IND vs ENG: चौथे टी20 के बाद गहराया सॉफ्ट सिग्नल विवाद, अब ICC को उठाऩे होंगे कड़े कदम

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IND vs ENG Soft signal controversy deepens after fourth T20, ICC will have to take tough steps now
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स्पोर्ट्स डेस्क. भारत और इंग्लैंड के बीच चौथे टी20 (India vs England T20I Series) के बाद ‘सॉफ्ट सिग्नल’ (Soft Signal Controversy) के मामले में विवाद गहरा गया है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) का अब इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने का समय आ गया है. दरअसल चौथे टी20 में भारतीय बल्लेबाज सूर्यकुमार यादव (Suryakumar Yadav) जिस विवादास्पद तरीके से आउट हुए, उसने ये साबित कर दिया है कि सॉफ्ट सिग्नल न सिर्फ गलत दिख रहा है. बल्कि भविष्य में इसके परिमाण गंभीर हो सकते हैं.

बता दें कि सूर्यकुमार यादव ने चौथे टी20 में इंग्लैंड के तेज गेंदबाज सैम कुरेन(Sam Curran) की गेंद पर पैडल स्वीप खेला था. गेंद डीप फाइन लेग पर खड़े डेविड मलान(Dawid Malan) की तरफ गई. मलान ने सामने डाइव करते हुए कैच पकड़ लिया. हालांकि, कैच साफ तरीके से पकड़ा गया या नहीं, इसे लेकर शंका थी. इसलिए फील्ड अंपायर ने थर्ड अंपायर की मदद मांगी. लेकिन उन्होंने इससे पहले आउट का सॉफ्ट सिग्नल दिया. टीवी रीप्ले में भी ये नहीं पता चला कि मलान ने सफाई से कैच लिया है या नहीं. लेकिन नियमों की वजह से सूर्यकुमार को 57 रन बनाकर पवेलियन लौटना पड़ा. जबकि उन्होंने रोहित शर्मा, केएल राहुल और विराट कोहली के जल्दी आउट होने के बाद भारतीय पारी को संभालने का काम किया था.

थर्ड अंपायर भी सूर्यकुमार यादव के कैच को लेकर आश्वस्त नहीं थे

सूर्यकुमार यादव को इस तरह से आउट दिए जाने के बाद अंपायर के सॉफ्ट सिग्नल पर सवाल खड़े होने लगे, क्योंकि मलान के इस कैच का रीप्ले टीवी पर कई बार दिखाया गया. मैदान पर खड़े अंपायर और खिलाड़ियों के साथ ही टीवी पर मैच देख रहे दर्शकों ने भी इस कैच को सांसें थामकर देखा. अंपायर ने कैमरे के हर एंगल से ये जांचने की भी कोशिश की थी कि कैच सही ढंग से पकड़ा गया है या नहीं. इसमें काफी वक्त लगा. इससे ये साफ होता है कि अंपायर के लिए फैसला करना आसान नहीं था. टेक्नोलॉजी के आने के बाद खेल में नया आयाम जुड़ा है. इससे फैंस का खेल देखने का अनुभव बेहतर हुआ है. ऐसे में अगर एक कैच को जांचने के लिए थोड़ा वक्त लग भी जाए तो ये देरी सार्थक है. संदेह होने के बाद भी थर्ड अंपायर के पास कोई विकल्प ही नहीं

हालांकि एक खास कैमरा एंगल से ये नजर आ रहा था कि गेंद शायद जमीन से टकरा गई थी और मलान की उंगलियां पूरी तरह गेंद के नीचे नहीं थी. इससे कैच की वैधता पर संदेह पैदा हुआ. लेकिन बार-बार रीप्ले देखने के बाद थर्ड अंपायर वीरेंद्र शर्मा ने भी ऑन-फील्ड अंपायर के फैसले के साथ जाना तय किया. क्योंकि उनके पास गेंद के जमीन से टकराने के पक्के सबूत नहीं थे. इसी वजह से कई सवाल खड़े हो रहे हैं. पहला ये कि परंपरागत रूप से अगर आउट होने को लेकर किसी तरह का संदेह होता है तो उसका फायदा बल्लेबाज को ही मिलता आया है. लेकिन इस मामले में बल्लेबाज को संदेह का लाभ नहीं मिला. जो सीधे-सीधे क्रिकेट की परंपराओं का उल्लंघन है.

वास्तव में बल्लेबाज की जगह इस बार ऑन-फील्ड अंपायर को ये लाभ मिल गया. वो भी तब जब थर्ड अंपायर इस बात को लेकर पक्का नहीं था कि कैच सफाई से पकड़ा गया है या नहीं. ऑन फील्ड अंपायर ने ‘सॉफ्ट सिग्नल’ दिखाते हुए बल्लेबाज को आउट करार दिया था. ऐसे में आईसीसी के नियमों के तहत थर्ड अंपायर के पास भी मैदानी अंपायर के फैसले के साथ जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, लेकिन अब सवाल ये खड़ा होता है कि अगर ऑन-फील्ड अंपायर ने सॉफ्ट सिग्नल दिखाने में कोई गलती की तो उसका क्या?

टेक्नोलॉजी के कारण अंपायरों पर बेहतर प्रदर्शन का दबाव बढ़ा

सूर्यकुमार यादव के मामले में ही देखें तो ऑनफील्ड अंपायर फील्डर से कम से कम 60-65 गज की दूरी पर था. ऐसे में बिल्कुल सटीक विजन होने के बाद भी ये असंभव है कि अंपायर ये देख पाया हो कि मलान के कैच लेते वक्त गेंद का कुछ हिस्सा जमीन से टकरा गया था. ऐसी परिस्थिति में क्या ऑन-फील्ड अंपायर को किसी भी तरह का हार्ड या सॉफ्ट डिसीजन लेना चाहिए? इस पूरे एपिसोड का तीसरा पहलू जो बाकी दो से किसी भी सूरत में कम प्रासंगिक नहीं है. वो ये है कि आजकल के दौर में ऑन-फील्ड अंपायर पर इतनी जिम्मेदारी बढ़ गई है कि उसे सॉफ्ट सिग्नल दिखाना पड़ता है. वो भी उस सूरत में जब वो ये फैसला लेने की स्थिति में भी नहीं होता है कि बल्लेबाज को आउट देना सही है या नहीं.
टेक्नोलॉजी के इस दौर में दिलचस्प बात ये है कि ज्यादातर अंपायर प्रतिस्पर्धा के कारण सॉफ्ट सिग्नल के पक्ष में हैं. क्योंकि ये उन्हें फैसला लेने की पूरी प्रक्रिया में शामिल रखता है और खेल में मानवीय पहलू जुड़ा रहता है. तकनीक ने भले ही पारदर्शिता के साथ ही खेल को खिलाड़ियों के लिए और बेहतर बनाया है. लेकिन इसकी वजह से अंपायरों पर दबाव बढ़ गया है और वो ये दिखाना चाहते हैं कि वो किसी से कमजोर नहीं हैं.ऐसे में कई बार तो अंपायरिंग का स्तर अच्छा रहता है, लेकिन कई बार अंपायरों के रोल पर सवाल खड़े हो जाते हैं.

टीवी रीप्ले भी पूरी तरह ठीक नहीं

एक बड़ी समस्या यह है कि टीवी रिप्ले को थ्री डी की जगह 2Dमें देखा जाता है. इसलिए टीवी अंपायर के लिए भी यह पूरी तरह फूलप्रूफ नहीं हो सकता है. लेकिन यहां मुद्दे का निचोड़ यही है कि अगर गलती का दायरा बड़ा होता है तो ये इसका उल्टा असर हो सकता है. ऐसे में फील्ड अंपायर ही इस गड़बड़ी का सारा बोझ क्यों खुद उठाए. भारतीय कप्तान विराट कोहली भी इस बात को कर चुके हैं. उन्होंने चौथे टी20 के बाद कहा था कि ऑन-फील्ड अंपायर के पास इस मामले से निपटने के लिए ‘मुझे नहीं पता’ का भी विकल्प होना चाहिए और जब तक इसे लेकर कोई बेहतर टेक्नोलॉजी नहीं आ जाती, तब तक थर्ड अंपायर रीप्ले के आधार पर ही ऐसे फैसले करे. इस फैसले का भारत-इंग्लैंड टी20 मैच के नतीजे पर असर नहीं पड़ा. ऐसे में अब आईसीसी के जागने का समय आ गया है. क्योंकि टी20 वर्ल्ड कप में अगर ऐसा कुछ होता और टीम को इसकी वजह से हारना पड़ता तो इस का क्रिकेट पर बहुत गहरा असर पड़ता.

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