बिहार- बजट का 17% सिर्फ शिक्षा पर तब है ऐसा हाल, एक ही कमरे में होती है 1 से 5 तक पढ़ाई

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Education status in Bihar
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पटना. बिहार के कुल बजट का 17 फीसदी हिस्सा सिर्फ शिक्षा पर खर्च होता है। प्राथमिक विद्यालयों में आधारभूत संरचना को सरकार बड़ी उपलब्धि के रूप में गिनाती है। ऐसे में चलिए आपको पटना के ऐसे स्कूल में घुमाते हैं, जहां पहली से लेकर पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई एक ही कमरे में होती है। दो बेंच आगे तीसरी कक्षा तो दो बेंच पीछे दूसरी कक्षा। इसी क्रम में यहां सभी कक्षाएं बंटी हुई हैं। मध्याह्न भोजन का सामान के अलावा स्टोर रूम भी इसी में है। ऐसे में यहां पढ़ना-पढ़ाना करामात से कम नहीं। टीचर पढ़ाते हैं ‘आम’ और बच्चे समझते हैं ‘इमली’। शोरगुल में न बच्चे समझ पाते हैं और टीचर समझा पाते हैं। कोरोना के कारण साल भर से बंद प्राथमिक विद्यालय जब सोमवार से खुले तो भास्कर की पड़ताल में यह नजारा पटना सिटी मालसलामी स्थित आर्य सांस्कृतिक मध्य विद्यालय परिसर स्थित कुर्मी टोला उर्दू प्राथमिक विद्यालय में देखने को मिला।

स्कूल में कुल 54 बच्चे नामांकित

स्कूल की प्रभारी परवीना बेगम ने बताया कि विद्यालय में कुल 54 बच्चे नामांकित हैं। कोरोना से पहले करीब 40 बच्चे आते थे। अभी 34 बच्चे आए हैं। उन्होंने बताया कि पहली कक्षा के बच्चों को नीचे जमीन पर दरी बिछाकर बैठाते हैं। ज्यादा बच्चे हो जाते हैं तो 5वीं के बच्चों को बाहर बरामदे पर बैठा कर पढ़ाते हैं। उन्होंने बताया कि स्कूल में प्रभारी मिलाकर कुल 3 शिक्षाकाएं हैं। प्रभारी से जब यह पूछा गया कि ऐसी व्यवस्था में कोई दिक्कत नहीं होती तो उनका कहना था कि नहीं, कोई दिक्कत नहीं होती है। हालांकि सबकुछ नजर के सामने दिख रहा था।

उर्दू दूसरी राजभाषा फिर भी ऐसी व्यवस्था

बिहार में उर्दू दूसरी राजभाषा है। नीतीश सरकार में अल्पसंख्यकों के कल्याण को लेकर खूब दावे भी किए जाते हैं। इसके बावजूद तस्वीर यह है कि एक ही कमरे में 1-5 तक के बच्चों को बैठाकर पढ़ाया जाता है, जबकि मानक यह है कि हर छात्र के बैठने के लिए कम से कम 9 वर्ग फीट का स्थान होना चाहिए। कमरे का क्षेत्रफल कम से कम 180 वर्ग होना चाहिए। इसके अलावा विद्यालय में प्रकाश, पंखा, पेयजल और अन्य जरूरी सुविधाएं भी होनी चाहिए।

40 से कम बच्चों वाले स्कूल बंद होने थे

बिहार राज्य ‘बच्चों की मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा नियमावली 2011’ की कंडिका 4(1) में स्पष्ट लिखा गया है कि ‘प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना वैसे बसाव-क्षेत्र, जहां 6-14 आयुवर्ग के बच्चों की संख्या कम से कम 40 हो, के एक किलोमीटर की सीमा के अंतर्गत की जाएगी।’ ऐसे में 40 से कम नामांकन वाले सरकारी प्राथमिक विद्यालयों का संचालन शिक्षा के अधिकार कानून के तहत निर्धारित मानक के अनुरूप नहीं है। राज्य सरकार की ओर से यह निर्णय लिया गया था कि ऐसे स्कूलों को दूसरे स्कूलों के साथ मर्ज किया जाएगा।

राज्य में 1773 विद्यालयों के पास अपना भवन नहीं

बिहार में 70 हजार प्राथमिक और मध्य विद्यालय हैं। इनमें लगभग 1773 विद्यालयों के पास अपना भवन नहीं है। पटना जिले में ही करीब 190 विद्यालय भवनहीन हैं, जो दूसरे विद्यालयों में चलाए जा रहे हैं। राजधानी में 74 ऐसे विद्यालय हैं, जिनका अपना भवन नहीं है। इनमें 13 मध्य विद्यालय लड़कियों के हैं। ऐसे सभी विद्यालयों को मर्ज करने का निर्णय लिया गया है। प्रदेश में प्राथमिक और मध्य विद्यालयों की संख्या 70 हजार है। इनमें प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 38 हजार और मध्य विद्यालयों की संख्या 32 हजार है। पटना में 3339 प्राथमिक और मध्य विद्यालय हैं, जिनमें 2183 प्राथमिक और 1140 मध्य विद्यालय हैं। अल्पसंख्यकों के लिए 16 मध्य विद्यालयों और 12 प्रस्वीकृत विद्यालय हैं।

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