कंपनियां आकर्षित करके लाखों खर्च करवाती हैं,बर्बाद हो रही जिंदगी

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फर्स्ट आई न्यूज डेस्क:

वॉशिंगटन: एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पहले वीडियो गेम खरीदना एक बार का लेन-देन होता था। पर अब ज्यादातर गेम्स ‘फ्रीमियम’ बिजनेस मॉडल पर आधारित हैं।

बीते अगस्त में जब चीन ने 18 साल से कम उम्र के लिए ऑनलाइन गेमिंग की समयमीमा हफ्ते में तीन दिन और सिर्फ 1 घंटे तय की तो पैरेंट्स ने इस फैसले का स्वागत किया। हालांकि इसका पालन कराना कठोर था, पर पैरेंट्स जानते थे कि ये बच्चों के लिए अच्छा है। चीन सरकार का तर्क है कि वीडियो गेमिंग एक लत है। इसलिए द. कोरिया, चीन से लेकर ब्रिटेन तक में गेमिंग एडिक्शन क्लीनिक खुल गए हैं।

ब्रिटेन का रिट्जी प्रायोरी क्लीनिक गेमिंग को शॉपिंग और ड्रग्स की लत की श्रेणी रखकर इसका इलाज करता है। डब्ल्यूएचओ ने भी इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज (आईसीडी) के ताजा संस्करण में इसे शामिल किया है। पहली बार इसे बीमारी यानी गेमिंग डिस्ऑर्डर के रूप में वर्गीकृत किया गया है। कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिक रुन नीलसन कहते हैं, जिस तरह कोई व्यक्ति बरसों तक निकोटिन या मॉर्फिन जैसी चीजों का इस्तेमाल करने पर इनका व्यसनी हो जाता है, इसी आधार पर ऑनलाइन गेम्स को भी व्यसन माना गया।

आईसीडी की लिस्ट में गैंबलिंग के अलावा सिर्फ गेमिंग को ही लत बताया गया है। अन्य व्यसनों की तरह गेमिंग डिस्ऑर्डर से ग्रस्त लोग इसी पर दांव लगाते रहते हैं, भले ही उनकी जिंदगी के बाकी पहलू बर्बाद क्यों न हो रहे हों। सिएटल के गेमिंग एडिक्शन क्लिनिक री स्टार्ट की डायरेक्टर हिलेरी कैश बताती हैं,‘ मेरे पास ज्यादातर युवा आते हैं, जिन्हें स्कूल- कॉलेज से निष्कासित कर दिया जाता है। इनमें बड़ी संख्या में लड़के होते हैं। डॉ. नीलसन के मुताबिक डेवलपर्स गेम डिजाइन करते वक्त मनोवैज्ञानिक साहित्य पर रिसर्च करते हैं।

ताकि लोगों को इसकी आदत लगाने में मदद मिल सके। जैसे ‘कैंडी क्रश सागा’ असामान्य कॉम्बिनेशन खोजने के लिए अतिरिक्त रिवॉर्ड देता है। टाइल्स सही जगह पर गिरती हैं, तो भी रिवॉर्ड मिलते हैं। प्लेटाइम को खरीदारी में बदलने की भी तरकीबें हैं। वर्चुअल चीजों को इन गेम करंसी से खरीदा जाता है। इन कंरसी की जानकारी न होना गेमर्स को जमकर खर्च करने के लिए प्रेरित करती है। कैंडी क्रश में गेमर्स को बाहर होने पर आधे घंटे रुकना पड़ता है, उससे पहले खेलना हो तो भुगतान जरूरी है।

2020 में गेमिंग से कमाई 12.65 लाख करोड़, 73% हिस्सा फ्री-टू-प्ले गेम्स से
एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पहले वीडियो गेम खरीदना एक बार का लेन-देन होता था। पर अब ज्यादातर गेम्स ‘फ्रीमियम’ बिजनेस मॉडल पर आधारित हैं। ये या तो सस्ते हैं या मुफ्त। कंपनियां एक्स्ट्रा लाइफ, आभासी कपड़ों और चीजों के इन गेम पर्चेसिंग से पैसा बनाया जाता है। न्यूजू के मुताबिक 2020 में इंडस्ट्री ने 12.65 लाख करोड़ रुपए कमाए। इसमें 73% हिस्सा फ्री-टू-प्ले गेम्स से मिला। यह सिनेमा और म्यूजिक से बहुत ही ज्यादा है। अमेरिकी कोर्ट में हाल में पेश किए गए दस्तावेजों से पता चला है कि एपल के एप स्टोर का 70% रेवेन्यू गेमिंग से ही आता है।

 

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