साइबर सिक्युरिटी फर्म पांडा का हालिया सर्वे- सैकड़ों बच्चे एपल पे,पेपल समेत यूपीआई एप और डेबिड कार्ड का इस्तेमाल कर रहे एप,मूवी और गेम्स खरीदने में 

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DESK NEWS| आप कभी अपने बैंक स्टेटमेंट में ऐसे ट्रांजेक्शन को देखकर हैरान हुए होंगे, जिसके बारे में आपको पता ही नहीं था। ब्रिटेन के माता-पिता इन दिनों ऐसे ही रहस्यमय लेन-देन को लेकर परेशान हैं। साइबर सिक्युरिटी फर्म पांडा के हालिया सर्वे ने इनकी चिंता और बढ़ा दी है।

इस सर्वे में बताया गया कि ब्रिटेन के सैकड़ों बच्चे एपल पे, पेपल समेत यूपीआई एप और डेबिड कार्ड का इस्तेमाल एप, मूवी और गेम्स खरीदने में कर रहे हैं। बड़ी बात यह है कि माता-पिता को इसकी जानकारी ही नहीं है।

पांडा सिक्युरिटी के सर्वे में 52% अभिभावकों ने स्वीकार किया कि वे बैंक बैलेंस में कमी से चकित थे, उन्हें बाद में पता चला कि ये खर्च उनके बच्चों ने किया है। 21% ने बैंकों से संदिग्ध लेन-देन को लेकर संपर्क किया तो उन्हें बताया गया कि उनके बच्चों ने ही पैसों का इस्तेमाल किया है।

डेटा देखने पर पता चलता कि एक बच्चा इन अनाधिकृत गेम्स, एप्स और फिल्मों पर सालभर में औसत 31 हजार रुपए खर्च करता है। यानी हर माह करीब ढाई हजार रुपए की चपत माता-पिता को लगती है। सर्वे में पता चला है कि बच्चों को गेमिंग एड-ऑन की लत लग जाती है। इन्हें ‘लूट बॉक्स’ के तौर पर जाना जाता है। शुरुआत में छोटे-मोटे गिफ्ट देकर बच्चों को आकर्षित किया जाता है, धीरे-धीरे बच्चे इसके आदी हो जाते हैं।

16% माता-पिता ने कहा कि उनके लैपटॉप और कंप्यूटर में वायरस मिले, क्योंकि बच्चों ने अनजाने में कई एप डाउनलोड कर लिए थे। सिक्युरिटी एक्सपर्ट हर्वे लैम्बर्ट बताते हैं कि आजकल बच्चे टेक्नोलॉजी के साथ सहज हो रहे हैं, बेझिझक इनका इस्तेमाल कर रहे हैं, यह देखना सुखद है। पर माता-पिता को भी ऑनलाइन खातों की सुरक्षा रखने की जरूरत है। इन गैरजरूरी खर्चों से बचने के लिए सही उपायों की मदद लें।

  गलत पासवर्ड डालने की वजह से डिवाइस तक लॉक हो गए

इस सर्वे के दौरान 24% अभिभावकों ने कहा कि डिवाइस खोलने के लिए कई बार गलत पासवर्ड डालने पर डिवाइस लॉक हो गए। इन्हें खुलवाने के लिए पेशेवरों की मदद लेनी पड़ी। 46% माता-पिता मानते हैं कि उनके कार्ड के डिटेल्स कई साइट पर सेव हो गए हैं, जिससे बच्चों के लिए ट्रांजेक्शन करना आसान हो गया है।

इसकी वजह से 16% को बच्चों द्वारा किए गए खर्च का पता तब चला जब कोरियर से डिलीवरी घर पहुंची। 23% अभिभावक ने तो मान लिया था कि उनसे ही कोई गलत लेन-देन हो गया होगा। वहीं 17% ने सोचा कि उनके साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी की गई।

 

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