सात साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार निर्भया को इंसाफ मिल गया है. निर्भया के चारों दोषियों को शुक्रवार सुबह 5:30 बजे फांसी दे दी गई. पूरे देश ने इस दिन को 'इंसाफ का सवेरा' बताया तो वहीं निर्भया के दोषियों को फांसी पर लटाकने वाले पवन जल्लाद ने फांसी के दिन की कहानी बयां की.

दोषियों को फांसी देने वाले पवन जल्लाद ने बताया कि फांसी घर में किसी को बोलने की अनुमति नहीं होती है. जिसकी वजह से फांसी वाले दिन भी केवल इशारों से काम किया गया. पवन जल्लाद ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि मैंने निर्भया के चारों दोषियों को फांसी देकर अपना धर्म निभाया है. यह हमारा पुश्तैनी काम है.' उनका कहना था कि फांसी होने से पहले दरिंदों को पश्चाताप होना चाहिए था, लेकिन उनमें से किसी को पश्चाताप नहीं था.'

उन्होंने बताया कि वे 17 मार्च के दिन तिहाड़ आए थे और डमी ट्रायल किया. डमी ट्रायल करने से पहले उन्होंने सबसे पहले फांसी के फंदों को दही और मक्खन पिलाकर मुलायम किया. वहीं अगले दिन सुबह चार बजे फंदों को दोबारा दुरुस्त कर लगाया.

पवन जल्लाद का कहना है कि फांसी वाले दिन सुबह दोषियों के हाथ बांधकर फंदे तक लाया गया. सबसे पहले अक्षय और मुकेश को फांसी घर लाया गया इसके बाद पवन और विनय को तख्ते पर ले जाया गया. हर गुनहगार के साथ पांच-पांच बंदीरक्षक थे. उन लोगों को एक-एक कर  तख्ते पर ले जाकर खड़ा किया गया.

इसके बाद चारों आरोपियों के फंदे को दो लीवर से जोड़ा गया. इसके बाद उनके चेहरे पर कपड़ा डालकर सभी के गले में फंदा डालकर संतुष्टि की गई और समय के अुनसार जेल अफसर के इशारे पर लीवर खींच दिया गया और उनको फांसी दे दी गई.