जिन्दा बनाम मुर्दा…

0
271
.
लेखक नितेन्द्र वर्मा
लेखक नितेन्द्र वर्मा

सफलता त्याग मांगती है। काम कोई भी हो सफल होने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। खून पसीना बहाना पड़ता है। दिन रात एक करना पड़ता है। वैसे तो कितना खून पसीना बहाना पड़ेगा और कितने दिन रात एक करने पड़ेंगे ये तो काम पर निर्भर करता है। लेकिन मामला तब गम्भीर हो जाता है जब किसी मुर्दा को ये साबित करना पड़ जाये कि वो जिन्दा है।

अब आप कहेंगे कि मुर्दा भी कहीं जिन्दा होता है भला??? अरे भैया क्यों नहीं। सिस्टम सरकारी हो तो कुछ भी असम्भव नहीं। मिर्जापुर के भोला सिंह के साथ ऐसा ही कुछ हुआ। आज से कुछ पन्द्रह साल पहले वो मर गए थे। तब जो मरे थे तो अब यानी पन्द्रह साल बाद वो फिर से जिन्दा होंगे। मतलब अभी भी पूरी तरह जिन्दा हुए नहीं हैं बल्कि उनके जीवित होने की प्रक्रिया अभी चल रही है।

उनके भाई ने जमीन के लालच में अईसा खेला खेला कि भोला की सारी खेती अपने नाम करा ली। खेती तो जो अपने नाम कराई सो तो कराई ही बेचारे भोला को भी सरकारी कागजों में मृत घोषित करा दिया। जब भोला को ये पता चला कि कि वो मर चुका है तो पहले तो एकदम सकपका गया। गाँव घर वाले उसे शक की नजर से देखने लगे। लोग उससे कतराने लगे। कुछ तो उसको सच में भूत मानने लगे। उसके अपने बीवी बच्चे दूर दूर रहने लगे।

कुछ दिन तो वह कुछ समझ ही नहीं पाया कि करें तो क्या करें। पानी सिर के ऊपर जाता देख एक दिन उसने ठान ली। उसने कसम खाई कि वह फिर से जिन्दा होगा। अब ये है अपना हिंदुस्तान। यहां कसम खाना तो टॉफी कम्पट खाने जितना ही आसान है लेकिन उसे निभाना करेले के जूस पीने जितना मुश्किल। कई साल पहले हमारे एक पड़ोसी रहे। उनके बिजली के बिल में अचानक एक महीने आईडीएफ(मीटर खराब) आ गया। हुजूर उनकी चप्पलें घिस गईं लेकिन मजाल है कि आईडीएफ सही हुआ हो। मीटर चलता रहा आईडीएफ आता रहा। सारी जोर आजमाइश कर ली यहां तक कि अधिकारी की जेब तक गरम कर दी लेकिन सब बेकार। उनका आईडीएफ उनके एनालॉग मीटर की विदाई के साथ ही विदा हो पाया।

भोला सिंह ने भी चप्पलें घिसनी शुरू कीं। लेकिन साहब अगर एक बार आप कागज में मर गए तो आप लाख चिल्लाते रहिये कि आप जिन्दा हैं, कोई नहीं सुनेगा। मजे की बात तो ये है कि उसे मृत घोषित तो उसके भाई ने ही करा दिया था। देखिये ये काम कितना आसान है। जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है ऐसे में जिन भी लोगों ने उसे मृत घोषित किया, कराया होगा उन्होंने एक तरह से धरती माता के वजन को कम करने के लिए ही यह नेक कदम उठाया होगा।
भोला सिंह ने हर दरवाजा खटखटाया लेकिन निर्जीव कागज हर जगह उस निरीह सजीव से जीतता रहा। किसी ने उसकी नहीं सुनी। देखा तो सबने होगा माना भी सबने होगा लेकिन भला कागजों को कोई कैसे झुठलाये। नतीजतन जिन्दा होने की तमाम कोशिशों के बाद भी वो मुर्दा ही रहा। वैसे भी किसी की कलम चल चुकी थी। उलटी कलम चलाने से किसी की कलम फँसनी तो तय थी। अब ये जोखिम लेने का माद्दा कौन लाये।

हर तरफ से निराश, हर दर से खाली भोला सिंह ने तब भी हार नहीं मानी। बैठ गए सादर तहसील के बाहर ‘जिन्दा हूँ मैं’ की तख्ती लेकर। मजे की बात ये रही कि हमारा सिस्टम हमारे अधिकारी तब भी न पसीजे। सब मौन रहे। हलचल तो तब हुई जब बात सूबे के मुखिया तक पहुँची। आखिरकार भोला सिंह का जज्बा, धैर्य, उनकी मेहनत, लड़ाई रंग लाई। अब पन्द्रह साल बाद ही सही एक मुर्दा जिन्दा होगा। लेकिन एक अहम सवाल जो अब भी अनसुलझा ही है कि आखिर असली मुर्दा कौन है – भोला सिंह या फिर सिस्टम।

डिस्क्लेमर: यह लेख एक व्यंग्य मात्र है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, वस्तु, संस्था या स्थान की छवि खराब करना नहीं है। इसमें कही गई बातें लेखक के निजी विचार है। इसका संस्था से कोई लेना-देना नहीं है।

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here