदियों में घटती हैं ऐसी दुर्लभ घटनाएं। कुछ तो ख़ुशी के मारे चक्कर खाके गिर पड़े। कुछ की आँखों से ख़ुशी के आँसू अब तक टपक रहे हैं। अनिल कपूर जी इसी को तो झक्कास कहते हैं।

ऐसा बजट भी कोई पेश करता है भला। अच्छे भले लोगों को रुला दिया। भला इतनी ख़ुशी सँभाल के कहाँ रखेंगे लोग। सत्तर सालों से अच्छा खासा चला आ रहा था। अब आदमी परेशान घूम रहा है। बाजार में भारी भीड़ उमड़ी पड़ी है। रेलमपेल मची है। कोई बक्सा खरीद रहा है तो कोई सन्दूक। जिनके हिस्से ज्यादा खुशियाँ आ गई हैं वो बक्से के स्पेशल आर्डर दे दिए हैं।

मिडल क्लास वाला थोड़ा नाराज दिख रहा है। कह रहा है हमको तो कुछ मिला ही नहीं। असल में बात ये है कि ये जो मिडल वाला है ये निम्न वर्ग और उच्च वर्ग के बीच की दीवार है। अब जब तक ये दीवार रहेगी तब तक निम्न और उच्च के बीच एका और भाईचारा नहीं पैदा हो सकता। यही मिडल वाला दोनों में द्वेष, ईर्ष्या, मतभेद, कलह पैदा करा रहा है। इतिहास गवाह है कि दो लोगों के बीच में तीसरा ही दरार डालता आया है। यही दरार सदियों से निम्न को उच्च से मिलाने से रोकती रही है। अब समय आ गया है इस बीच की दीवार को नेस्तनाबूत कर देने का। हमारी ताई को घर परिवार की खूब समझ है। अच्छे से जानती हैं। तभी तो इस बजट में मिडिल क्लास को सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

नौकरी पेशा कह रहा है कि टैक्स में छूट नहीं बढ़ाई। तो भैया नौकरी वालों शुक्र मनाओ कि टैक्स कट रहा है क्योंकि जब नौकरी ही नहीं रहेगी तो टैक्स काहे का कटेगा। ये काहे नहीं सोचते तो कि टैक्स में छूट बढ़ाई नहीं तो घटाई भी कहाँ। वरना तो सरकार कटौती के पूरे मूड में थी। लेकिन ताई जी बहुत दयालु हैं। बोलीं खबरदार जो टैक्स में छूट बढ़ाई तो।

सरकारी नौकरी वालों को तो चिंता करने की कोई जरूरत ही नहीं रही। सब इंतजाम कर लिया गया है। कोई नहीं बचेगा। बताया है कि दो सरकारी बैंकों और एक सरकारी इंश्योरेन्स कम्पनी को बेच देंगे। अच्छा ये बजट एक और मामले में ऐतिहासिक है। ये अब्बास मस्तान की फिल्मों की तरह मिस्ट्री बजट है। सस्पेंस का पूरा ध्यान रखा गया है। इसी वजह से आज भी लोग बजट की चर्चा कर रहे हैं। कौन दो??? ये सवाल ‘कटप्पा को किसने मारा’ से ज्यादा पूछा जा रहा है। लेकिन ताई जी ने कोई कच्ची गोलियाँ थोड़े खेली हैं। नहीं बताएंगी जाओ।

लगता है घर में जो है सब बेच देंगे फिर जनता खाली कनस्तर बजाएगी। जनता को अभी से खासी तैयारी करने की जरूरत है। जनता एकदम मुस्तैद रहे। सीट बेल्ट बाँध ले। क्योंकि सब कुछ बिकने के बाद निजी हाथों में जाते ही चहुँओर विकास ही विकास होगा। विकास चलेगा, विकास दौड़ेगा, विकास भागेगा, विकास उड़ेगा। जनता को उसके साथ कदमताल करने के लिए अभी से अभ्यास शुरू करना होगा वर्ना दौड़ में विकास से पीछे छूट गए तो सरकार को दोष मत देना।

जल्द ही सार्वजनिक यातायात में घोर समस्याएं पैदा होने वाली हैं। कबाड़ नीति तो कुछ यही बात कह रही है। यहाँ अपने उत्तर प्रदेश में सड़कों के गड्ढों को हँसते मुस्कुराते पूरी शालीनता और अद्भुत धैर्य के साथ बखूबी झेलने वाली हमारी रोडवेज़ बसों का बजट के बाद से रो रोके बुरा हाल हुआ जा रहा है। सब एक दूसरे को दिलासा देने में भले जुटी हों लेकिन उन्हें मालूम है कि अंत समय निकट है। क्या है कि ये सब अपनी आयु बहुत पहले पार कर चुकी हैं अब तो जबर्दस्ती उनका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है। वरना बिना इंडिकेटर, बिना बैक लाइट, यहां तक कि ईंटों के ढेर से सधी ड्राइवर सीट लिए, काला धुआँ छोड़ते हुए भला कौन इतने साल चलता है। जनता को इनके योगदान को कभी भुलाना नहीं चाहिए। इतनी विपरीत परिस्थियों में भी लगातार बिना शिकायत कर्म करते रहना कमियों का रोना रोते रहने वाले मानव के लिए किसी सीख से कम नहीं। अफ़सोस अब हम ये न देख पाएंगे।

पेट्रोल डीजल की चिंता जनता न करे। वह सस्ता नहीं होगा इसका इंतजाम कर दिया गया है। हालांकि जैसे ही सेस लगाने की बात आई तो निर्भया वाला सेस खड़ा हो गया। बोला जब इस्तेमाल नहीं करना है तो लगाते काहे हो। जीएसटी लगाने को बेचारे राज्य तैयार ही नहीं हो रहे लेकिन सेस के लिए फौरन हामी भर दिए। हमारी ताई जी तो बहुत कुछ करना चाहती हैं। उनका बस चले तो बिजलेरी के दाम में पेट्रोल डीजल मिले लेकिन यहाँ राज्य अमरीश पुरी वाला काम कर रहे हैं।

किसानों की आय दिन प्रतिदिन दुगनी हो ही रही है। किसान तो इतना खुश है कि ख़ुशी के मारे खेती बाड़ी छोड़ के आजकल सड़कों पे बैठा है। कह रहा है कि हम बो तो फसल रहे हैं लेकिन पैदावार पैसे की हो रही है। ज्यादा अच्छी फसल हुई तो दो दो हजार के नहीं तो पांच पांच सौ के नोट तो लग ही रहे हैं। अब समस्या ये है कि उसके पास नोटों को रखने की जगह नहीं बची है। बैंकें भी हाथ खड़ी कर चुकी हैं। ऐसे में किसान कुछ दिन सड़कों पर ही बिताने के मूड में है।

कागज उल्टा मुँह फुलाये बैठा है। ‘वफ़ा न रास आयी’ जबसे बजट पेश हुआ है बस यही गाना लगा के रोये जा रहा है। कह रहा है कि ये बजट जमीन से जुड़ा नहीं है। वैसे तो डॉक्टरों का भी कहना है कि मोबाइल या टैबलेट का ज्यादा इस्तेमाल आँखों और मानसिक स्वास्थ्य के लिए कतई ठीक नहीं। अब बताइये घण्टे भर तक मोबाइल में घुसके कौन पढ़ेगा बजट। सबके पास तो दो दो फीट वाले टैबलेट हैं नहीं। अब तक न जाने कितनों की आँखें और दिमाग प्रभावित भी हो चुके होंगे।

कुल मिलाकर इस बार का बजट ऐतिहासिक रहा है। हर वर्ग ख़ुशी के मारे फूल के कुप्पा हुआ जा रहा है। लोग अब तक सपना चौधरी के गाने लगा लगाके झूम रहे हैं। जनता तो ये भी कह रही है कि सरकार चाहे तो अगले दो तीन साल बजट न भी लाये तो भी इसी से काम चल जायेगा। जो भी हो फ़िलहाल तो ये कुछ के लिए वाह बजट तो कुछ के लिए आह बजट ही है।

लेखक नितेन्द्र वर्मा

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