Maharashtra: शिवसेना का SC पर निशाना, सामना में लिखा- सुप्रीम कोर्ट भी मोदी की भाषा बोल रहा है…

0
261
.

Mumbai. शिवसेना ने सामना (Samana Editorial) के जरिए सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधा है। इस दौरान सामना के जरिए शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट पर मोदी सरकार की ही भाषा बोलने का आरोप लगाया है। बता दें, आंदोलन का अधिकार निरंकुश नहीं है। कभी भी, कहीं भी आंदोलन नहीं किया जा सकता। किसान आंदोलन कर लेकर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गई इस टिप्पणी के बाद सामना में सर्वोच्च न्यायालय ने निशाना साधा गया है।

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की इस टिप्पणी पर शिवसेना (Shivsena) ने अपने मुखपत्र सामना (Samana Editorial) के जरिये निशाना साधा है सामना (Samana Editorial) ने लिखा है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख से सरकार के ही ‘मन की बात’ सामने आई है क्या? चार दिन पहले ही हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने देश के आंदोलन का मजाक उड़ाया था। उन्होंने खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि कुछ लोग केवल आंदोलन पर ही जीते हैं। ये लोग ‘आंदोलनजीवी’ हैं। अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रधानमंत्री के सुर में सुर मिलाते हुए आंदोलनकारियों को आंख दिखाई है।

आंदोलन से पैदा हुए कई देश

सामना (Samana Editorial) (Samana Editorial) ने लिखा है कि आंदोलन नहीं हुए होते तो दुनिया के नक्शे में शामिल कई देशों का जन्म ही नहीं हुआ होता और जुल्मी राज खत्म नहीं हुए होते। हिंदुस्थान में भी यही बार-बार हो रहा है। लेकिन देश की बुनियाद ही डगमगा जाए, अर्थव्यवस्था का कचरा हो जाए या विदेशी शक्ति को सहायता मिले, ऐसे आंदोलन इस भूमि पर ना होने पाएं, इस बात को स्वीकार करना ही होगा। ‘व्यक्ति को आंदोलन करने और असहमति व्यक्त करने का संवैधानिक अधिकार है।

सरकार के मन की बात करती है कोर्ट

सामना (Samana Editorial) ने लिखा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलनों के मामले में सरकार के कदम पर मुहर लगा दी है। दिल्ली की सीमा पर किसान तीन महीनों से सड़क पर आंदोलन कर रहे हैं। सरकार जो तीन कृषि कानून लाई है, उसके कारण देश की कमर ही टूटती जा रही है। किसानों को दूसरे पर निर्भर होना पड़ेगा और भविष्य में उसे चार-पांच बड़े उद्योगपतियों का गुलाम होना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति में इन किसानों का सड़कों पर उतरना स्वाभाविक है। जिस हिंदुस्थान के संविधान की बात करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलन पर मार्गदर्शन किया है, वही हिंदुस्थानी संविधान किसानों के नागरिक अधिकारों की रक्षा करने में असमर्थ साबित होगा तो क्या करें?
अदालत में न्याय नहीं मिलता

सामना (Samana Editorial) ने लिखा है कि हवाई अड्डे, विमान कंपनियां और सार्वजनिक उपक्रमों को सरकार निःसंकोच होकर बेच रही है। देश के प्रमुख बंदरगाहों का निजीकरण हो रहा है, जिससे नौकरियां जानेवाली हैं। इस निजीकरण के विरोध में मतलब देश की बिक्री के विरोध में लोगों ने रास्ते पर उतरकर आंदोलन किया तो न्यायालय `ऑर्डर…ऑर्डर’ करते हुए देशद्रोह का हथौड़ा उनके सिर पर मारेगी क्या? ‘हिंदुस्थानी न्याय-व्यवस्था की हालत जीर्ण हो चुकी है। न्यायालय में न्याय मिलना मुश्किल हो गया है।’ ऐसा खुलासा खुद पूर्व मुख्य न्यायाधीश और राज्यसभा के सांसद रंजन गोगोई ने किया है। वह इतना ही बोलकर नहीं रुके। उन्होंने कहा, ‘हम खुद किसी भी न्यायालय में नहीं जाएंगे। न्यायालय में जाना मतलब पश्चाताप करने जैसा है।’

.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here